Saturday, 6 January 2018

मरने के बाद की दुनिया?-


मनुष्य के मरने के बाद क्या होता है ? क्या इस दुनिया के अलावा भी ऐसी कोई अलौकिक दुनिया है जंहा मरने के बाद इंसान की आत्मा पहुँचती है? मरने के बाद उस आत्मा का क्या होता है? क्या वह दूसरी दुनिया ठीक वैसी ही जैसी यंहा की दुनिया?

ऐसे कई प्रश्न और जिज्ञासाएँ  इंसान के मस्तिष्क में प्रचीन काल से उमड़ते- घुमड़ते रहें है । साधारण मनुष्य के  इन्ही  स्वभाविक जिज्ञासाओं और प्रश्नो की महत्वता का लाभ उठाते हुए धूर्त लोगो ने इनके उत्तर में कई काल्पनिक कहानियां गढ़ लीं । स्वर्ग- नर्क , जन्नत - दोज़ख आदि  काल्पनिक स्थानों का निर्माण किया गया , आत्मा या रूह  नाम की काल्पनिक चीज की व्याख्या को और विस्तृत किया गया ।

जिस चीज को मनुष्य पृथ्वी पर अच्छी और वैभवशाली समझता है उसके मिलने की कल्पना स्वर्ग / जन्नत में कर दी गई और जिस चीज को हेय , भय या दुःख का कारण समझता है उसे नर्क/ दोज़ख में रख के साधारण जन को आतंकित करता रहा।

मरने के बाद आत्मा कँहा जाती है , मरने के बाद दूसरी दुनिया कैसी होती है जैसी काल्पनिक शंकाओं से सिर्फ अनपढ़ ही नहीं ग्रसित है अपितु विदेशो में पढ़े लिखे युवा भी इन धार्मिक/ मज़हबी मिथकीय प्रश्नो में उलझ के अवसादित रहते हैं, दो दिन पहले अख़बार में एक घटना पढ़ी जो की दिल्ली के बुराड़ी में रहने वाले युवक के साथ घाटी । नवदीप नाम के युवक ने घर की दूसरी मंजिल से कूद के ख़ुदकुशी कर ली, नवदीप स्वीडन में रह के पढाई कर रहा था उसके माता- पिता भी विदेश में अच्छी पोस्ट पर हैं ।

कई दिनों से 25 वर्षीय नवदीप मरने के बाद की जिंदगी को लेके अवसादित था , वह जानना चाहता था कि मरने के बाद तथाकथित आत्मा कँहा जाती है।वो मौत के बाद ज़िंदगी के होने और ना होने को लेकर इन दिनों कुछ ज़्यादा ही जिज्ञासु हो गया था। वो हर पल मरने के बाद इंसान को होनेवाले तजुर्बे के बारे में जानना समझना चाहता था और इसी कोशिश में उसने ना सिर्फ़ कई किताबें पढ़ीं, बहुत से लोगों से बात की, बल्कि इंटरनेट पर भी लाइफ़ आफ्टर डेथ को लेकर रिसर्च करता रहा और अंत में अपने मामा के घर से कूद के उसने आत्महत्या कर ली।

यह बेहद दुःखद है कि एक होनहार अल्पआयु में ही काल्पनिक प्रश्नो के चंगुल में  फंस के अपना जीवन समाप्त कर देता है।

वास्तव में आत्मा नाम की कोई चीज नहीं है और न ही मरने के बाद वह किसी अन्य दुनिया में जाती है। बुद्ध ने आत्मा 62 प्रकार की कल्पनाओं को परीक्षा के आधार पर मिथ्या सिद्ध किया  ' सबबासकसुत्त '  में श्रावस्ती के जेतवन में अनाथ पिंडक के विहार में उन्होंने कहा था कि '"इस क्षणिक आत्मा को अपरिवर्तनीय , नित्य, समझना तथा ऐसा समझना कि वह सदा से थी और सदा रहेगी , एक भ्रांति है.... भ्रांति की खाई है"





Wednesday, 3 January 2018

अंग्रेजी सेना में अछूत जातियां-


पुणे के कोरेगांव विवाद के बाद यह प्रश्न भी उठाया जा रहा है कि महारो ( अछूतों) ने अंग्रेजी सेना में भर्ती होना क्यों स्वीकार किया ? वे अंग्रेजो की सहायता क्यों कर रहे थे ? पेशवाओं के खिलाफ अंग्रेजो के साथ क्यों थे जबकि पेशवा भारतीय ही थे । भारतीय होके भारतीय के खिलाफ क्यों लड़ रहे थे ?

हलाकि ऐसे प्रश्न करने वाले असल में सिर्फ अपनी धूर्तता का ही परिचय देते है , जबकि मुगल सल्तनत को कायम करने वाले हिंदू ही थे जो हिंदुओं के खिलाफ लड़ रहे थे । कौन नही जानता की अक़बर की सेना और सेनापति तथाकथित  उच्च जाति  हिन्दू ही थे जो दूसरे हिन्दू राजाओं से लड़ रहे थे।
अंग्रेजो के मददगार सिंधिया आदि  उच्च वर्ण के हिन्दू ही थे।

अंग्रेजो के आगमन से पहले अछूत जातियां अछूत रहने में ही संतुष्ट थीं, अछूतों के भाग्य में हिन्दू ईश्वर ने पैदा होने से पहले ही ' अस्पृश्य' होना लिख दिया था , उच्च वर्ण के हिन्दुओ ख़ास कर ब्राह्मणों ने उस पर धार्मिक मोहर लगा दी थी । धर्म का सहारा लेके ,धर्म के ठेकेदारों द्वारा अछूतों के साथ वैसा ही आचरण करा जाता था जैसा अमानवीय व्यवहार धर्म ग्रन्थो में दर्ज किया गया इसलिये उससे छुटकारा पाना असंभव ही था।

फिर अंग्रेज आएं, ईस्ट इंडिया कंपनी को उनकी फ़ौज के लिए सिपाहियों की आवश्यकता थी ,यह भाग्य कहें कि कुछ और जिन अछूतों को हिन्दू छू भर लेने से अपवित्र हो जाते थे उन्हें अंग्रेजो अपनी सेना में भर्ती किया । अछूत वीर योद्धा रहे थे प्राचीन काल में किन्तु उच्च जाति द्वारा उन्हें संसाधनहीन कर देने से पीढियां सुप्त अवस्था में आती गई, अंग्रेजी सेना में भर्ती होके वह पौरुष फिर से जागा जिसका नतीजा भीमा कोरेगांव युद्ध में देखने को मिला।

ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना में भारतीय सैनिकों तथा उनके बच्चों के लिए अनिवार्य शिक्षा की व्यवस्था थी , अछूतों को सेना में जो शिक्षा मिली उससे उनको बहुत लाभ हुआ , यह अभूतपूर्व था। इस शिक्षा से उन्हें सोचने , समझने की नई दृष्टि और दिशा मिली । अछूतों की चेतना जागी कि उनकी दुर्दशा उनके माथे की लकीर नही है बल्कि यह धूर्तो की करतूत है , उनका अस्पर्श्य होना किसीं ईश्वर  द्वारा उनके माथे की भाग्य रेखाएं नही बल्कि यह कलंक है। इससे उन्हें अपने पर बड़ी लज्जा आई, ऐसा अनुभव उन्हें पहले कभी नही हुआ था ,इसलिए उनसे छुटकारा पाने की तड़प उनमे जागी। तब उन्होंने समझा की जातिवाद एक सामाजिक समस्या है, इससे छुटकारा पाने का संघर्ष तब आरम्भ हुआ ।

अगर अंग्रेज न आते और अछूतों को अपनी सेना में भर्ती कर उन्हें शिक्षा से रूबरू न करवाते तो शायद आज भी अछूत गले में हांड़ी और पीछे झाड़ू बाँध के चल रहे होते, आज जो धूर्त अछूतों के अंग्रेजी सेना में भर्ती होने का ताने दे रहे हैं शायद अछूतों की वही स्थिति से खुश थे।

कोरेगांव युद्ध महारो ने भारितयो के खिलाफ नहीं बल्कि जातिवादी भेडियो के खिलाफ लड़ा था जिनके राज में अछूतों को पीढ़ियों से मानसिक, आर्थिक और शारीरिक रूप से रोज नोच नोच के खाएं जा रहे थे।

Monday, 6 November 2017

बेहाले मस्ती मुकुन....


जब गुलामी फिल्म आई थी तो उसका एक गाना  बहुत हिट हुआ था , गाना बस की छत पर मिथुन और अनीता राज पर फिल्माया गया था ।

गाने के बोल थे -
जिहाल-ऐ- मिस्कीन मकुन बरंजिश , बेहाल-ऐ- हिज़रा बेचारा दिल है ।
सुनाई देती है जिसकी धड़कन ,तुम्हारा दिल या हमारा दिल है।।

जिसका अर्थ होता है-  तुम मुझे रंजिश से भरी इन निगाहों से ना देखो क्योकि मेरा  बेचारा दिल जुदाई के मारे यूँ ही बेहाल है और अपने सीने में  जिस दिल कि धड़कन तुम सुन रहे हो वो तुम्हारा या मेरा ही दिल है।


गाना इतना शानदार था कि इस गाने के बोल समझ न आने के बाद भी लड़कपन में इसे गुनगुनाता रहता था , आज भी यह गाना जब भी सुनता हूँ बरबस ही गुनगुनाने लगता हूँ। बहुत सालों तक गाने के बोल और अर्थ न समझ पाने के कारण मैं इस गाने को बिना अर्थ समझें गुनगुनाता था , शायद बहुत से लोग आज भी इस गाने के सही बोल और अर्थ नही समझते होंगे। लड़कपन में अर्थ और बोल न समझ पाने के कारण गाने को  मैं इस प्रकार गुनगुनाता था-

"बेहाले मस्ती मुकुन बरंजिश ..."

जबकि इस गीत के सही बोल वो हैं जो मैंने ऊपर लिखा है, किन्तु बोल समझ ही नहीं आते थे इसलिए ऐसा गाता था। बाद में पता चला की   इस शानदार गीत को लिखा था गुलजार जी ने और गुलज़ार जी ने नक़ल की थी अमीर ख़ुसरो की एक बेहतरीन सूफ़ी कौतुकी रचना जो फ़ारसी और ब्रजभाषा में थी जिसके बोल इस प्रकार थे-

ज़ेहाले मिस्कीं मकुन तग़ाफ़ुल दुराय नैना बनाय बतियाँ।
कि ताबे हिजराँ न दारम-ऐ-जाँ, न लेहु काहे लगाय छतियाँ।।

जिसका अर्थ है-आँखे दौड़ाके और बाते बनाकर मेरी बेबसी को नज़रअंदाज़  मत करो।  मेरे सब्र कि अब इन्तेहाँ हो गयी है तुम मुझे अपने सीने से क्यों नहीं लगा लेते।

आज सुबह जब यह गाना सुना तो फिर वही दिन याद आ गएँ, सच बताइये क्या आपने भी इस गाने को बेहाले मस्ती ही गाया था ?



Saturday, 14 October 2017

वैश्या- कहानी


रात के तकरीबन बारह बज रहे होंगे ,जंहा  दिन भर ट्रैफिक के कारण इंच इंच जगह घिरी होती थी  वंही इस समय सड़के लगभग सून-सान सी थी , इक्का- दुक्का ट्रैफिक ही रहा होगा  वे भी जल्दी अपने गंतव्य पहुँच जाना चाहते थे । दिल्ली  बसअड्डे से थोड़ी  दूर यह ट्रैफिक लाइट जंहा दिन में भी कम लोग रुकते थे रात में गुलज़ार थी। जरा सी दूरी में लगभग आधा दर्जन किन्नर और  वेश्याएं खड़ी थीं जो अपने अपने ग्राहकों से मोल भाव करने में मशगूल थीं।

  क्या चार्ज है ? " सुनील ने  पूछा।
 " सिंगल शॉट का पांच सौ और फुल नाइट सर्विस का पंद्रह सौ, अगर दो लोग है तो ढाई हजार ...  दो लोगो से ज्यादा नहीं  ... " रूबी ने हाथ घुमातें हुए एक साँस में समझाने वाले लहजे में कहा ।
" नहीं मैं सिंगल ही हूँ .....पूरी रात का  कुछ कम होगा क्या ?" सुनील ने मुस्कुराते हुए कहा।
" नही .... रेट में कोई हेर फेर नहीं .... और हाँ !पैसा एडवांस  देना होगा " रूबी ने सर हिला के मना करते  हुए  रूखेपन से कहा ।

" अच्छा..अच्छा!! चलो बैठो " सुनील ने रूबी को मोटरसाइकिल पर बैठने का इशारा किया ।

रूबी मोटरसाइकिल पर उचक के सुनील के पीछे जा बैठी।

सुनील मोटरसाइकिल स्टार्ट कर तेजी से दौड़ाने लगा, पीछे बैठी रूबी ने दुपट्टे से अपना चेहरा ढँक लिया।शायद वह चाहती थी की कोई उसे पहचाने न।

" क्या नाम है तुम्हरा? " थोड़ी देर मोटरसाइकिल चलाते रहने के बाद  सुनील ने पीछे मुड़ते हुए रूबी से पूछा।
" रूबी...." रूबी ने ठन्डे लहजे में उत्तर दिया।
" रहती कँहा हो?" सुनील ने फिर प्रश्न किया ।
" क्या करेगा जान के ? नाम - गाँव जान के क्या करेगा? तू जिस काम के लिए ले जा रहा है वह काम होना चाहिए बस ... बाकी क्या करना है तुझे? " रूबी ने कुछ तीखे अंदाज में कहा तो सुनील झेंप के चुप हो गया ।

"और कितनी दूर है तेरा घर? " रूबी ने कुछ देर बाद  पूछा शायद वह बोर होने लगी थी या ज्यादा  दूर जाने से डर लग रहा था।
" बस .... अगले कट से दो गली बाद "सुनिल मुस्कुराते हुए कहा ।

दो- तीन मिनट बाद  एक गली के सामने गली में पहुँचने के बाद सुनील ने मोटरसाइकिल रोक ली और  रूबी को  मोटरसाइकिल से उतारते हुए  कहा की वह पहले वह घर का ताला खोलेगा  और उसके पांच मिनट बाद रूबी आये ताकि अगर पडोसी उसकी मोटरसाइकिल की आवाज़ से जग भी जाएँ तो उसे अकेला ही देखें।

रूबी ने ऐसा ही किया , सुनील ने पहले जा के अपने घर का ताला खोला और बाइक पार्क कर आधा गेट खोले रखा। कुछ क्षण बाद रूबी चुप चाप घर के अंदर आ गई तो सुनील ने तेजी से दरवाज़ा बंद कर दिया ।

कमरे के अंदर पहुँच सुनील ने रूबी को सोफे पर बैठने का इशारा किया और खुद फ्रिज से बोतल निकाल कर एक गिलास में पानी उड़ेल पीने लगा ।
पानी पी लेने के बाद उसने एक गिलास और भरा और रूबी की तरफ बढ़ा दिया ।

रूबी ने कुछ संकुचाते हुए पानी का गिलास थामा और एक सांस में खाली कर दिया । पानी पीने के बाद गिलास मेज पर रखते हुए उसने सुनील की तरफ देखा और कहा- तो! शुरू करें?

सुनील रूबी की बात सुन उसके पास आ के बैठ गया और उसका दुपट्टा हटा के उसके स्तनों को निहारते हुए बोला-रिलैक्स! अभी सारी रात बाकी है... कुछ इंजॉय करते हैं पहले"

फिर वह उठा और कपड़े बदलने लगा,कपडे बदल के वह फिर फ्रिज के पास जा पहुंचा और फ्रिज में रखी सिग्नेचर की बोतल निकाल के वापस फ्रिज को बंद कर दिया । दो गिलास  पानी की बोतल और नमकीन - काजू से भरी कटोरी ले के रूबी के पास जा बैठा।

दो पैग बना के एक रूबी की तरफ बढ़ाते हुए बोला- लो ....कुछ मूड बनाओ यार... मजा दुगना आएगा"

"मैं शराब नहीं पीती .... " रूबी ने हाथ से गिलास हटाते हुए कहा।
"एक पैग तो ले लो...तुम तो शरमा रही हो.. इस काम में तो यह चलता है... मूड बन जायेगा " सुनील ने थोड़ा जिद करते हुए कहा।

सुनील के बार बार जिद और आग्रह करने पर आख़िर रूबी मान ही गई , उसने गिलास उठाया और होठो से लगा एक सिप ले लिया ।

"तुम इस धंधे में कब आईं?" सुनील ने नमकीन की प्लेट रूबी की तरफ सरकाते हुए पूछा।

सुनील का प्रश्न सुन रूबी का खिला हुआ चेहरा एक दम से मुरझा सा गया , कई दबे हुए दर्द एकाएक उभर आये ।जैसे ऊपर से ठंडी पड़ चुकी  राख को कोई कुरेद के दबी आग को फिर से हवा दे दे।

"देखो तुम बताना नहीं चाहती हो तो कोई बात नहीं .... मैं तो बस ऐसे ही पूछ रहा था ...तुम धंधे वाली लगती नहीं हो न " सुनील ने रूबी को ख़मोश देख कहा।
"क्या बताऊँ!कुछ बताने लायक है ही कँहा... कौन अपनी खुशी से बनना चाहता है वैश्या!.... यह सब इश्क़ का नतीजा है"रूबी ने एक साँस में पूरा गिलास खाली कर दुःख भरे किन्तु व्यंग वाले अंदाज में  कहा ।
" इस शराब से भी कड़वी जिंदगी की कहानी है मेरी"रूबी ने छत की तरफ देखा और आँखे बंद करते हुए बोली।

उसके बाद रूबी ने अपनी कहानी बतानी शुरू की , कैसे वह एक लड़के के प्यार के चक्कर में फंस के बंगाल से  दिल्ली आ गई थी। दिल्ली में उन्होंने शादी भी कर ली , एक बच्ची भी पैदा हो गई । एक दिन लड़के ने अचानक बताया  कि  लड़के के पिता जो इस शादी के खिलाफ थे उन्होंने लड़के की शादी कंही और तय कर दी थी, अगर वह उनकी बात नहीं मानेगा तो उसे जायजाद से बेदखल कर देंगे , जायजाद काफी थी जिसे लड़का छोड़ने की हिम्मत नही कर पाया । फिर एक दिन तलाक़- तलाक़ बोल के हमेशा के लिए छोड़ के चला गया। लड़के को कँहा खोजती? वह कभी अपने घर लेके ही नहीं गया बस इतना सुना था उसके मुंह से की वह राजस्थान का रहने वाला था ,उस पर विश्वास कर घर छोड़ के भाग आई थी।वापस अपने घर जा नहीं सकती थी, मैं अपने घर वालो के लिए मर चुकी थी।

सुनील ख़ामोशी से रूबी की बात सुन रहा था ।

" मैंने पहले तो आत्महत्या करने की सोची पर फिर सोचा की बच्ची का क्या कसूर! कई जगह नौकरी भी करने की कोशिश की पर अकेली जान के हर कोई मेरे जिस्म को ही पाना चाहता था  ... इसलिए सोचा की जब वही करना है तो खुल के क्यों न किया जाए .... अपनी मर्जी से ग्रहाक और अपनी मर्जी से पैसा" यह कहते हुए रूबी के गालों से दो आंसू लुढ़क गएँ।
"और बच्ची को कँहा छोड़ के आती हो?" सुनील ने पूछा।
" आया के पास ...."रूबी ने आँखे बंद किये ही उत्तर दिया..

सुनील का मूड कुछ ऑफ सा हो गया था रूबी की कहानी सुन के पर कुछ शराब का शुरुर और कुछ रूबी को दिए पैसे का ख्याल कर उसने रूबी को आलिंगन किया और उसे वस्त्रहीन कर दिया।

तभी जोर से डोरबैल बजने की आवाज़ सुनाई दी।
"कौन होगा? " रूबी ने सुनील से घबराते हुये पूछा ।
सुनील को खुद नही समझ आया की इतनी रात को कौन आ सकता है । उसने तौलिया लपेटी और अजमंजस में दरवाजें को खोला । दरवाजा खोलते ही उसके होश उड़ गएँ, काटो तो खून नहीं। सामने उसकी पत्नी चंद्रिका खड़ी थी , साथ में उसका भाई और माँ भी ।
"अच्छा! मैं दो दिन के लिए मायके क्या गई तुम घर में रंडी लाके गुलछर्रे उड़ाने लगे.... घर को कोठा बना दिया" चन्द्रिका ने आग उगलते हुये शब्दो में कहा और सुनील को धक्का देते हुए अंदर दाखिल हो गई। उसके पीछे उसकी मां और भाई भी। किसी पडोसी ने सुनील ने देख लिया था रूबी को घर लाते हुए और उसने चंद्रिका को फोन कर दिया  था ।


" वो...वो... तुम गलत समझ रही हो" सुनील ने घबराए और लड़खड़ाई हुई आवाज़ में कहा ।
" मैं क्या समझ रही हूँ यह अभी बताती हूँ " चंद्रिका चीखती हुई उस कमरे में प्रवेश कर गई जंहा रूबी थी।रूबी ने जब शुरगुल सुना तो वह कपडे पहने लगी किन्तु अर्धनशे होने के कारण उसका दिमाग और हाथ-पाँव सही के काम नहीं कर रहे थे , शरीर का ऊपरी भाग अब भी खुला था ।

चंद्रिका ने रूबी को जब इस हालत में देखा तो वह क्रोध में लगभग विक्षिप्त हो गई।
"कुतिया... रंडी...#$%…..&%$.... मेरे घर को कोठा बना दिया ....तेरी आग आज शांत करुँगी ...." और बहुत सी गालियों बकती हुई चंद्रिका ने रूबी के बाल पकड़ अपने हाथ में लपेट लिए। रूबी दर्द से चीख उठी और दोनों हाथों से चंद्रिका की पकड़ को छुटाने की कोशिश करने लगी । किन्तु चंद्रिका की पकड़ इतनी मजबूत थी की रूबी सिवाय चीखने के कुछ न कर पा रही थी। सुनील रूबी को छुटाने की कोशिश करने लगा पर चंद्रिका ने उसे इतनी जोर से धक्का दिया की वह लड़खड़ा के दरवाजे से टकरा गया, नशे में होने के कारण वैसे ही वह सही से खड़ा नही हो पा रहा था।

चंद्रिका रूबी को गालियां बकती हुई किसी विक्षिप्त की तरह उस पर लात घूसे बरसा रही थी। रूबी दर्द के मारे सिर्फ चीख रही थी कुछ बोल न पा रही थी।

चंद्रिका ने रूबी का सर कांच की मेज पर इतनी जोर से मारा की 12 mm का मोटा कांच चकना-चूर हो उठा । कांच के  कई टुकड़े  रूबी के गले और चेहरे पर अंदर तक धंस गए थे जिनमें से खून की तेज धार बहने लगी थी । किन्तु चन्द्रिका का इस पर कुछ असर नहीं हो रहा था , वह तो रूबी को पीटे जा रही थी। कुछ देर बाद रूबी का शरीर शांत हो गया, चंद्रिका को जैसे होश आया और उसने रूबी को छोड़ दिया । चन्द्रिका ने देखा की पूरे घर में खून ही खून बिखरा हुआ था , उसके खुद के कपडे और हाथ रूबी के खून से सने हुए थे । रूबी मर चुकी थी।

बस यहीं तक थी कहानी.....


Monday, 9 October 2017

ईश्वर और आत्मविश्वास

 बहुत समय पहले एक कहानी पढ़ी थी, उस कहानी का मुख्य मात्र एक बहुत नामी वकील होता है जो कभी कोई केस नहीं हारता था। उसकी एक आदत की जब वह अदालत में किसीं केस पर जिरह करता तो अपने कोट के ऊपर वाले बटन को बाएं हाथ की उंगलियों से घुमाता रहता था ।

एक दिन एक महत्वपूर्ण केस पर जिरह करते समय वकील का हाथ आदतानुसार कोट के बटन पर जाता है ,किन्तु कोट पर बटन नहीं मिलता । वकील बेचैन हो उठता है वह बार बार अपना हाथ कोट के उस स्थान पर लेके जाता है किंतु वँहा बटन न मिलने से बहुत परेशान हो उठता है। बटन न घुमा पाने के कारण वह इतना नर्वस हो जाता है उसे लगता है कि वह केस हार जायेगा , उसके मन में यह बात बैठ गई थी बटन घुमाने से वह केस जीतता है।


घबराहट में जिरह न कर पाने के  वह केस लगभग हारने वाले ही होता है कि तभी अदालत का समय पूरा हो जाता है , जज अगले दिन की डेट दे देता है। घर आके वह सारी बात अपनी पत्नी को बताता है तो उसकी पत्नी कहती है कि कल कोट धोते समय बटन टूट गया था बाद में वह बटन टाँकना भूल गई थी । वकील की पत्नी कोट का बटन पुनः टांक देती है , अगले दिन वकील अदालत में जाता है और आदतन अनुसार कोट का बटन घुमाता रहता है जिससे उसका आंतरिक विश्वास मजबूत रहता है और हारा हुआ केस जीत जाता है।

कोट का बटन घुमाना उस वकील की आदत थी यह एक तरह से उसके आत्मविश्वास( चेतन मन) को  सबलता देता था जिससे वह खुद को केस पर केंद्रित कर पाता था , केस की बारीकियों पर अच्छी पकड़ कर पाता था। कोट का बटन न घुमा पाने के कारण वह खुद को नर्वस पाता है और केस हारने लगता है,उसका आत्मविश्वास कमजोर हो उठता है ।

आत्मविश्वास या आंतरिक विश्वास( मन की सबलता) का आभव मनुष्य में और भी कई प्रकार प्रकट होता है । इससे मनुष्य में विविध प्रकार की विचित्रता उतपन्न हो जाती है , ऊपर दिए वकील की कहानी की तरह बहुत से लोग विशेष तिथि,रंग, आभूषण, के प्रति अन्धविश्वसी हो जाते है और उन्हें शुभ या अशुभ समझने लगते है। इस  प्रकार से ऐसे भाव उसके अचेतन मन में बैठ जाते जिन्हें वह काल्पनिक ईश्वर से जोड़ देता है ,इसी भावों के आधार पर उसका आत्मविश्वास कमजोर या मजबूत होने लगता है।

कई लोग मेरी नास्तिकता को लेके मुझ से असहज रहते हैं, उन्हें लगता है कि जैसा वे ईश्वर को मानते और जानते रहें है वैसा मैं क्यों  नही मानता हूँ? उस भेड़ चाल में मैं क्यों नहीं शामिल हूँ जिसमे वे सब है। पर मुझे उन से शिकायत कम् ही रहती है क्यों की मैं जानता हूँ की उनका अचेतन मन ईश्वर की वैसी ही कल्पना स्वीकार कर चुका है जैसा उस वकील ने अपने कोट के बटन को घुमाने से केस जीतने का सम्बन्ध स्थापित कर लिया था। उनके आत्मविश्वास को बनाये रखने के लिए ईश्वर की परिकल्पना उनके लिए जरुरी है।

ईश्वर कल्पना ही सही किन्तु उन्हें इस कल्पना से सबलता मिलती है, मैं ऐसा मानता भी हूँ की कमजोर आत्मविश्वसियों के लिए यह जरुरी भी है अन्यथा वे टूट जायेंगे । जब तक उनका अचेतन मन स्वयं सबल हो ईश्वरीय रूपी कल्पना के पट्टे को उतार न फेंके तब तक उनका आस्तिक बने रहना अच्छा है।

Saturday, 30 September 2017

ताम्र(खनिज) और लंका पर आक्रमण-

  श्रीलंका का प्रचीन नाम ताम्रपर्णी था, ताम्रपर्णी का अर्थ होता है तांबे का पत्ता या थाल । निस्चय ही तांबे/कांस्य जैसे खनिज की अधिकतम मात्र की उपस्थित अथवा तांबे/ कांस्य को कच्चे माल को उत्पादन की प्रमुखता के कारण यह नाम दिया गया होगा।


जैसा की इतिहासकारो ने सिद्ध किया है कि सिंधु सभ्यता कांस्ययुगी सभ्यता था ।कांसा तांबे और अन्य धातुओं के मिश्रण से तैयार होता है ,सिंधु सभ्यता के लोगो ने तांबे को कांस्य के रूप में प्रयोग कर अधिक मजबूत औजार और घरेलू बर्तन बनाना सीख लिया अतः सिन्धु सभ्यता का व्यापारिक सम्बन्ध मिश्र , मेसोपोटामिया ,ईरान जैसे देशों से हो गया था । यह यह मुख्य बिंदु है कि  सिन्धु सभ्यता के उत्खनन में 'हथियार' नहीं मिले हैं जबकि मोहरे,मूर्तियां, आभूषण आदि पर्याप्त मात्रा में मिले हैं अतः यह निष्कर्ष निकलता है कि हड़प्पाई संस्कृति हथियारों और युद्ध से अनभिज्ञ थी।

ऋग्वेद में वैदिक प्रमुख इंद्र ऐसे लोगो से संघर्ष करता है है जो अवैदिक हैं और नगरों में रहते हैं। राजा शंबर के सौ नगरों को आसानी से नष्ट कर देता है, ठीक ऐसे जैसे किसी मिट्टी के घर को । डी डी कोसंबी जी एक टिप्पणी गौर करने लायक है "ऋग्वेद में इंद्र द्वारा शत्रुओ के नगरों को नष्ट करना और आसानी से शत्रुओं को मार देना बिना किसी विशेष संघर्ष के यह ओजस्वी भाषा हड़प्पा में घटित किसीं वास्तविक संघर्ष का परिचारक है"।

ऐसा क्या हुआ की हड़प्पाई लोग अपने हमलावर  शत्रुओं  आसानी से हार जाते हैं? ऐसा इसलिये हुआ होगा की हमलावरों के मुकावले उनके हथियार बेकार और अत्यंत कमजोर साबित हुए होंगे। ठीक ऐसे समझिये की जैसे बाबर के तोप के  गोलों और बंदूकों के आगे पुरातन ज़माने के तीर - धनुष और भाले लिए भारतीय सेना हार जाती है।


 हड़प्पा संस्कृति पर आक्रमण केवल राज्य विस्तार भर न था बल्कि खनिजों पर आधिपत्य जमाना था । खनिज भंडारों पर अपना कब्जा जमाने के साथ साथ व्यापार को भी अपने कब्जे में लेना था। यूँ समझिये की जैसे आज भी सरकारे आदिवासी क्षेत्रों में भूमि अपने कब्जे में कर खनिज पदार्थो के लिए आदिवासी लोगो को उनकी जमीनों से भगा देती आ रही हैं।

तो प्रबल संभवना रही  होगी की ताम्रपर्णी यनीं लंका अपने तांबे जैसे खनिज पादर्थो के निर्यात के कारण बहुत  समृद्ध हो गई थी  और इन्ही खनिज भंडारों पर अधिकार करने के लिए लंका पर चढ़ाई की गई हो ?  ऋषि लोग इन्ही खनिजों की तलाश में अपनी  कुटिया और आश्रम जंगलो में बनाते रहे होंगे और खनिजों के भंडार मिलने पर राजाओं को सूचना देते होंगे।
चुकी तांबे को गलाने पर यह सोने के पीले रंग से मिलता जुलता हो जाता है और नगर बनाने में इसका प्रयोग बहुतायत किया गया हो अतः लंका को ' स्वर्ण नगरी' कहा जाता रहा होगा। ठीक ऐसे ही जैसे जयपुर  के भवनों पर गुलाबी रंग का अधिक प्रयोग करने के कारण इसको गुलाबी नगर/पिंक सिटी भी कहा जाता है ।

रावण उसी तरह अपने खनिज संपदा की रक्षा कर रहा हो जैसे आदिवासी लोग अपने जंगलो की करते हैं। वाल्मीकि रामायण के युद्ध काण्ड में लंका को जींतने के बाद राम जी कहते हैं कि उन्होंने यह युद्ध सीता जी को जींतने के लिए नहीं किया है, यदि सीता जी के लिए युद्ध नहीं था तो किसके लिए युद्ध किया था? जाहिर सी बात थी लंका पर आधिपत्य के लिए , लंका पर आधिपत्य का अर्थ था वँहा के तांबे जैसे विशाल खनिजों के स्रोतों पर अधिकार करना। अतः रामायण का काल चाहे कुछ भी रहा हो किन्तु हम कह सकते हैं कि वह इसका युद्ध का मुख्य कारण खनिजों पर अधिकार के लिए रहा होगा?

Thursday, 14 September 2017

जानिए हिंदी का इतिहास- हिंदी दिवस विशेष

 हिंदी ....प्यारी हिंदी, कभी कभी सोचता हूँ की यदि हिंदी न होती तो क्या होता? इस मीठी सी ज़बान जिसमे खड़ी बोली भी है...उर्दू की नज़ाकत भी है ...पालि / प्रकृत के अपभ्रंश भी है  संस्कृत / अरबी के कठिन शब्द भी है अर्थात प्राचीन से लेके नवीन सभी भाषाओं को एक साथ पिरोने वाली  हिंदी न होती तो हम आज अपने विचारों को शब्दो का वह धरताल न दे पाते जो आज हम आसानी से दे पाते हैं।

तो चलिए, आज हिंदी दिवस के मौके पर हम अपनी प्यारी भाषा हिंदी के बारे में ज्यादा नहीं तो थोड़ा सा ही सही जानने का प्रयास करते है ।

हिंदी भाषा के उद्भव और विकास के सम्बन्ध में बहुत सी धारणाएं प्रचलित है जिसमे से  अधिकतर भाषा वैज्ञानिकों का दावा  है कि हिंदी का उद्भव दसवीं सदी के आस पास का है । अपभ्रंश शब्द की व्युत्पति और धम्म/ जैन रचनाकारो की अपभ्रंश रचनाओं से हिंदी के इतिहास का सम्बन्ध बताया जाता है । इसलिए, प्राकृत की अंतिम अपभ्रंश अवस्था से हिंदी भाषा का उद्भव स्वीकार किया जाता है । प्राकृत के अपभ्रंश से सातवीं -आठवी सदी में पद्य रचनाये प्रारम्भ हो गई थीं।

भाषा वैज्ञानिकों के अनुसार यह निर्णय करना कठिन है कि हिंदी भाषा का निश्चित तौर पर  प्रयोग कब किस जगह हुआ परन्तु इतना जरूर कहा जा सकता है कि प्रारम्भ में इसका प्रयोग खुसरो जैसे  मुसलमानो कवियो ने किया , हिंदी शब्द का अर्थ उनके लिए भारतीय भाषा था । आज हिंदी भाषा लगभग पूरे उत्तर भारत की मुख्य भाषा बन चुकी है।

वैसे यह कहा जाता है कि उर्दू हिंदी की जननी है किन्तु यह पूर्णतः गलत है, उर्दू का जन्म भी नहीं हुआ था तब से हिंदी प्रचलन में रही है। हिंदी की तीन शैलियां है , पहली ब्रजभाषी (शौरसेनी) शैली, दूसरी राजस्थनी और तीसरी खड़ी बोली।

हरिषेण ने अपनी' धम्म परिक्खा ' प्रकृत के अपभ्रंश के तीन कवि माने है ,  चतुर्मुख,स्वंभू और पुष्पदन्त हलाकि की स्वंभू के छोड़ के अन्य का कोई ग्रन्थ अभी तक उपलब्ध नहीं हुआ है । स्वंभू ने अपनी प्रकृत अपभ्रंशिय रचनो को 'पद्वडिया' कहा था  , स्वंभू दसवीं सदी के राजा कर्ण सभा में कवि थे ।

दसवीं सदी में धनपाल नामक जैन कवि हुए जिन्होंनेअपनी अपभ्रंश रचनाओं को 'भविसयत्त ' कहा । उसके बाद कई जैन कवि हुए चरित काव्य प्रसिद्ध हुए जैसे सुदर्शनचिरायु ।


आठवीं - दसवीं सदी  में बौद्ध परम्परा से निकले सिद्धों और नाथों का बोलबाला रहा , यह वक्त था जब सिद्ध/ नाथ परम्परा से निकले मछेंद्रनाथ( मत्स्येन्द्र) और गोरक्खनाथ( गोरखनाथ ) का समय था । सिद्धों /नाथों काव्य की शैली सहजयानी की शैली रही है जिससे लगता है कि सिद्ध और सहजयानी कभी एक ही परम्परा से निकले थे। दसवीं सदी के  कश्मीरी आचार्य अभिनवगुप्त ने मच्छनाथ विभु की वंदना की है ,गोरखबानी प्रकृत अपभ्रंशसिय रही।

नरपति नाल्ह की बीसलदेवरासो ,हम्मीर रासो, पृथ्वीराज रासो जैसे काव्य बेशक ऐतिहासिक रूप से प्रमाणिक न हो किन्तु हिंदी के उद्भव में महत्वपूर्ण योगदान रहा है ।

इतिहासकारो के अनुसार हिंदी के वास्तविक जनक अमीर खुसरो कहे जाते हैं,उनकी रचनो में तात्कालिक प्रचलित  खड़ी बोली को हिंदीकाव्य भाषा में  प्रयोग किया गया जिससे हिंदी प्रतिष्ठित हो पाई।सबसे पहले ख़ुसरो ने दिल्ली के आस पास प्रचलित खड़ी बोली को साहित्यक सर्जन का काम किया । उस समय मुसलमान अपनी कवितायेँ फ़ारसी में तो हिन्दू अपनी संस्कृत में सिद्ध / नाथ संत  अथवा जैन डिंगल या अपभ्रंश में । अमीर खुसरो ने इनसे इतर प्रचलित जन भाषा हिंदी में अपनी रचनाएं की और उर्दू के लिए रहा खोल दी।

यही नहीं ख़ुसरो के सच्चे भारतीय थे उस का उल्लेख अपनी मसनवी में 'नुहे- सिपह्न' ( नौ आकाश) में भारत की प्रशंसा की है जो की उस समय सल्तनत की साम्प्रदायिक नीतियां भारत के खिलाफ थी पर उन्होंने इसकी परवाह नहीं की । मुसलमान भारत के प्रति अपनी भक्ति अर्पित करें यह बात उस समय मुस्लिम समाज में अच्छी नहीं समझी जाती थी। उस समय भारत को दारुल -हरब कहा जाता था।
ख़ुसरो की दोहे, मुकरनियां , पहेलियां खूब प्रसिद्ध हुए , ख़ुसरो निजामुद्दीन औलिया के शिष्य थे । जब निजामुद्दीन की मृत्यु हुई तो उन्होंने अपनी पीड़ा एक दोहे में व्यक्त की जो आज तक प्रसिद्ध है-

गोरी सोवत सेज पर ,मुख पर डाले केस।
चल ख़ुसरो घर आपनो, रैन भई सब देस।।

हिंदी को आगे ले जाने में निर्गुण और सगुण काव्यधाराओं ने भी बहुत महत्व पूर्ण भूमिका निभाई। निर्गुनिया संतो ने तो ख़ासकर क्यों की कबीर ,रैदास जैसे संतो की भाषा ही जनभाषा थी । कहा यह जाता है की निर्गुणसंत काव्य धारा सिद्धों/ नाथों और जोगियो से निकली है जो कभी बौद्ध थे ।

हिंदी निर्गुण संत काव्यधारा के प्रमुख संत कबीर हुए,
कबीर जुलाहा जाति के थे , कबीर सिद्ध परम्परा से आते थे जिनके पूर्वज निम्न जाति के थे और हाल ही में मुसलमान बने थे । इतिहासकारो का मानना है कि कबीर के पूर्वज अस्पृश्य कोरी जाति के थे , कोरी जाति ही मुस्लिम जुलाहे बनते थे।

अपनी रचनाओं से पाखण्ड, अंधविश्वास , जातीय भेद भाव , ब्रहामणिक विधानों या मज़हब के आडम्बरो पर जितना कबीर ने प्रहार कियाहै  उतना किसी ने नहीं किया । यह दिगर की बात थी की अनपढ़ कबीर के ज्ञान के आगे बड़े बड़े मुल्ला पंडित कंही नहीं ठहरते थे। कबीर कहते हैं-

हिन्दू कहत है राम हमारा ,मुसलमान रहमाना
आपस में दोउ लड़े मरत है भेद न कोई जाना।।

प्रेम सिर्फ ईश्वर भक्ति नहीं है बल्कि वह अपने आप में स्वतंत्र मूल्य रखता है इस अनुभूति की पहली हिंदी कविता कबीर ने ही लिखी है-

प्रेम न बारी उपजै, प्रेम न हाट बिकाये,
राजा परजा जेहि ,सीस देई ले जाए।
यह तो घर है प्रेम का ,खाला का घर नाहि,
सीस काटि भुइयां धरो, तब पैठो घर माहिं।
सीस काटि भुइयाँ धरो, ता पर राखों पाँव,
दास कबीरा यों कहैं, ऐसा हो तो आव।

प्रेम की इतनी पीड़ा की अनुभूति की जो भंगिमा कबीर सहज भाव से कहते हैं उतनी अनुभूति आज तक नहीं रची गई।हाँ , मीरा कुछ वँहा तक पहुँचती हैं मीरा कहती हैं-

बिरिहन भुअंगम तन डसा ,किया करेजे घाव
बिरिहिन् अँग न मोडिया ,जित चाहो तित खाव।

यंहा थोड़ा दक्खिनी हिंदी का जिक्र करना जरुरी होगा,दक्खिनी हिंदी का अर्थ दक्षिण की हिंदी नहीं बल्कि भौगोलिक दृष्टि से इतिहास में इस क्षेत्र को दखन कहा जाता रहा है और इसके अंतर्गत महारास्ट्र , आंध्र प्रदेश और कर्नाटक के कई क्षेत्र आते हैं।भाषा शास्त्रियों के अनुसार खड़ी बोली को ऊँगली पकड़कर चलना सिखाया है । राहुल सांस्कृतयायन के अनुसार खड़ी बोली हिंदी के कवि सबसे पहले दक्खिनी कवि ही थे ,दक्खिनी कवियों में अधिकतर सूफ़ी मत के कवि रहे हैं जिनमे की जानम( 1582) गेसू दराज( 1343) जैसे प्रमुख रहे हैं । डाक्टर सुनीत कुमार चाटुजर्या लिखते हैं कि 1690 में औरंगजेब दक्खिन में था तब बंगाल के एक मुसलमान प्रवास करता हुआ उससे मिलने आया । उसने बादशाह से कहा कि वह उसे अपना मुरीद बना लें तब औरंगजेब ने देशज पद्य की पंक्तियां कह के उसे फटकारा-

टोपी लेंदे, बावरी देंदे , खरे निलज्ज।
चूहा खान्दा बावली, तू कल बंधे छज्ज।।

औरंगजेब घोर साम्प्रदायिक है किंतु उसके मुंख से हिंदी शब्द निकलते हैं ।

दोस्तों,हिंदी का एक लंबा आए समृद्ध  इतिहास रहा है जिसको इस छोटे से लेख में वर्णन करना नामुमकिन है इसके लिए पोथियाँ कम् पड़ जाएँगी ।अतः इतने पर ही विराम देना चाहूंगा।

हिंदी का इतिहास बौद्धों, जैनियों, सिद्धों/ नाथों / जोगियो से होता हुआ हम्मीर,ख़ुसरो, रासो, विद्यापति, कबीर, रविदास, मीरा ,गुरुनानक, धर्मदास, मुहम्मद जायसी, उस्मान, रसखान, रहीम, तुलसीदास, हरिदासी(सखी संप्रदाय) , सूरदास,गोबिंदस्वामी, नरहरि, मुबारक, भूषण, भिखारीदास, खुमान, दरिया साहिब, पलटू दास, तथा आधुनिक काल के हिंदी साहित्यकारों / नाटककारों तक पहुंचा जिन्होंने इसे नई ऊंचाइयां दी ।जिनमे कुछ आधुनिक हिंदी साहित्यकारों के नाम इस प्रकार है -

भारतेंदु, महावीर प्रसाद द्ववेदी,मैथलीशरण गुप्त, निराला, सुभद्रा कुमारी चौहान, रामधारी सिंह दिनकर, हरी शंकर परसाई, राहुल सांस्कृत्यायन, मुंशी प्रेमचंद, आचार्य हजारी प्रसाद, आचार्य चतुरसेन, डी डी कौशाम्बी, अमृतलाल नागर, मुक्ति बोध, धर्म वीर भारती, नागार्जुन, रेणु, भीष्म साहनी, रामव्रक्ष बेनी पुरी, मुद्राराक्षस, रंगेय राघव, पुष्पा मैत्रीय,रामविलास शर्मा,उषा प्रिवन्दा,  ओमप्रकाश वाल्मीकि,माधव मुक्तिबोध, शिवदान सिंह चौहान, हमीदुल्ला, सर्वेश्वर दयाल सक्सेना, शरद जोशी, तुलसी राम( मुर्दहिया) , राजेंद्र प्रसाद सिंह( सासाराम कालेज) , कँवल भारती जैसे अनगिनत हिंदी साहित्यकार शामिल हैं। जिनका नाम याद नहीं रहा उन से विनम्र क्षमा चाहता हूँ, यदि पाठक गण चाहे तो नाम वे अन्य नाम सुझाव कर सकते हैं।


आप सभी को हिंदी दिवस की ढेरों बधाइयाँ...आशा है कि हिंदी यूँ ही बढ़ती रहेगी और जन जन तक फैलती रहेगी ...