Saturday, 20 May 2017

जानिए कौन थी ऑस्ट्रिक जातियां-


 प्राचीन सभ्यताओं में एक अति प्राचीन सभ्यता रही थी आग्नये सभ्यता( ऑस्ट्रिक, नाग, द्रविण , कोल , किरात आदि )  यह सभ्यता आर्यो के आने से पहले भारत में व्यापक रूप से मौजूद थी । हिन्दू सभ्यता में मौजूद बहुत सी प्रथाएं आग्नये संस्कृति की ही देन है , जैसा की उदहारण के लिए चंद्रमा को देख तिथि गिनने की कला आग्नये संस्कृति की ही देन है । अमावस्या के लिए ' कुहू' और पूर्णिमा के 'राका' शब्द आग्नये शब्द भंडार से ही लिए गए हैं। कई इतिहासकारों का मत है की चावल की खेती भी उन्ही की देन है और चावल को देख के  पुनर्जन्म की परिकल्पना भी आग्नये संस्कृति की देन है जिसे बाद में आर्यो ने अपनाया और विकसित किया गया  । रामधारी सिंह दिनकर , सुनीति बाबू जैसे इतिहासकारों का यंहा तक कहना है कि गंगा शब्द आग्नये शब्द भंडार से ही आया है । आग्नये परिवार की अनेक भाषाएं भारत से लेके दक्षिणी चीन तक बिखरी हुई हैं , उनमे से कई नदी को गंग ही कहते हैं ।उत्तरी भारत के कई ग्रामीण तो नदी का पर्याय ही गंगा समझते है , आग्नेय भाषाओं में नदी के लिए ' कग, घंघ ' जैसे शब्द है।


इतिहासकार कहते हैं कि भारत में हाथी पालना, पक्षी पालना का आरंभ आग्नये जातियो ने ही किया था , भारत का निम्न कहा जाने वाला विशाल समुदाय आग्नये समुदाय से ही आया है ।
हिन्दू पुराणों में जो कथा किंदवंतियो का भंडार है वह आग्नये सभ्यता से ही आया है ।
आर्यो, द्रविड़ो , कोल , किरात वंश जब आपस में मिले होंगे तो एक दूसरे की लोक कथाएं भी एक दूसरे के घरों में प्रवेश करने लगी होंगी।

दिनकर जी तो आगे बढ़ के यंहा तक कहते हैं कि राम कथा की रचना के लिए आग्नये जाति के बीच प्रचलित लोक कथाओं का सहारा लिया गया है ।पाम्पा पुर के वानरों और लंका के राक्षसों की जो विचित्र कल्पनाये मिलती है उनका आधार आग्नये लोगो की लोक कथाएं ही रही होंगी।

लोक कथाएं और किद्वंतिया पहले ग्रामीण लोगो में  फैलती है उसके बाद साहित्य में सम्लित होती है।
बौद्ध जातकों की जो कथाएं हैं वे लोक कथाओं से ऊपर उठ के बौद्ध साहित्य तक पहुंची और उसके बाद पुराणों ने उनकी नकल की ,इसी कारण पुराणों और बौद्ध जातक कथाओं में कई समानता मिलती है ।

इतिहासकारो के अनुसार देवर - देवरानी, जेठ जेठानी की प्रथा आग्नये सभ्यता की देन है । सिंदूर प्रयोग और अनुष्ठानों में  नारियल पान रखने की प्रथा भी आग्नये सभ्यता की देन है । सिंदूर रजस्वला
का प्रतीक होता था जो की कृषि अनुष्ठानों में प्रजन का द्योतक था । सिंदूर के बारे में सुरेंद्र मोहन भट्टाचार्य अपने ' पुरोहित दर्पण' में साफ़ कहते हैं कि सिंदूर प्रथा आर्यो की प्रथा नहीं थी बल्कि आर्यो ने आर्येतर जाति से ग्रहण किया है। सिंदूर का न कोई वैदिक नाम है और न सिंदूर दान का कोई मन्त्र । सिंदूर मूलतः नाग लोगो की वस्तु है।

अवतारों में मत्स्य, वरहा, कच्छ की कल्पनाये आर्यो ने आग्नये जातियो से आई हो इसमें कोई बड़ी बात नहीं क्यों की आर्यो ने इन्हें अपना तो लिया था किंतु इनका महत्व उनके लिए विशेष नहीं रहा ।
एक बात और ध्यान दीजिए की ब्राह्मणों का सारा कठोरतम पहरा वेदों पर ही रहा ,उसने शूद्र और  स्त्रियों को वेदों से दूर रखा जबकि पुराणों पर ऐसी कठोरता नहीं बैठाई।
निश्चय पुराणों की कहानियों में ऐसे मिश्रण थे जो अर्योत्तर जातिओं से आये थे इसलिए ब्रहामण उन्हें अपना नही मानता था ।



Sunday, 14 May 2017

नगरीय सभ्यता और ग्रामीण सभ्यता-

 बौद्ध धर्म का मजबूत स्तंभ उसका ' संघ' था , यह संघ व्यापारियों और शिल्पियों का संघ था जिसमे कई श्रेणियां होती थी और उस श्रेणी के प्रमुख को सेट्ठ कहते थे ।यह श्रेणियां मुख्यतः व्यापार पर आधारित होती थी जिनकीं  संघ में मजबूत भागीदारी होती थी।

यदि हम यह कहें कि बौद्ध धर्म को फलने- फूलने में जो कारक थे वे यही श्रेणियां थी तो गलत न होगा , इन्ही के अनुदान पर मठ और विहार का भरण पोषण होता था । चुकी श्रेणियां व्यापर पर निर्भर थी और व्यापार नगरीय सभ्यता पर ।

व्यापर का संचालन सुचारू रूप से नगरों में ही चल सकता है। हम देख सकते हैं कि सिन्दू सभ्यता भी नगरीय सभ्यता थी, वँहा व्यपार ही और शिल्प ही मुख्य उद्योग था ।  सिन्धु सभ्यता का व्यपारिक रिश्ते बेबीलोन , सीरिया  आदि प्राचीन नगरीय सभ्यताओं
से थे , सिन्धु घाटी उत्खनन से कई सील मोहरे मिली हैं जो व्यापर के लिए उपयोग होती थीं।

वैदिक संहिताओं में ' ग्राम' शब्द कई बार आया है किंतु 'नगर' शब्द का प्रयोग नहीं मिलता। विद्वानों के अनुसार वैदिक संहितो और  धर्म सूत्रों में वैदिक सभ्यता ग्राम सभ्यता है। पुराणों में जरूर नगरों का जिक्र है किंतु नगरों के निर्माता आर्य नहीं बल्कि मय वंशीय हैं जिन्हें अवैदिक अर्थात दानव/असुर कहा गया है।

यह निश्चित है कि आर्यो के ग्राम सभ्यता के कारण ही जाति प्रथा इतनी मजबूत हो गई , अपने पूर्वजो का धंधा छोड़ के दूसरा धंधा चुन लेना जितना आसान नगरीय सभ्यता में आसान होता है उतना ग्राम सभ्यता में नहीं। यह  सिद्धान्त आप आज भी देख सकते हैं कि शहरो में जातीय बंधन कमजोर होता है जबकि गाँवों में यह कठोरता से लागू हो जाता है ।आर्य व्यवस्था ग्रामीण व्यवथा थी इसलिए यह इतनी मजबूत और टिकाऊ हो सकी।

आर्य के प्रमुख देवता इंद्र का एक नाम पुरिन्द्र भी है जिसका अर्थ होता है नगरों ( घनी आबादी वाले शहर/ दुर्ग को नष्ट करने वाला । ऋग्वेद में बाकायदा  इंद्र अनार्य राजा शंबर के नगरों को नष्ट करता हुआ भी बताया गया है।

नगर के व्यापारियों को 'पणि' कहा गया है ऋग्वेद में , पणियों को लालची और धनी बताया गया है जो इंद्र के सामने नहीं टिकते थे । पणियों / शिल्पियों/ कारीगरों  की नगरों से ही संचालित होता था । गौर तलब है कि आर्य सभ्यता में शिल्पी/ कारीगर भी शूद्र श्रेणी में घोषित किये गए थे, जबकि बौद्ध संघ के श्रेणी में इनका मजबूत संघ होता था ।

शिल्प, कला- कौशल, कारीगरी तथा उद्योग नगरीय सभ्यता के लक्षण है ,बिना नगरीय सभ्यता के इनका विकास नही हो सकता । सिंधु सभ्यता के विध्वंश और और फिर बौद्ध सभ्यता के नष्ट किये जाने के बाद भारत वर्ष में नगर संस्कृति को प्रधानता किसी भी समय नही मिली । आर्य संस्कृति का ग्राम या देहात आधारित अर्थशास्त्र का निरन्तर बने रहना जातीय भेद की कठोरता में अधिक से अधिक सहायक हुआ ।

फ़ोटो सिंधु सभ्यता में व्यापार के लिए प्रयोग होने वाली सील-

Saturday, 13 May 2017

समझदार - कहानी

बाहर से किसी के दरवाज़े के खटखटाने की आवाज़ आई तो सुमित झट से पढ़ना छोड़ चारपाई से उतरा और जोर से आवाज़ लगाई -
"आ रहा हूँ मम्मी.....'

बाहर सुधा थी, सुमित की मां।

सुमित ने दरवाजा खोला तो सच में सुधा ही थी , सुधा ने मुस्कुरा के पूछा -
" क्या कर रहे थे? '
" होमवर्क कर रहा था .... " सुमित ने पहले सुधा की तरफ देखा और फिर सुधा के हाथ में थमी हुई पन्नी को गौर से देखा , एक क्षण के लिए उसकी आँखों में चमक आ गई और दूसरे ही क्षण गायब हो निराशा में बदल गई।

सुधा ने उसके चेहरे की उदासी पढ़ ली थी , वह तुरंत अपने हाथ में पकड़ी हुई पन्नी को आगे करते हुए बोली-
" इमरती लाइ हूँ तेरे लिए .... तुझे बहुत पसंद है न!" सुधा ने  प्लास्टिक की थैली पकड़ाते हुए कहा ,किन्तु न जाने क्यों  सुमित की आँखों से आँखे नहीं मिलाई । सुधा ने अपना हैंडबैग खूंटी पर टांगा और तौलिया ले सीधा बाथरूम में चली गई।

सुमित ने इमरती की थैली खोल के देखी तक नही ,थैली को अलमारी में पटक वह गुस्से फिर चारपाई पर जा के किताब खोल के पलटने लगा ।

सुधा बाथरूम के झरोखे से उचक के सुमित की सारी हरकत देख रही थी। एक दर्द भरी बेबसी की आह उसके मुंह से बरबस ही निकल गई, दो आंसू की बूंदे आँखों से लुढ़क के बालों से झरते पानी में मिल के अस्तित्वविहीन हो गए थे।

बाथरूम से निकल के सुधा खाना बनाने लगी , सुमित अब भी चारपाई पर  बैठा किताब में नजरें गड़ाया था किंतु सुधा को पता था कि सुमित पढ़ नहीं रहा है बल्कि गुस्से और उदासी में कंही गुम था।

खाना बनाने के बाद सुधा ने सुमित को खाना परोसा, पर सुमित अब भी खामोश और उदास था । अनमने ढंग से उसने एक रोटी खाई और उठ गया , जब सुधा ने इसका कारण पूछा तो उसने कहा कि उसे ज्यादा भूंख नही है और सुधा के आने से पहले ही उसने मैगी बना के खा ली थी।

पर सुधा जानती थी की सुमित झूठ बोल रहा था ।
सुधा ने भी अनमने ढंग से एक-आध रोटी खाई और बाकी खाना उठा के रख दिया।

थोड़ी देर में सुधा और सुमित अपने अपने बिस्तर पर थे , बहुत देर तक सुधा सोने की कोशिश करती रही पर नींद उसकी आँखों से जैसे कोसो दूर हो। उसकी आँखों में दर्द के साथ उसकी पुरानी यादें ऐसे घूमने लगी जैसे कोई फिल्म की रील चला दे।

तीन  साल पहले तक सुमित के पिता रतनलाल  एक सिलाई कारीगर थे और एक फैक्ट्री में काम करते थे । सब कुछ अच्छा चल रहा था कि अचानक पता चला की रतनलाल को टीबी की बीमारी है । खांसते- खांसते मुंह से खून तक आ जाता था , बीमारी का इलाज करवाते करवाते घर का सब कुछ बिक गया यंहा तक की सुधा के तन के जेवर तक ।
फैक्ट्री से एडवांस कर्ज भी लिया किन्तु कोई फायदा न हुआ अतः एक दिन रतनलाल सुधा और सुमित को छोड़ के चल बसे।

सुमित उस समय पांचवी कक्षा में था ।घर का खर्चा , सुमित की पढाई और फैक्ट्री से एडवांस लिए कर्जे को चुकाने के लिए सुधा ने फैक्ट्री में काम करना शुरू कर दिया । चूंकि सुधा कारीगर नहीं थी अतः  कम वेतन में धागा काटने का काम मिला।
लगभग आधा वेतन एडवांस लिए रुपयों की भरपाई में कट जाता और जो बचाता उससे घर का खर्च और सुमित की पढाई बड़ी मुश्किल से हो पाती।

" सुमित! नींद नहीं आ रही है क्या?" सुधा ने करवट बदलते सुमित से पूछा ।
" हूँ! आ रही है ..... " सुमित ने धीरे से जबाब दिया।
" बहुत जरुरी है क्या सुमित तेरे लिए क्या वह फोन? " सुधा ने लेटे लेटे फिर पूछा।
"मेरे सारे दोस्तों के पास है , वो लोग इंटरनेट भी चलाते हैं जिसमे पढाई की सभी चीजे मिल जाती है ।गेम भी खेलते हैं ....." पहले तेजी से कह और फिर माध्यम स्वर में अपनी बात पूरी की सुमित ने ।

" हूँ.... "सुधा ने आँख बंद किये हुए कहा ।

" हूँ क्या? आप पिछले चार महीने से कह रही हैं कि दिला दूंगी पर रोज टाल देती हैं।..... वह संतोष है न ! अब तो उसके पास भी बड़ा सा फोन आ गया है । फोन में कोर्स से जुडी तरह तरह चीज़ो को देखता है । टीचर ने जो प्रोजेक्ट दिया था वह भी उसने इंटरनेट से देख के मुझ से पहले पूरा कर लिया है.....अब मैं कोई छोटी क्लास में नही हूँ .... आठवी में आ गया हूँ .... अब मुझे इंटरनेट वाले फोन की जरूरत है ,पर आप हैं कि समझती नहीं" सुमित ने जैसे अपने दिल का गुबार निकाल दिया हो।

"हूँह.... " सुधा ने फिर गहरी सांस लेते हुए कहा ।
"फिर वही हुँह...... आप इसके अलावा कुछ नहीं कह सकती.....पापा होते न तो मैं आपसे कहता भी नहीं , वो मुझे कब का दिला चुके होते" -सुमित ने झल्लाते हुए कहा और चादर से मुंह ढक के सो गया।

सुधा ने कुछ नहीं कहा बस छत की तरफ एक टक देखती रही। यंहा तो घर का खर्च और पढाई का खर्च ही नहीं पूरा हो पा रहा था उस पर 8-10 हजार का फोन कैसे लेके दे सुमित को ? एडवांस भी देना बंद कर दिया था फैक्ट्री मालिक ने , कोई जानकार भी नहीं था उसका जो इतनी रकम उसे उधार देता। बेबसी के कारण उसकी आँखों से आंसुओ की धार बह रही थी जो नीचे बिछी चादर को ऐसे गीला कर रही थी जैसे गिलास भर पानी उड़ेल दिया हो।

सुबह सुधा उठी और सुमित के लिए नाश्ता बना के स्कूल भेज दिया उसके बाद खुद भी फैक्ट्री के लिए निकल गई।


शाम को सुधा आई तो उसके हाथ में नए फोन का एक पैकेट था , जैसे ही सुमित ने फोन का पैकेट देखा तो मारे ख़ुशी के उसके मुंह से चीख निकल गई और वह सुधा से लिपट गया । सुधा हलके से मुस्कुरा दी ।
सुमित ने पैकेट खोल के देखा तो उसमें नया फोन था ठीक वैसा ही जैसा उसके दोस्त के पास था ।

सुमित के ख़ुशी का ठिकाना न था।

दो दिन बाद।

"सुमित! तू फोन क्यों नहीं चला रहा है? फोन कँहा है तेरा?" सुधा ने सुमित से पूछा।
" फोन तकिये के नीचे रखा हुआ है" सुमित ने लापरवाही से कहा।

सुधा ने फोन देखने के लिए तकिया उठा के देखा तो उसके मुंह से आश्चर्य से चीख निकल गई।
तकिये के नीचे फोन नहीं उसका मंगलसूत्र रखा हुआ था । वह मंगल सूत्र जो उसने सुमित के फोन खरीदने के लिए बेंच दिया था ।

सुमित ने पास आके कहा " मम्मी ! तुमने मेरे  फोन के लिए इसे बेंच दिया था न! यह आपके लिए कितना कीमती है यह मैं जानता हूँ.... पापा की यह आखरी निशानी है न! आपने इसे कितने दुःखो के बाद भी नहीं बेचा था ......मुझे आज सब पता चल गया इसलिए मैंने फोन वापस कर दिया और आपका मंगलसूत्र फिर उसी दुकान से खरीद लाया जंहा आप इसे बेच के आई थी....मैं इतना भी जिद्दी नहीं हूँ । मैं बिना फोन के पढ़ सकता हूँ , मुझे नहीं चाहिए इंटरनेट - सिंटरनेट ...." इतना कह सुमित सुधा से लिपट गया और रोने लगा।

इस बार सुधा की आँखों में ख़ुशी के आंसू थे , सुमित अब वाकई समझदार हो गया था ।

बस यंही तक थी कहानी....


Wednesday, 10 May 2017

और बुद्ध का घर छोड़ना.....


बुद्ध के बारे में यह भ्रंति फैली हुई है की बुद्ध शव को देख दुखो से घबरा के अपनी पत्नी और पुत्र को छोड़ के घर से भाग गए थे ? पर ,यह केवल मिथ्या बात है इसमें सच्चाई नहीं ।

बुद्ध का नाम गोतम  (जिसका  अर्थ होता है बेल )था और वे सक्क ( संकृत में शाक्य)  जनजाति से थे ।   गोतम का जन्म भी सक्को के टोटम पांच पेड़ो(साल) के झुरमुट के नीचे हुआ था, ये साल के झुरमुट उनकी मातृदेवी लुम्बनी को समर्पित थें ।शायद इसी कारण उनका नाम गोतम अर्थात बेल (लता) रखा गया था। गोतम का संस्कृत का सिद्धार्थ नाम बहुत बाद में दिया गया है, जब अश्वघोष जैसे  ब्राह्मणो ने बौद्ध धर्म अपना के पालि साहित्यों को संकृत में अनुवाद करना शुरू कर दिया था ।


 गोतम के  पिता सक्क ( सक्क का अर्थ है साग- सब्जी सम्बन्धी)  गणराज्य के पूर्व अध्यक्ष भी रह चुके थे , खेती करते थे ,हल चलाते थें( देखें डी डी कोसंबी की पुस्तक प्राचीन भारत की संस्कृति और सभ्यता )।


। शाक्य  गणराज में शाक्यों का अपना एक संघ था और राज्य के सभी फैंसले यह संघ ही करता था । संघ का नियम था की गण राज्य के प्रत्येक युवक को 20 साल का होने पर संघ का सदस्य बनना पड़ता था  । अत: सिद्धार्थ को भी 20 साल का होने पर सदस्य बनाया गया । सिद्दार्थ 8 साल तक संघ के सक्रीय सदस्य रहें ।
शाक्य गणराज के पूर्व में कौलिय गणराज्य था और रोहिणी नदी दोनों राज्यो की विभाजक रेखा थी , अक्सर नदी के पानी को लेके दोनों राज्यो में झड़प होती रहती थी ।

परन्तु एक बार पानी को लेके शाक्यों और कोलिय किसनो में गंभीर झड़प हुई , बात युद्ध तक अ पहुची । शाक्य सेनापति ने कौलियो के विरुद्ध युद्ध छेड़ने के लिए संघ की अनुमति प्राप्त करने के लिए सभा बुलाई । सभा में युद्ध करने का प्रस्ताव पारित हो गया , अंत में सेनापति ने सभी सदस्यों से एक बार फिर पूछा की युद्ध से किसी को आपत्ति तो नहीं है ?
इस पर गोतम  ने खड़े होके युद्ध पर आपत्ति करते हुए कहा की यह मामला बैठ के भी सुलझाया जा सकता है , युद्ध से युद्ध के बीज बो उठते है और स्थाई हल नहीं निकलता ।

गोतम  ने कहा कीकौलिय हमारे पडोसी है और झगडे का सही कारण पता कर उसका निवारण किया जाए इसके लिए  पांच सदस्यों की एक कमेटी बनाई जाये जो दोनों पक्षो के मसलो को शांति पूर्वक हल करे।
इस तरह गोतम  के विरोध करने पर सभा अगले दिन तक के लिए स्थगित कर दी गई ।
अगले दिन सेनापति ने अनिवार्य सैनिक भर्ती का प्रस्ताव रखा , गोतमने उसका विरोध किया और कहा की न वे अनिवार्य सैनिक बनेंगे और न ही युद्ध में भाग लेंगे ।

इस पर संघ ने गोतम  पर तीन दण्डो का प्रवधान रखा
1- फांसी
2- देश निकाला परिव्राजकके रूप में
3- परिवार के लोगो का सामाजिक बहिस्कार तथा सम्पति जब्त

तब गोतम  ने संघ से प्रार्थना की कि कृपया परिवार का सामजिक बहिस्कार न करें और न ही उनकी सम्पति छीने , अपराधी मैं हूँ इसलिए चाहे मुझे देश निकाला दे दें या फांसी पर चढ़ा दें ।

उनकी इस बात पर संघ में काफी विचार विमर्श हुआ , अत: यह निर्णय लिया गया की गोतम  को  परिव्राजक के रूप में देश निकाला दे दिया जाए ।
घर आके गोतम ने यह बात अपने परिवार वालो को बताइये तो वे बहुत दुखी हुए,पत्नी  कच्चाना ( बाद में संस्कृत में यशोदा/ यशोदरा)साथ आना चाहती थी पर गोतम  ने समझाया की यह संघ की निति के विरुद्ध है और उन्हें अकेले ही देश छोड़ना होगा । अंत में गोतम अपनी पत्नी कच्चना और परिवार वालो को समझाने में सफल हो जाते हैं ।

उसके बाद कपिलवस्तु में उनका प्रब्रज्य संस्कार के बाद गोतम  ने अपनी यात्रा आरम्भ की और अनोमा नदी की ओर चल पड़े( अनोमा नदी जिसे वर्तमान में आमी नदी कहा जाता है वह मेरे गांव से मुश्किल से 15 किलो मीटर की दूरी पर है) ।

और.... वंहा से शुरू हुआ गोतम  के बुद्ध बनने सफर।

अपने पिता की मृत्यु पर बुद्ध कपिलवस्तु वापस लौटे , उसके बाद उनकी माता और पत्नी कच्चना भी बौद्ध संघ में शामिल हुईं और भिक्षुणी बनी। थेरी गाथाओं में लगभग 75 भिक्षुणीयो का उल्लेख है जिसमें कच्चाना और रुक्मिन देइ (संस्कृत में महामाया किया गया) शामिल है ।

Monday, 1 May 2017

अमेरिकी मजदूर दिवस और भारतीय सेवक

वर्णव्यवस्था धर्म में तथाकथित  तीनो उच्च वर्णो की सेवा करने का कर्तव्य सबसे निचले अर्थात शूद्र वर्ण के लिए निर्धारित किया गया है।
किसान, शिल्पी, दासों आदि को शूद्रों की श्रेणी में रखा गया है, व्यास स्मृति में एक लंबी सूची दी हुई है कि कौन से श्रमिक( कामगार) शूद्रों की श्रेणी में आते हैं।

मनुस्मृति कहती है कि शूद्र चाहे खरीदा हो या न खरीदा हो वह तीनो उच्च वर्णो का सेवक है ।

वर्ण व्यवस्था में अपने को सबसे शीर्ष पर बैठाने वाला यह जानता था कि वह नँगा नही घूम सकता कपडा तो पहनना ही होगा। जूता ,चप्पल तो पहनना ही होगा ।खाना खाने के लिए बर्तन की जरूरत तो होगी ही , यज्ञ के लिए घी की जरूरत तो होगी ही। घर भी चाहिए रहने के लिए, घर को साफ़ भी रखना होगा ,कपडे भी धोने ही होंगे ।

किन्तु, वह न तो पहनने के लिए जूते ही बना सकता था ,न कपडे, न बर्तन और न ही यज्ञ के लिए घी । न ही वह घर की सफाई कर सकता था,न मरे हुए पशु ही उठा सकता था न खेत में अन्न ही उगा सकता था ।हल की मुठिया तक पकड़ना उसने अपने लिए पाप घोषित किया हुआ था ।जीवन की  सब कामो के लिए स्वयं घोषित शीर्ष उच्च वर्ण को दूसरों पर निर्भर रहना होता था ,अगर वह जरूरत के लिए हर चीज ख़रीदे तो उसके लिए धन की जरूरत होती । धन बिना परिश्रम के नहीं कमाया जा सकता और परिश्रम को उसने शूद्रता घोषित किया हुआ था ।

तब उसने अपनी सभी जरूरतों के लिए 'दान व्यवस्था' लागू करवाई, दान केवल शीर्ष वर्ण को ही दिया जा सकता था श्रमिको को नही। श्रमिक तो बिना खरीदे गुलाम थे ।

कृष्ण तक कहते हैं कि सभी को अपने वर्णधर्म का पालन करना चाहिए यही उनका( ईश्वर) का बनाया नियम है ,शूद्र का वर्ण धर्म सेवा करना है।

शूद्रों को सेवा के लिए किसी तरह मेहनताना मिले ऐसा धार्मिक व्यवस्था नही थी। शूद्र को सेवा पिछले जन्म के 'पापो'के कारण करनी थी इसलिए उसे अपनी सभी सेवाये जैसे जूते, कपडे, अन्न, सफाई,बर्तन , घी आदि मुफ्त देनी थी । इस सेवा के बदले धर्मसूत्र कहता है कि सेवादारों को सवर्णो के उतरे कपडे , जूठन , टूटे बर्तन आदि ही मिलनी थी ।

सेवक धन रख के कंही सम्पन्न न हो जाए और वह तथाकथित उच्च वर्णो की सेवादारी से मुखर न हो जाए इसलिए मनु महाराज निर्देश देते हैं कि स्त्री के साथ सेवक भी धन नही रख सकते थे।

सब अमानवीय यातनाएं सहने के बाद भी सेवको(शूद्रों) ने कभी अपनी स्थिति के प्रति रोष क्यों नहीं प्रकट किया?क्या कारण रहा की सेवक वर्ग अपने शोषण के प्रति कोई आंदोलन नहीं खड़ा कर पाया ?

निश्चय ही इसका कारण धर्म रहा , धर्म की घुट्टी ऐसी पिला दी गई थी की शूद्र वर्ग सेवा करना  ही अपना कर्तव्य समझता रहा । उसे यह अहसास दिला दिया गया था कि वह जो सेवक(शूद्र) योनि मे पैदा हुआ है वह उसके पिछले जन्मों के पापो नतीजा है ,यदि वह इस जन्म में बिना न नुकार के सवर्णों की सेवा करता है तो अगले जन्म में वह भी सवर्ण बनेगा । सेवक स्वयं और बाल बच्चे समेत अपने मालिक का सेवक होता , काम का कोई घण्टा निर्धारित न था । 24 घण्टे मालिक की सेवा में उपस्थित रहना पड़ता था ,क्या पता कब मालिक उन्हें बुला लें!

अमेरिका में वर्णव्यवस्था नहीं थी न ही वँहा के सेवको को यह धर्म का यह भय था कि यदि इस जन्म में अपने मालिको से अपने अधिकारों की मांग रखेगा तो अगले जन्म में फिर सेवक बनेगा। इसलिए वँहा के सेवको(मजदूरों) में चेंतना का विकास हुआ और अपने शोषण के विरुद्ध उठ खड़े हुए ।
उन्होंने आंदोलन किया अपने हको को लेके ,अपने काम करने के घण्टे निर्धारित करवाये ।

सोचिये यदि अमेरिकी मजदूरों में अपने हकों को लेके चेंतना का विकास न हुआ होता और वह आंदोलन भारत न पहुंचता तो  भारतीय सेवक आज भी धर्म के उसी 24x7 के नियम पर काम कर रहे होते , उन्हें पता ही नही होता की काम करने के भी घण्टे निर्धारित होते हैं।

खैर, अपने मजदूर भाइयो को मज़दूर दिवस की हार्दिक बधाई....
फ़ोटो सभार गुगल






Saturday, 15 April 2017

कमाई- कहानी


 रात धीर धीरे अपने यौवन की ओर कदम बढ़ा रही थी  , सड़क पर अब इक्का-दुक्का  तेज भागती मोटरगाड़ियों की हैडलॉट्स चकाचौंध ही दिख रही थी जो दूर से रौशनी बिखेरित हुई आती और पल भर में अँधेरे में गुम हो जातीं।

चार व्यक्ति  बड़े से पार्क के एक सूनसान कोने में बैठे शराब पीने मस्त थे । ये तीसरी बोतल खोली थी उन चारो की जो पी रहे थे  , बोतल खाली होने तक नशे में धुत्त हो झूमने लगे थे । खाली बोतल को पैग बनाने वाले शख्स ने लापरवाही से बोतल एक ओर फेंकी ,बोतल लुढ़कती हुई थोड़ी दूर पड़ी एक ईंट से टकराई तो 'टन्न' की आवाज़ हवा में  गूँज उठी ।

'टन्न' की आवाज़ जैसे ही अर्धनिन्द्रा में लेटी रूबी के कानों में पड़ी  तो उसकी आँख खुल गई  ,इधर उधर देखने के बाद उसे अहसास हुआ की आवाज़ पार्क में से आ रही थी उसे समझते देर न लगी  की यह आवाज शराब की खाली बोतल की ही थी। वह बुदबुदाई-

"खाली शराब की बोतल! यानी पांच रुपये की एक बोतल !! अगर दो हुई तो!! दस रुपये में बिक जाएँगी ।" ऐसा सोचते हुई वह झट से उठ बैठी उसने देखा की उसकी चाची-चाचा  अब भी सो रहे हैं।

रूबी, उम्र रही होगी 15 साल के करीब । पश्चिम बंगाल के 24 परगना की रहने वाली, बाप की मृत्यु बचपन में ही हो गई तो माँ ने ईंट भट्टे मज़दूरी कर के किसी तरह अपना और रूबी का पेट भरा ।
अभी पिछली साल माँ भी एक बीमारी में चल बसी तो रूबी बिलकुल अकेली हो गई, घर के नाम पर सिर्फ एक 10x10 की झोपड़ी थी ।

रूबी का इकलौता रिस्तेदार या यूँ कहिये की सहारा था उसका चाचा बदरू ,कई साल पहले गरीबी से तंग बदरू पश्चिम बंगाल छोड़ के दिल्ली काम की तलाश में आया तो कंही काम न लगा और न ही रहने की जगह मिली। कई दिनों तक यूँ ही भटकने के बाद कूड़ा बीनने का काम कर लिया फिर एक पार्क की दीवार से लगा अस्थाई झुग्गी बना ली ।ऐसा नहीं था कि वह अकेला था , उस जैसे कई परिवार वंही जुग्गी बना के रहते थे जिनमे से कुछ भीख मांगते तो कुछ कूड़ा बीनने का काम करते।कुछ दिनों बाद बदरू  अपनी पत्नी को भी ले आया ,अब दोनों कूड़ा बीनते और झुग्गी में बिजली न होने के कारण सड़क पर ही सो जाते।

रूबी बदरू के पास आ गई, चाचा चाची पर बोझ न बने इसलिए कूड़ा बीनने में मदद करने लगी।

आज भी सभी लोग सड़क पर ही सो रहे थे , बोतल की आवाज़ सुन रूबी उठी और बिना किसी बताये वह तेजी से पार्क के उस कोने में चल पड़ी जंहा से उसे खाली बोतल की आवाज़ सुनाई दी थी, वह जल्दी से बोतल उठा लेना चाहती थी की इससे पहले कोई और उठा ले ।

वह तेजी से उस जगह पहुँच गई जंहा बोतल पड़ी थी । इधर शराबियों ने जब रूबी के कदमो की आहट सुनी तो बैंच के पीछे छुप गएँ ,उन्होंने सोचा की शायद पुलिस है ।
फिर ,जब कूड़ा बीनने वाली लड़की को  बोतले बीनते हुए देखा तो उनकी आँखों में चमक आ गई । चारो में इशारे हुए और रूबी को किसी कबूतरी की तरह दबोच लिया गया ।

रूबी चीखना चाहती थी किन्तु दो मजबूत हाथ उसके मुंह पर ऐसे जम गए थे जैसे चिपका दिए गए हो।

चारो रूबी को खींच के कोने में ले गए और तन पर एक कपडे न छोड़े,  उनकी दरिन्दगी चरम पर थी ।एक एक कर के सभी ने बलात्कार किया , रूबी असहनीय दर्द और शरीर के घावों से कब की बेहोश हो चुकी थी ।


सुबह के चार बजने वाले होंगे , हल्का उजाला फैलने वाला ही था कि रूबी की बेहोशी टूटी । वह चीखती हुई उठ बैठी , देखा तो कोई नहीं था ।वो चारो जा चुके थे , फिर रूबी ने अपने शरीर पर न नजर डाली अनगिनत घाव थे यंहा तक की गुप्तांग से अब भी खून रिस रहा था । रूबी किसी तरह उठी और पास पड़ी अपनी फ़टी हुई सलवार- समीज को दर्द से कराहते हुए पहना और लड़खड़ाती हुई अपनी झुग्गी की तरफ चल दी।

रूबी ने देखा की अब भी उसकी चाची और चाचा सो रहे है , उसने झकझोर के अपनी चाची को जगाया । चाची को जगाते  ही रूबी फूट फूट के रोने लगी, चाची ने जब रूबी की दयनीय हालत देखी तो समझ गई की रूबी के साथ बहुत गलत हुआ है।
चीख पुकार सुन के बदरू भी जाग गया , उसने जब सारी बात सुनी तो रूबी पर ही बहुत गुस्सा हुआ गलियां देने लगा की उसे इतनी रात को पार्क में बोतल बीनने जाने की क्या जरूरत थी?

चाची ने किसी तरह बदरू को चुप करवाया और थाने जा के रिपोर्ट लिखनवाने को राजी किया । तीनो थाने पहुंचे तो सिपाही ने उन्हें  रोक लिया और आने का कारण जनाना चाहा ।
बदरू के बताने पर की रूबी के साथ बलात्कार हुआ है तो सिपाही बिफर गया और डांटते हुए बोला-
" साले ... भो@$# के ..... खुद धंधा करवाता है और पैसे न मिलने पर झूठी रिपोर्ट लिखवाने आ गया! .... भाग यंहा से "
" अरे साब! आप ऐसे कैसे कह रहे हैं ....."हम ऐसे आदमी नहीं है हमारी बच्ची के साथ सच में जबरजस्ती हुई है " बदरू ने गिड़गिड़ाते हुए कहा ।
" जबरजस्ती हुई है ! साले तेरी लड़की वंहा गई क्यों ? .... धंधा ही करने गई थी न !वो उठा के ले तो गए नहीं थे तेरी लड़की को .... सब समझता हूँ तुम जैसे लोगो की चाल.... तेरी झोपडी पट्टी की सब लड़कियां ऐसे ही करती है .... साले बांग्लादेशी है न तू? अभी सुबह सुबह साहब का दिमाग मत खराब कर वर्ना तुझे ही अंदर कर दूंगा" सिपाही ने इस बार कड़ी चेतावनी जारी कर दी।

सिपाही द्वारा बेज्जती करने के बाद तीनों वँहा से निराश हो अपनी झुग्गी में आ गएँ ।

कुछ महीने बाद रूबी गर्भवती हो गई, बदरू और उसकी पत्नी बड़े दुखी हुए। बदरू रोज रूबी को कोसता,उसकी पत्नी भी रूबी से नाराज रहती । एक दिन बदरू की पत्नी यनीं रूबी की चाची ने रूबी का गर्भपात का निश्चय किया और इस की सलाह लेने के लिए वह अपनी एक पड़ोसन के पास पहुंची ।

पड़ोसन ने जब रूबी के बारे में सुना तो उसने खुश होते हुए कुछ समझाया रूबी की चाची को जिससे सुन रूबी की चाची भी खुश हो गई। घर आके  जब उसने पड़ोसन की सलाह बदरू को सुनाई तो वह भी खुश हो गया।

उस दिन के बाद बदरू और उसकी पत्नी ने रूबी से कुछ नहीं कहा बल्कि उसका  गर्भपात न करवाने के लिए भी राजी हो गएँ।

रूबी की चाची ने रूबी को समझाते हुए कहा - देख रूबी अब जो गया सो हो गया .... इसमें बच्चे की क्या गलती? तू बच्चे को जन्म..हम पालेंगे बच्चे को... बच्चे तो ऊपरवाले की देन होते हैं ... यंहा कौन से हमारे रिस्तेदार हैं जो हमारी बदनामी होगी?"

रूबी ने जब यह सुना तो अपने चाचा-चाची की नेकदिली पर उसे ख़ुशी हुई।


थोड़े  महीने बाद रूबी ने एक बच्चे को जन्म दिया , बदरू और उसकी चाची बहुत प्रसन्न हुए ।

कुछ दिनों बाद रूबी को अपने बच्चे के साथ रेडलाइट पर भीख मांगते हुए देखा गया । उसकी चाची की पड़ोसन ने यही समझाया था कि आज कल किसी लड़की की गोद में बच्चा हो तो लोग सहानभूति से अधिक भीख देते हैं।

अब रूबी कूड़ा बीनने से अधिक कमा ले रही थी, बदरू और उसकी पत्नी की 'कमाई' बढ़ गई थी।

बस यंही तक थी कहानी.....

फोटो साभार गूगल-

Tuesday, 4 April 2017

सर्वशक्तिमान ईश्वर और जीव के चार वर्ग-

  " अरे केशव!...... सुनो तो जरा!" किसी ने पीछे से तेज  आवाज दी ।
केशव ने मुड़ के देखा तो ये मुन्ना बाबू थे, मुन्ना बाबू पड़ोस में ही रहते है केशव के । काफी पढ़े लिखे और किसी कंपनी में ऊँचे ओहदे पर थे, पड़ोस में रहने के कारण कभी कभी मिलना हो जाता है उनसे । कभी ज्यादा बात चीत नहीं हुई बस अभिवादन कर हाल चाल पूछने तक ही सीमित रही।

" नमस्ते मुन्ना जी ..... क्या हाल हैं?" केशव ने पूछा।
" नमस्ते....सब ठीक हैं...." मुन्ना बाबू ने जबाब दिया।
" कहिये कैसे याद किया? " केशव ने मुस्कुरा के पूछा।
" कुछ नहीं!सुना है आज कल तुमने ईश्वर /भगवान/ अल्लाह /गॉड सब को मानना छोड़ दिया है...एक दम 'नास्तिका वाले' हो गए हो?" मुन्नाबाबू ने व्यंगात्मक मुस्कुराहट लिए पूछा ।

केशव ने कुछ जबाब नहीं दिया मुन्नाबाबू की बात का केवल मुस्कुरा दिया।

" का.... माने !बिलकुल भी नहीं मानते ईश्वर को?" मुन्नाबाबू ने फिर जोर देके पूछा शायद उन्हें केशव का चुप रहना रास नहीं आया और वो कुछ ठोस जबाब चाहते थे ।

"आप मानते हैं ईश्वर को?"केशव ने उनसे पूछा।

"हाँ हाँ क्यों नहीं? उल्टा हम से ही पूछ रहे हो? हम तो मानते हैं  सर्वशक्तिमान ईश्वर को, उसी ने हमें- तुम्हें ये पेड़ पौधे और पूरा ब्रह्माण्ड बनाया है .... वो सर्वज्ञ और सर्वशक्तिमान है " मुन्नाबाबू के जबाब में गर्व था । कुछ देर रुक वो फिर बोले-
" केशव भाई... तुम्हारी तरह नहीं की जिस सर्वशक्तिमान ने तुम्हे बनाया उसी को नकार दो .... हम प्रबल रूप से मानते हैं कि ईश्वर है "

" तो आपका ईश्वर सर्वशक्तिमान है ? " केशव ने सर्द लहजे में पूछा।
" बिलकुल ... वह सर्वशक्तिमान है ....सब कुछ कर सकता है जो इंसान के बस की नहीं और न ही तुम्हरे विज्ञान के बस की " मुन्नाबाबू का गर्व अब दुगना था।

"तो ठीक है ! क्या आपका सर्वशक्तिमान ईश्वर सामने वाले  10 मंजिला फ्लैट के टॉप से कूद के आत्महत्या कर सकता है ?" केशव ने फ़्लैट की तरफ इशारा करते हूए पूछा।

शायद ऐसे सवाल की आशा न थी मुन्नाबाबू को ,अतः वो आश्चर्य से केशव को देखने लगे ।
"यदि आप कहते हैं कि ईश्वर सर्वशक्तिमान है तो वह बिल्डिंग से कूद भी सकता है ..... है कि नही?" केशव ने आगे कहा।

मुन्नाबाबू अब भी खामोश थे ,वह एक टक देके जा रहे थे । मुन्नाबाबू को खामोश देख केशव वंहा से चलने के लिए पैर उठाया ही था कि जैसे मुन्नाबाबू को होश आया हो ।उन्होंने केशव को रोकते हुए कहा - "अरे इतनी जल्दी क्या है जाने की ? चलो यह तो मानते हो की ग्रन्थो में ऐसी वैज्ञानिक बाते पहले के लोग लिख गएँ है जिनको आज के वैज्ञानिक मानते है"

" जैसे?" केशव ने वापस रुकते हुए कहा।
" जैसे .... ग्रन्थो में बहुत पहले ऋषियों ने लिख दिया था कि जीवन चतुष्टय है.... अंडज, जेरज , स्वदेज और उद्भिज्ज । यह तो वैज्ञानिक थ्योरी है जिनको प्राचीन ऋषि लिख गएँ और आज के वैज्ञानिक भी मानते हैं"  एक बार फिर मुस्कुराहट फैल गई थी मुन्नाबाबू के चेहरे पर लगता था कि अब चित ही समझो केशव को।

"हम्म.... अंडज यानि अंडों से पैदा होने वाला जीव, जेरज अर्थात पेट की झिल्ली में लिपटे हुए जन्मना, स्वेदज अर्थात पसीने से पैदा होने वाले और उदभिज्ज् जो धरती से पैदा हो जैसे पेड़ पौधे....,ठीक? " केशव ने पूछा।
"बिलकुल ठीक!..... अब बताओ वैज्ञानिक मान्यता है कि नहीं यह? " मुन्नाबाबू ने तपाक से पूछा।

" न! यंहा भी गड़बड़ है " केशव ने मुस्कुराते हुए कहा ।
" कैसे गड़बड़ है?" मुन्नाबाबू ने फिर आश्चर्य से पूछा।

" गड़बड़ यह है साहब की जिन जूं आदि प्राणियों को आपके ग्रन्थ स्वेदज यानि पसीने से पैदा बताते हैं वे दरसल गांदगी से पैदा होते हैं और सब अंडज है ... स्वेदज एक तरह का फालतू वर्ग है।ठीक वैसे ही जैसे राहु केतु ग्रह ।
उदभिज्ज वर्ग भी पूरी तरह सही नहीं है, समुन्द्री सेवाल ,काई जैसे पौधे धरती फोड़ के पैदा नहीं होते अतः सभी पेड़ पौधों को एक ही वर्ग में रखना अज्ञानता ही है।
इसके अलावा एक कोशीय जीव न तो अंडज हैं न जेरज और न किसी चतुष्टय वर्ग में ही आते हैं ..... आपके त्रिकाल दर्शी  ग्रंथकार 'वैज्ञानियो' को शायद इसका पता न था " केशव कहता जा रहा था और मुन्नाबाबू बिना कुछ बोले एक टक सुने जा रहे थे ।

" स्पंज नामक प्राणी के बारे में तो सुना होगा आपने? बताइये आपके ग्रन्थकार वैज्ञानिक अपने किस चतुष्टय वर्ग में रख गएँ है इसे ? केशव ने सवाल किया मुन्नाबाबू से ।

मुन्नाबाबू जैसे हड़बड़ा के नींद से जागे हों , वह लगभग अटकते हुए बोले-
"आं.... वो... बो..." इतना कह चुप हो गएँ।


केशव आगे बढ़ गया ..... इस बार मुन्नाबाबू ने आवाज नही लगाई ।