Monday, 17 July 2017

एक शहीद ये भी-



कल दिल्ली में चार सफाई कर्मियों की मौत की खबर पढ़ी, सेफ्टिक टैंक को साफ़ करने के दौरान जहरीली गैसों से उनका दम घुटने के कारण उनकी मौत हो गई।
यह पहली घटना नहीं बल्कि ऐसा कोई दिन ही होता होगा जब देश के किसी न किसी कोने में किसी न किसी सफाई कर्मचारी की मौत होती है ।

यदि कोई सैनिक बार्डर पर दुश्मनों से लड़ता हुआ मारा जाता है तो उसके प्रति पुरे देश की आम और ख़ास जनता में शोक और संवेदनाओं की लहर दौड़ पड़ती है , ऐसा होना भी चाहिए आखिर सैनिक हमारी ही सुरक्षा के लिए शहीद होते हैं।
सफाई कर्मचारी भी हमारी ही सुरक्षा में लगा एक सैनिक ही होता है जो हमारे लिए ही शहीद होता है ,किन्तु जब वह शहीद होता है तो देश में कोई शोक और संवेदनाओं की लहर नहीं होती। उसके शहादत पर कोई चर्चा नहीं होती , शायद ऐसी जातियता की मानसिकता के कारण होता है।

सफाई कर्मचारी ....जो नंग्गे बदन बिना किसी जीवन रक्षक उपकरण के बदबूदार , जहरीली गैसों से भरे गटर में उतर जाता है बिना अपनी जान की परवाह किये ठीक वैसे ही जैसे एक सैनिक हमारी रक्षा के लिए बिना बुलेटप्रूफ जैकेट के उतर जाता है मैदान में ।
ये सफाईकर्मी जो उतर जाता है गटर साफ करने ताकि शहर में गंदगी न हो ... ताकि हमारे घरो -सड़को में गंदगी न हो और देश की जनता परेशान न हो बीमार न पड़े ....स्वस्थ रहे ।
बार्डर पर दुश्मन पडोसी मुल्क का सैनिक होता है जबकि यहाँ बीमारियां और जनता की परेशानियां जिससे एक सफाई कर्मचारी बखूबी अपने कर्तव्य का पालन करते हुए लड़ता है ।

सोचिये जब भरी बारिश होती है , शहर के गली मोहल्ले की सड़के पानी और कूड़े करकट से बिलकुल जाम हो जाती है जिनमे पैदल चलना भी नामुमकिन हो जाता है , हमारे घरो तक में पानी भर जाता है जीवन दूभर हो जाता है । तब ऐसे में सफाई कर्मचारी नाम का सैनिक बिना किसी जीवन रक्षक उपकरण के अपनी जान पर खेल, दिन रात जानलेवा गटर में घुस घुस के उसे साफ़ करता है ताकि हमारा जनजीवन सुगम हो सके ।

आउटलुक पत्रिका में छपी रिपोर्ट के अनुसार देश में हर साल लगभग 1000 सफाई कर्मचारी गटर साफ़ करते हुए शहीद हो जाते हैं । आउटलुक पत्रिका यह दावा करती है की उसके पास 2015 में मारे गए सफाई कर्मचारियों जिनकी मौत सैफ्टिक टैंक और गटर साफ करते हुई है उनका ब्यौरा है जिसकी संख्या 300 से अधिक है ,ये आंकड़े स्वयं पत्रिका ने एकत्रित किये है जबकि पूर्ण आंकड़े सरकार उपलब्द करवाने में असमर्थ है मृतको की संख्या सालाना 1000 से अधिक भी हो सकती है ।

आगे पत्रिका लिखती है की चैन्नई के तांबरम में रहने वाली नागम्मा अभी साफ़ सफाई का कार्य करती हैं । उनकी दो बेटियां है , उनके पति की मृत्यु 2007 में गटर साफ़ करते हुए थी जिसमें तीन अन्य सफाई कर्मचारियों की भी मौत हुई थी , सरकार ने कोई भी आर्थिक मदद नहीं की और न ही अन्य लोगो ने ।कहते कहते नागम्मा के आँखों में आंसू आ जाते हैं ।

हैदराबाद की दलित बस्ती में एक गन्दी सी झोपडी में बड़ी मुश्किल से गुजर बसर करने वाली श्रीलता बताती है उनके पति की मृत्यु सैफ्टिक टैंक साफ़ करते हुए मौत हुई उनकी 8 साल की बेटी ग्रीष्मा बताती है की वह बड़ी होके डॉक्टर बनना चाहती है क्यों की डॉक्टरों ने उसके पिता का इलाज ठीक से नहीं किया ... पापा गटर से बहार निकाले गए थे न इसलिए कोई डॉक्टर उन्हें छूने को तैयार न था ... मैं बड़ी होके अपने लोगो का ढंग से इलाज करुँगी " यह कह के ग्रीष्मा और उसकी माँ दोनों रोने लगे।

जिस समय आप मेरा लेख पढ़ रहे होंगे उस समय देश में हजारो सफाई सैनिक अपनी जान जोखिम में डाल के गटर और सीवर में उतर रहें होंगे ताकि आम जनता बीमारियो से बची रहे पर वह सैनिक खुद विषाणुओं और जहरीली गैसों से अपनी जान नहीं बचा पाता। मरने वाले सफाई सैनिको के परिवारवाले कितने दयनीय स्थिति में रहते हैं और जिन्दा रहने के लिए कितना संघर्ष करते हैं इसकी कल्पना करना मुश्किल है ।

केंद्र सरकार से लेके राज्य सरकार और जिला प्रशाशन की भयानक अवहेलना झेलते इन सफाई सैनिक परिवरो को भी देश के लोगो की सांत्वना और मदद की जरुरत है .... ठीक वैसे ही जैसे बार्डर पर मरने वाले सैनिक परिवारो को ।

एक बात और, जिस दिन गटर /टैंक  सफाई करते समय सिर्फ एक जाति विशेष के लोग न मर के अपने को उच्च जाति के कहलाने वाले भी मरने लगेंगे उसी दिन सफाई का काम मशीनों द्वारा होने लगेगा।
तब तक हम अभिशप्त हैं अपने भाइयों की मौत पर रोने के लिए ....


Sunday, 16 July 2017

शिव-


शिव की की कल्पना मुख्यतः अवैदिक थी और मूल रूप से अस्ट्रिको/ द्रविड़ संस्कृति की देन  है ।

शिव का तमिल नाम सिवन है जिसका अर्थ लाल या रक्त वर्ण होता है । ऋग्वेद में रूद्र का जिक्र है जो बहुत कुछ शिव के समान ही हैं , जटाधारी , प्रकृति रूप से भयानक ।रूद्र का अर्थ भी लाल ही होता है ।
इसी प्रकार शम्भू शब्द की तुलना तमिल के 'सेम्बू' से की जाती है जिसका अर्थ होता है तांबा या लाल धातु।

रामधारी सिंह दिनकर कहते हैं कि वैदिकों का रूद्र कुछ कुछ अवैदिको के शिव / सिवन जैसा ही था अतः थोड़ी कठिनाई के बाद रूद्र शिव में विलीन हो गए इसकी पुष्टि शिव के विषय में कही जाने वाली एक कथा से होती है जिसमे दक्ष प्रजापति के यज्ञ में शिव को स्थान नहीं दिया गया था ।शिव पार्वती का विवाह भी बेमेल सा है जिसमे पार्वती की माता शिव को दामाद के रूप में बिलकुल पसन्द नहीं करती हैं।
सम्भवतः बाद में वैदिकों और अवैदिको में विवाह संबंधों के कारण शिव को रूद्र के रूप में स्वीकृति मिली , अथवा सांस्कृतिक आदान प्रदान से शिव रूद्र बने। अतः ऑस्ट्रिको / द्रविड़ो के जो ताम्रवर्ण प्रतापी देवता थे वे वैदिकों के मारुतस्वामी रूद्र से मिल गएँ।

धीरे धीरे शिव का रूप अत्यंत विकसित हो गया जिसके एक छोर पर ऑस्ट्रिको/ द्रविड़ो के पारंपरिक शिव जो फक्कड़, दयालु, भांग पीने वाले , भयंकर रूपरंग लिए  जंगली जनजातियो के नायक ,सिंह की खाल ओढ़े ,  नृत्य करने वाले थे तो दूसरे छोर पर वैदिकों के रूद्र जो दार्शनिक रूप में दर्शाए जाने लगे।

एक बात और गौर करने लायक की सिंधु सभ्यता ताम्र सभ्यता थी ,लोहू का अर्थ तांबे के लाल रंग से ही है। सिंधु सभ्यता  में  जो ध्यानस्थ , सींगों का टोप पहने ,चारो तरफ जंगली पशुओँ का जमावड़ा आकृति मिली है वह ऑस्ट्रिको / द्रविड़ो के सिवन या सेम्बू से काफी हद तक मिलती है।

भारत में एक और जाति के लोगो का उल्लेख मिलता है वे हैं किरात , संस्कृत ग्रन्थो में इन्हें मलेच्छ कहा गया है। किरात जाति के लोग तिब्बत से लेके नेपाल,मणिपुर , असम , त्रिपुर, उत्तर प्रदेश ,बिहार तक फैले हुए हैं।
किरात लोग भारत में कब आये यह कहना तो मुश्किल है किंतु इनका अस्तित्व भारत में अति प्रचीन रहा है , आर्यो से भी पहले का ।
महभारत में जब अर्जुन का युद्ध शिव से हुआ था तो वे किरात के भेष में ही थे। चित्रगन्धा किरात राजकुमारी ही थी।
किरात जाति का मुख्य अधिपत्य हिमालय रीजन में था , शिव का भी निवास स्थान हिमालय ही बताया जाता रहा है।

गंगा के कई मैदानी इलाकों में 'कीरा'शब्द प्रसिद्ध है जिसका अर्थ 'साँप ' से लिया जाता है , कीरा शब्द किरात का अपभ्रंस है । शिव जी के गले में साँप की माला है  जो इस बात का द्योतक है कि सांप शिव के अति प्रिय रहे होंगे।
अर्थात किरात जाति कभी शिव की अनुयायी रही होगी या शिव उन्ही की जाति के कबीले के  कोई नायक रहे होंगे ।

बौद्ध ग्रन्थो में नागों को बुद्ध का अनुयाई बताया गया है, नाग जाति के लोग बुद्ध की सुरक्षा करते थे । बुद्ध के सबसे पहले अनुयाई वही लोग बने थे ,बुद्ध को भोजन कराने वाली सुजाता नाग जाति की कन्या थी। दिनकर जी जैसे इतिहासकार कहते है कि लिच्छवी और शाक्य(सक्क)  वंशीय जनजाति किरात भंडार से निकले थे । इसलिए बुद्ध के प्रति नागों में विशेष सम्मान था।

अब बुद्ध और शिव में क्या कुछ सम्बन्ध हो सकता है?



Thursday, 29 June 2017

बरसात की एक रात-


शाम  से ही घने -श्याम मेघों का जमवाड़ा आसमान में शुरू हो गया था , कई दिनों की बदन झुलसाउ गर्मी के बाद काले मेघों का दीदार  नैसर्गिक आंनद की अनुभूति करवा रहा था ।

तक़रीबन डेढ़ -दो घण्टे जी भर के उमड़ने -घुमड़ने  बाद काले मेघों ने अपने कंधे पर लादे वजन को कम करना आरंभ कर दिया , कंधे से मुक्त हुई जल की बूंदे धरा से मिलने के लिए बैचैनी  यूँ भागीं जैसे अपने प्रीतम से मिलने कोई प्रेमिका।

झमा-झम वर्षा ....

मैंने दुकान में से झांक के बाहर देखा तो भगदड़ सी मची हुई थी, लोग वर्षा से बचने के लिए इधर-उधर छुपने की जगह तलाश रहे थे। जिसको जंहा जगह वंही छुपने की कोशिश कर रहा था , मानो वर्षा की बूंदे न होके आग के गोले हों जो उन्हें जला के भस्म कर देंगे अथवा वे खुद कागज़ के बने हों बस पानी पड़ते ही गल जायेंगे।

कुछ ही देर में मेरी दुकान के शैल्टर के नीचे बारिश से बचने के लिए काफी लोग एकत्रित हो गएँ थे ।

मुझ से रुका नहीं जा रहा था  , मन कर रहा था कि भाग के बाहर जाऊं और बारिश में खूब नहाऊं। न जाने कितने दिन बीत गए थे वर्षा की बूंदों को अपनी हथेलियों से पकडे हुए । पानी में छप-छप पैर मार के किसी छोटे बच्चे की तरह उछले हुए।

कुछ देर अपने को नियंत्रित किया ,किन्तु  स्ट्रीट लाइट की पीली रौशनी में गिरती बूंदों की चमक ने आख़िर अपना काम कर ही दिया । मैंने तुरन्त अपने  हैल्पर से दुकान बन्द करने को कहा । पहले तो वह तैयार न हुआ ,कहने लगा की ऐसी बारिश में दुकान बंद कर के कैसे घर जाएंगे? भीग जायेंगे।

मैं मुस्कुरा के कहा  "बेवकूफ़ !आज भीगना ही तो है ..... इतना रूमानी मौसम रोज नहीं होता"।
वह मुझे आश्चर्य से देखने लगा ,फिर थोड़ा जोर देने पर दुकान का शटर डाउन कर दिया ।
मैंने अपना मोबाइल और पर्स एक प्लास्टिक की थैली में रखा और शटर का ताला लगा के सड़क पर खड़ी मोटरसाइकिल के पास आ गया।

शैल्टर के नीचे खड़े लोग मुझे देखने लगे थे ,जैसे कह रहे हों " बेटे भीग ले .... बीमार पड़ेगा तब पता चलेगा "

मैंने लोगो को चिढ़ाने वाले अंदाज में उनकी तरफ देखा जैसे कह रहा हूँ " डरपोक!" और मोटरसाइकिल में किक मार के चलता बना ।

बारिश में मोटरसाइकिल चलाते हुए भीगने का मजा ही कुछ और होता है खास कर तब जब लोग अपनी मोटरसाइकिल्स को किनारे लगा के किसी पेड़ या छज्जे के नीचे दुबके पड़े हों। आप उन पर उपहास की दृष्टि डालते हुए  उनके सामने से हुर्र- हुर्र करती हुई अपनी मोटरसाइकिल पर निकल जाएं।

लगभग एक किलोमीटर की दूरी ऐसे ही गर्व से भीगते और बारिश का जम के मजा लेते हुए निकाल गया। रास्ते में एक नाला पड़ता है , जिसकी दीवार के सहारे कई बंजारों ने अपनी अस्थाई झोपड़ियां बनाई हुई है ।

जैसे ही उन झोपड़ियों के पास पहुंचा अचानक मेरी नजर एक झोपड़ी पर पड़ी। देखा तो एक स्त्री और उसके तीन छोटे छोटे बच्चे जो की दस साल से कम ही रहे होंगे बारिश में भीग के अपनी झोपडी की छत पर फटा हुआ तिपाल बिछा रहे हैं । अंदर पूरा सामान गीला हो चुका था , तेज बारिश के कारण झोपड़ी की सड़ चुकी प्लास्टिक  तिरपाल जो छत का काम करती थी बुरी तरह से टपकने लगी थी जिससे सारा सामान भीग गया । झोड़पी के बाहर कच्चा चूल्हा भी टूट चुका था। स्त्री और उसके बच्च चिंता में  भीगते हुए फ़टी हुई तिरपाल से अपने सामान को खराब होने की नाकामयाब कोशिश कर रहे थें। मैं सोचने लगा की ये लोग क्या खाएंगे और कैसे सोयेंगे रात में यदि बारिश यूँ ही पड़ती रही तो? 

एक दूसरी झोपडी में सड़क का गंदा पानी घुस गया था ,जिसे पूरा परिवार गिलास और टूटे हुए कटोरों से निकालने की कोशिश कर रहा था । वे झोपडी स  जितना पानी निकालते उससे अधिक वापस अंदर जा रहा था।

ऐसा ही हाल लगभग हर झोपडी का था । मैं काफी देर तक यूँ ही खड़ा उन अस्थाई झोपडी वाले बंजारों  बारिश से लड़ने की जद्दो-जहद को देखता रहा । बारिश उनके लिए एक अभिशाप थी।

अब बारिश की बूंदे मुझे अंगारे लगने लगे थे , ये अंगारे मेरे बदन के साथ -साथ मेरे हिर्दय को भी भस्म किये जा रहे थे । अब मैं चाह रहा था कि बारिश उसी क्षण  बंद हो जाये।

Tuesday, 27 June 2017

बारात-कहानी

"अरे ओ घुरहू....... " हरिकेश पाण्डेय ने खेत की मेढ़ पर खड़े लगभग  चिल्लाते हुए आवाज लगाई।

कंधे पर फावड़ा लिए अपने खेत की तरफ जाते हुए घुरहू ने जब पाण्डेय जी की 'गर्जना' सुनी तो वंही ठिठक कर रुक गया। घुरहू ने तुरन्त भय से दोनों हाथ जोड़े लिए और सर को झुकाते हुए कहा- " पाय लागू पण्डे जी "

"हम्म बड़ी मस्ती में जा रहा है ? क्या बात है ? " पाण्डेय जी ने  पूछा ।

" पाण्डे जी ... उ हमरे बड़का बेटवा चंद्रवा का बिआह पक्का हो गइल ,अगले महीनवा में " घुरहु का चेहरा ख़ुशी से खिल गया किन्तु नजरे झुकी ही रही।

" अच्छा, वही चंद्रवा जो बम्बई गया है कमाने क्या? पाण्डेय जी ने पूछा ।

" हाँ जी , उहै चंद्रवा .... बम्बई में कौनो फैक्ट्री में  सुपरवाइजर है । अब बिआह लायक होइ गइल बाय और कमाई भी ठीक बाय ओकर " घुरहु ने कहा

पाण्डेय जी घुरहू की इस बात पर थोड़ा असहज होते हुए कहा - " ठीक है , चमरौटी में सबन के लड़के धीरे धीरे बाहर निकल रहें और शहर में काम धाम कर के अच्छा पैसा काम रहें है , अइसन ही चली तो यंहा खेतो में काम कौन करेगा? हुक्का- पानी बन्द करना पड़ेगा का तुम लोगन का ?"

घुरहु बुरी तरह सहम गया पांडेय जी की धमकी से  हाथ जोड़ते हुए कहने लगा -
" पांड़े जी, हम हैं न मजदूरी करने के लिए , अब लडिके बाले थोडा पढ़ लिख लेहल त दुइ पैसा कमाए चली गइलन "

"चल ठीक है जैसी तुम लोगो की मति ....अब जा  इहाँ से " - पाण्डेय जी ने घुरहु को झिड़कते हुए कहा , घुरहु ने पाण्डेय जी के पैर छुए और तेजी से खेतो की तरफ निकल गया ।

उत्तर प्रेदश का यह एक छोटा सा गाँव था , जिसमे करीब 80 घर होंगे  ,जिसमे 20-25 घर दक्षिण दिशा में बसे चमरौटी टोले में और बाकी के या तो  सवर्णो या उससे कुछ नीची जातिओ के।

गाँव से बहार जाने के लिए एक ही मुख्य रास्ता था जो की सवर्णों के टोले से होके गुजरता था ,

ठीक एक महीने बाद ,घुरहु के घर में शादी की तैयारी हो रही थी । चंद्रपाल मुम्बई से अपनी शादी के सभी जरुरी सामान ले आया था, नया सूट और काले चमकते जूते ,सेहरा आदि सभी कुछ। मुंबई में रहने के कारण उसे शहर के रहन -सहन की कुछ आदत हो गई थी इसलिए वह अपनी शादी भी शहर के रिवाज की तरह करना चाहता था । बैंड बाजा, घोड़ी,शहरी कपडे आदि सब का उपयोग करने का अरमान था उसे अपनी शादी में ।

चंद्रपाल ने पास के कसबे से अंग्रेजी बैंड और घोड़ी भी माँगा ली थी  साथ ही बारात के लिए  एक ट्रैक्टर -ट्राली और दुल्हन लाने के लिए  जीप ।


 जैसे ही अंग्रेजी बैंड और सजी हुई घोड़ी चमरौटी टोले में पहुंची  के लोग उन्हें सुनने और देखने के लिए जमा होने लगे।आज तक उनके टोले से किसी की भी बारात में न तो अंग्रेजी बाजा आया था और न ही घोड़ी पर चढ़ के किसी ने बारात ही निकाली थी इसलिए कोतुहल जबरजस्त था चमरौटी टोले में ।

जैसे ही बैंड बाजे वालो ने बैंड पर धुन बजानी शुरू की बच्चे ख़ुशी से उछलने लगे।बुजुर्ग जिन्होंने अपनी पूरी जिंदगी में सजी घोड़ी और बैंड बाजा नहीं देखा था अपनी बिरादरी की शादी में वे सब काम छोड़ बैंड वाले के पास जमीन पर ही बैठ के उन्हें देखने लगे थे । कई तो उत्सुकतावश घोड़ी को छू भी आते ।

घुरहू सीना फुलाए  घूम घूम के सब तैयारियों को जल्दी जल्दी पूरा करवाने में व्यस्त था ।

 आस पास के बिरादरी वाले भी चंद्रपाल की बारात निकासी देखने के लिए जमा होने लगे थे ।

तय समय पर  बारात निकासी होनी शुरू हो गई । चंद्रपाल सूट पहन के घोड़ी पर बैठे था ,सर पर सजे सेहरे की कलगी दूर से ही चमक रही थी मानो कोई राजकुमार बैठा हो।

बैंडबाजे वाले कभी भंगड़ा बजाते तो कभी फ़िल्मी धुन,  पुरे टोले के बच्चे बैंड पर नाच नाच के गिरे जा रहे थे । घोड़ी के साथ औरते स्थानीय भाषा  में गीत गाती चल रही थी , कुछ पुरुष घोड़ी के साथ चल रहे थे तो कुछ पहले ही जाके गाँव से बहार खड़ी  बारात की  ट्राली में बैठ गए थे ।

 चंद्रपाल की बारात घोड़ी और बैंड बाजे के साथ नाचते-गाते  मुख्य सड़क पर आ गया गई थोड़ी ही देर में  बारात   सवर्णों के टोले में प्रवेश कर गई।

 अभी कुछ दूर ही पहुँचे थे वे लोग  कि लगभग 20-30 लोगो की  भीड़ लाठी डंडो से लैस ठाकुर हरदेव के घर से निकल के चंद्रपाल की बारात पर टूट पड़ी , ऐसा लग रहा था की वे लोग पहले से तैयारी कर के बैठे थे ।

 इस अप्रत्याक्षित हमले से बारात में भगदड़ मच गई, चारो तरफ चीख-पुकार से माहौल गूंज उठा । बैंड वाले अपना बैंड छोड़ के भाग चुके थे ,घोड़ी वाला भी कंही गायब हो गया था।

हमलावर ना तो स्त्री देख रहे थे और ना ही  पुरुष सब पर लाठी -डंडे बरसा रहे थें । एक हमलावर  ने चंद्रपाल को घोड़ी से खींच लिया और जमीन पर पटक दिया ।
हमलावर के खींचने से सूट चर्र कर के फट गया ,सेहरा उछल के दूर जा गिरा । चंद्रपाल के गिरते ही उस पर अनगिनत लाठियों से प्रहार शुरू हो गया । कुछ ही क्षणों में कंही से उसका हाथ टूट गया तो कंही से पैर, सर पर लाठी लगने से खून की धारा बह के सड़क पर पडी धूल में मिल रही थी।
थोड़ी देर चीखने के बाद चंद्रपाल का शरीर शिथिल पड़ गया ।

  हमला करने वाले अभी भी शान्त न हुए थे ,वे लाठी डंडों से वार करने से साथ- साथ भद्दी गालियां देते हुए कह रहे थे- तुम चमा%# की इतनी हिम्मत की हमारे दरवाजो के सामने से घोड़ी पर चढ़ के बारात।निकालो!!..... भो#$% बहुत गर्मी चढ़ी है तुम लोगो को .....माद%^*@


चंद्रपाल बेहोश पड़ा था , घुरहु तथा अन्य बारातियो को भी गंभीर चोटे आई । हमलावरों का खेल तक़रीबन 10 मिनट चला , उसके बाद वे हमलावार बारातियो को चीखते पुकारते हुए पास के घरो में गायब हो गए ।

जो बाराती पहले ही गाँव से बाहर खड़ी ट्राली और जीप में बैठ गए थे  वे चीख पुकार सुन के घटनास्थल पर पहुंचे । जिस जीप  में चंद्रपाल की बारात जानी थी अब उसी में उसे और अन्य घायलों को जिला अस्पताल में भर्ती कराने ले जाया जा रहा था।

चंद्रपाल की माँ दहाड़े मार के रोते हुए  घायल चंद्रपाल और घुरहू को हवा कर रही थी। बदहवासी में हाथ का कोई पंखा ना मिला तो जीप में रखे अखबार को मोड़ के ही हवा करने लगी थी।

मुड़े हुए अखबार के मुख्य पेज पर एक खबर छपी थी - एक दलित बनेगा भारत का राष्ट्रपति' 

Thursday, 1 June 2017

जानिए क्या गौतम ही बौद्ध धर्म के संस्थापक थे ?

  एक आम धारणा यह है कि गौतम(गोतम) बुद्ध ने सर्वप्रथम बौद्ध धर्म की स्थापना की ।बुद्ध को हिंसा या शव को देख वैराग्य उत्पत्न हुआ और उसके बाद उन्होंने गृह छोड़ के जंगल में ज्ञान प्राप्त किया तथा बौद्ध धर्म की स्थापना की।

किन्तु ,यदि हम बौद्ध साहित्य जैसे की दीपवंश जो की पालि वंश - साहित्य की सर्वप्रथम रचना है ( इतिहासकारो ने इसका काल 307-247 ईसा पूर्व माना है) उसके अनुसार देखते हैं तो गौतम से पहले भी प्रत्यक्ष रूप से तीन अन्य बुद्धों का जिक्र है ।

दीपवंश के सत्रहवें परिच्छेद( महिंदस्स परिनिब्बान) में कहा गया है -
अभयं वट्ठमान ...... सासने ।(6)
से लेके
तिस्सस्स ........ दग्गमानसो ( 86)

अर्थात , चारो बुद्धों के शासन में चार पुरों( नगरों) के पृथक पृथक नाम थे
1- अभय - ककुसन्ध बौद्ध के समय लंका में प्रथम धम्मोपदेश स्थल रहा ।
2- वर्धमान- कोणागमन ( कोनागमन)बुद्ध के समय
3- विशाल- कस्सप बुद्ध के समय
4- अनुराधपुर- गौतम बुद्ध के समय

दीपवंश कहता है कि गौतम से पहले ककुसन्ध फिर कोणागमन उसके बाद कस्सप और फिर अंतिम गोतम बुद्ध हुए।

इन चारों बुद्ध अवतारों( शास्ताओं) के समय कौन कौन से राजा थे यह भी बताया गया है-
1- अभय- ककुसन्ध बुद्ध के समय यह अभय नगर का राजा था।
2- समीद्द( समृद्ध) - कोनागमन बुद्ध के समय वर्धमान नगर का राजा था।
3-जयन्त - यह कस्सप बुद्ध के समय विशाल नगर का राजा था ।
4- देवानांम्पिय तिस्स -यह गौतम बुद्ध के समय अनुराधपुर का राजा था।

चारो बुद्धों के अवशेष इस प्रकार थे -
1- ककुसन्ध बुद्ध का अवशेष था धम्मकारक
2- कोनागमन बुद्ध का अवशेष था काय-बंध( करधन)
3- कस्सप बुद्ध का अवशेष था उनकी जल शिटिका
4- गौतम बुद्ध का अवशेष था उनकी अस्थियां।

चारो बुद्धों ने अलग अलग वृक्षो के नीचे ध्यान लगाया था।

1- ककुसन्ध ने शिरीश
2-कोनागमन ने उंदुबुर
3-कस्सप ने न्यग्रोथ वृक्ष के नीचे
4- गौतम ने अस्सत्थ(पीपल) के नीचे

चारो बुद्धों के काल में विपत्तियां( उपद्रव)
1-काकुसन्थ के समय प्रज्वरक ( ज्वार महामारी)
2-कोनागमन के समय दुर्वृष्टि ( वर्धमान नगर में विवाद)
3- कस्सप बुद्ध के समय विशाल नगर में उपद्रव हुआ ।
4- गौतम के समय यक्षो का उपद्रव हुआ ।

चारों बुद्धों के प्रधान शिष्य थे -
1- ककुसन्ध का महादेव
2-कोनागमनक सुमन
3- कस्सप का महान
4 -बुद्ध का महिद्दी( महिंदर)

दीपवंश प्रथम बुद्ध ककुसन्ध के बारे में कहता है कि सर्वप्रथम उन्होंने ही लंका ( उस समय उसका नाम ताम्रपार्नि ) देखा । उस समय लंका में पुन्नकरनक नाम का ज्वार महामारी फैली थी । सिंहली जनता दुःख से तड़प रही थी तब ककुसन्ध बुद्ध अपने चालीस हजार भिक्खुओ के साथ जम्बुद्वीप से वँहा( अभयपुर) पधारे और लोगो को रोगों से मुक्ति दिलाई। राजा अभय के आग्रह पर ककुसन्ध बुद्ध ने रुचिनन्दा भिक्खुनी से शिरीष बोधिशाखा मंगाई और अभय पुर के बोधिशाखा प्रतिष्ठित की।

इतना तो ऐतिहासिक प्रमाणिक है कि गोतम बुद्ध से पहले अन्य बुद्ध हो चुके थे , अतः यह कहना की बौद्ध धर्म गोतम ने चलाया यह धारणा मिथ्या ही है ।गोतम बौद्ध धर्म के संस्थापक नहीं बल्कि शास्ता थे।

भाषा वैज्ञानी राजिन्द्र प्रसाद जी मेजर फ़ोर्ब्स के जनरल ऑफ़ एशियाटिक सोसायटी जून अंक 1836 का हवाला देके कहते हैं ककुसन्ध का काल 3101ईसा पूर्व मानते हैं और कोनागमन ( कनकमुनि) बुद्ध का 2099ईसा पूर्व


Saturday, 27 May 2017

क्या रामायण बुद्ध के बाद की रचना है?

  वाल्मीकि रामायण में जब हमुमान लंका में सीता जी की खोज करते हुए जाते हैं तो वो लंका का वैभव देख आश्चर्य करते हुए कहते हैं -

 स्वर्गोस्य देवलोकाsयमिन्द्रस्येयं पूरी भवते ( वाल्मीकि रामायण, सुंदर कांड ,सर्ग -9 श्लोक 31)

हमुमान लंका को स्वर्ग के समान कहते ,इंद्रलोक के जैसा वैभवशाली कह आश्चर्यचकित हो उठते हैं।
अब जानिए की लंका इंद्रलोक या स्वर्ग की तरह वैभवशाली क्यों थी। वाल्मीकि रामायण फिर कहती है -
' भूमिगृहांशचैत्यगृहान उत्पतन निपतंश्चापि'( सुंदर कांड , सर्ग 12, श्लोक 15
अर्थात हनुमान भूमिगृहों और चैत्यों पर उछलते कूदते हुए जाते हैं ।

चैत्य शब्द वाल्मीकि रामायण में बहुत बार आया है , अयोध्याकाण्ड में ही कम से कम तीन बार आ गया है।

अब जानिए चैत्य शब्द का अर्थ-
चैत्य- बुद्ध मंदिर ( संस्कृत शब्दार्थ कौस्तुभ पेज 440)
चैत्य- चैत्यमायतने बुद्ध बिम्बे( मेडिनिकोष)
अर्थात चैत्य ,बौद्ध मंदिर को कहते हैं।

कहने का अर्थ हुआ की लंका निश्चय ही बौद्ध नगरी रही होगी जंहा बौद्ध चैत्य बहुतायत थे ।

इसके अलावा , अयोध्या कांड सर्ग 109 के 34 वें श्लोक में कहा गया है-


'यथा हि चोरः स तथा हि बुद्धस्तथागतं नास्तिकमत्र विद्धि।
तस्माद्धि यः शक्यतमः प्रजानां स नास्तिके नाभिमुखो बुधः स्यात् '

जिसका अर्थ गीता प्रेस की वाल्मीकि रामायण में इस प्रकार दिया है- जिस प्रकार चोर दंडनीय होता है उसी प्रकार वेदविरोधी बुद्ध( बौद्ध मतावलंबी ) भी।

इसके अलावा 15 वीं शताब्दी के गोविंराजकृत व्याख्या में इस श्लोक में आये शब्द 'तथागत ' की व्याख्या करते हुए कहते हैं ' तथागत बुद्धतुल्यम'
अर्थात तथागत का अर्थ बुद्ध जैसा ।

सुरेंद्र कुमार शर्मा (अज्ञात) पुरातत्व वैज्ञानिक ई.बी. कॉडवेल का हवाला देके बताते हैं कि सुंदर कांड ,सर्ग 9 से 13 तक में रावण के अंतःपुर के रात्रिकालीन दृश्य का चित्रण है ,जो अश्वघोष रचित ' बुद्धचरितम( 5/57-61) के गोतम के अंत पुर के दृश्य का अनुकरण है जो की बुद्ध आख्यान का आवश्यक अंग है जबकि वाल्मीकि रामायण का अनावश्यक ।

रामायण में छेद वाली कुल्हाड़ी का जिक्र है, प्रसिद्ध पुरातत्व वैज्ञानिक डाक्टर हँसमुख धीरजलाल सांकलिया ने निष्कर्ष निकाला है कि ईसा पूर्व 300 से 500 से पहले भारत में छेद वाली कुल्हाड़ी का प्रयोग नहीं होता था।

तो, क्या हम यह कह सकते हैं कि रावण दरसल बौद्ध अनुयायी था ? और रामायण की रचना बुद्ध के बहुत बाद की है? शायद पहली ईसा से कुछ पहले या बाद की ?



Tuesday, 23 May 2017

जानिए क्या बुद्ध ही कृष्ण थे?

  अच्छा! क्या आपको लगता है कि चक्र एक अच्छा हथियार हो सकता है? फिर कृष्ण ने ऐसा हथियार क्यों चुना जो अच्छा नहीं था ? कंही चक्र  को जानबूझ के है 'हथियार ' तो नहीं बनाया गया है ?
यदि चक्र को हथियार के रूप में हम देखते हैं तो किंदवंतियो और कथाओं में कृष्ण ही एक अकेले  ऐसा पात्र लगते हैं जो चक्र का इस्तेमाल करते हैं  । कृष्ण के चक्र का नाम सुदर्शन था जिसका अर्थ होता है 'दिखने में अच्छा' या ' जिसको देख के अच्छा लगे' , क्या हथियार को देख के किसी को अच्छा लग सकता है ? हरगिज नहीं! हथियार तो संहारक होता है ,मृत्यु लाता है , भय लाता है । फिर कैसे वह 'सुदर्शन' हो सकता है?

इतिहास में बुद्ध  के साथ भी चक्र जुड़ा हुआ है , बुद्ध ने धम्म चक्र ( धम्म चक्क -पवत्तन) चलाया था जिसके द्वारा आधी दुनिया में बौद्ध धम्म फैला दिया । उनके धम्म  चक्र के दर्शन इतने सु-दर्शन थे की लोग अनायास ही खिंचे चले आते थे ।

कंही बुद्ध का ही धम्म चक्क ही तो कृष्ण का सुदर्शन चक्र तो नहीं था?

कृष्ण के भाई बलराम जिसे शेषनाग का अवतार समझा जाता है वह द्योतक है कि कृष्ण का नागों से घनिष्ठ सबंध था।


बुद्ध का भी आदिवासी नाग जाति से घनिष्ठ उन्होंने नागों को अपने धर्म में दीक्षित किया । मुचलिन्द नाम के नाग जाति के व्यक्ति ने उनकी प्रकृतिक के प्रोकोप से उनकी रक्षा की थी। नालन्दा और संकस्या जैसे प्रमुख बौद्ध विहारों में नागों के प्रति विशेष श्रद्धा रखी जाति थी और इनका उत्थान नाग पूजा स्थलों से हुआ था।


कंही बुद्ध के प्रिय नागजाति के मुचलिन्द ही तो बलराम नहीं थे?


कृष्ण के जीवन के अंतिम समय उनके अपने सगे संबंधियों यानि  यदुवंश का नाश हो जाता है ,कौरव सहित सभी सगे सम्बन्धिय युद्ध में मारे जाते हैं । कृष्ण बिलकुल अकेले किसी अज्ञात जगह पर अपनी जीवन लीला समाप्त करते हैं।

बुद्ध की मृत्यु भी एक गुमनाम देहात में हुई ,परिचारिका के लिए केवल एक भिक्षु उनके साथ था ।उस समय तक युद्ध में उनके सगे संबंधियों यानि  शाक्य काबिले का नाश हो चुका था । उनके दोनों सरंक्षक राजाओं की दयनीय स्थति में मृत्यु हो चुकी होती है। जैसे कृष्ण के हितैषी कौरव और पांडवो की  ।

कंही बुद्ध को ही कृष्ण का चोंगा तो नही पहना दिया गया ?

क्या कहते हैं आप सब?

अगले लेख में कुछ और रोचक तथ्यों के साथ ...