Saturday, 15 April 2017

कमाई- कहानी


 रात धीर धीरे अपने यौवन की ओर कदम बढ़ा रही थी  , सड़क पर अब इक्का-दुक्का  तेज भागती मोटरगाड़ियों की हैडलॉट्स चकाचौंध ही दिख रही थी जो दूर से रौशनी बिखेरित हुई आती और पल भर में अँधेरे में गुम हो जातीं।

चार व्यक्ति  बड़े से पार्क के एक सूनसान कोने में बैठे शराब पीने मस्त थे । ये तीसरी बोतल खोली थी उन चारो की जो पी रहे थे  , बोतल खाली होने तक नशे में धुत्त हो झूमने लगे थे । खाली बोतल को पैग बनाने वाले शख्स ने लापरवाही से बोतल एक ओर फेंकी ,बोतल लुढ़कती हुई थोड़ी दूर पड़ी एक ईंट से टकराई तो 'टन्न' की आवाज़ हवा में  गूँज उठी ।

'टन्न' की आवाज़ जैसे ही अर्धनिन्द्रा में लेटी रूबी के कानों में पड़ी  तो उसकी आँख खुल गई  ,इधर उधर देखने के बाद उसे अहसास हुआ की आवाज़ पार्क में से आ रही थी उसे समझते देर न लगी  की यह आवाज शराब की खाली बोतल की ही थी। वह बुदबुदाई-

"खाली शराब की बोतल! यानी पांच रुपये की एक बोतल !! अगर दो हुई तो!! दस रुपये में बिक जाएँगी ।" ऐसा सोचते हुई वह झट से उठ बैठी उसने देखा की उसकी चाची-चाचा  अब भी सो रहे हैं।

रूबी, उम्र रही होगी 15 साल के करीब । पश्चिम बंगाल के 24 परगना की रहने वाली, बाप की मृत्यु बचपन में ही हो गई तो माँ ने ईंट भट्टे मज़दूरी कर के किसी तरह अपना और रूबी का पेट भरा ।
अभी पिछली साल माँ भी एक बीमारी में चल बसी तो रूबी बिलकुल अकेली हो गई, घर के नाम पर सिर्फ एक 10x10 की झोपड़ी थी ।

रूबी का इकलौता रिस्तेदार या यूँ कहिये की सहारा था उसका चाचा बदरू ,कई साल पहले गरीबी से तंग बदरू पश्चिम बंगाल छोड़ के दिल्ली काम की तलाश में आया तो कंही काम न लगा और न ही रहने की जगह मिली। कई दिनों तक यूँ ही भटकने के बाद कूड़ा बीनने का काम कर लिया फिर एक पार्क की दीवार से लगा अस्थाई झुग्गी बना ली ।ऐसा नहीं था कि वह अकेला था , उस जैसे कई परिवार वंही जुग्गी बना के रहते थे जिनमे से कुछ भीख मांगते तो कुछ कूड़ा बीनने का काम करते।कुछ दिनों बाद बदरू  अपनी पत्नी को भी ले आया ,अब दोनों कूड़ा बीनते और झुग्गी में बिजली न होने के कारण सड़क पर ही सो जाते।

रूबी बदरू के पास आ गई, चाचा चाची पर बोझ न बने इसलिए कूड़ा बीनने में मदद करने लगी।

आज भी सभी लोग सड़क पर ही सो रहे थे , बोतल की आवाज़ सुन रूबी उठी और बिना किसी बताये वह तेजी से पार्क के उस कोने में चल पड़ी जंहा से उसे खाली बोतल की आवाज़ सुनाई दी थी, वह जल्दी से बोतल उठा लेना चाहती थी की इससे पहले कोई और उठा ले ।

वह तेजी से उस जगह पहुँच गई जंहा बोतल पड़ी थी । इधर शराबियों ने जब रूबी के कदमो की आहट सुनी तो बैंच के पीछे छुप गएँ ,उन्होंने सोचा की शायद पुलिस है ।
फिर ,जब कूड़ा बीनने वाली लड़की को  बोतले बीनते हुए देखा तो उनकी आँखों में चमक आ गई । चारो में इशारे हुए और रूबी को किसी कबूतरी की तरह दबोच लिया गया ।

रूबी चीखना चाहती थी किन्तु दो मजबूत हाथ उसके मुंह पर ऐसे जम गए थे जैसे चिपका दिए गए हो।

चारो रूबी को खींच के कोने में ले गए और तन पर एक कपडे न छोड़े,  उनकी दरिन्दगी चरम पर थी ।एक एक कर के सभी ने बलात्कार किया , रूबी असहनीय दर्द और शरीर के घावों से कब की बेहोश हो चुकी थी ।


सुबह के चार बजने वाले होंगे , हल्का उजाला फैलने वाला ही था कि रूबी की बेहोशी टूटी । वह चीखती हुई उठ बैठी , देखा तो कोई नहीं था ।वो चारो जा चुके थे , फिर रूबी ने अपने शरीर पर न नजर डाली अनगिनत घाव थे यंहा तक की गुप्तांग से अब भी खून रिस रहा था । रूबी किसी तरह उठी और पास पड़ी अपनी फ़टी हुई सलवार- समीज को दर्द से कराहते हुए पहना और लड़खड़ाती हुई अपनी झुग्गी की तरफ चल दी।

रूबी ने देखा की अब भी उसकी चाची और चाचा सो रहे है , उसने झकझोर के अपनी चाची को जगाया । चाची को जगाते  ही रूबी फूट फूट के रोने लगी, चाची ने जब रूबी की दयनीय हालत देखी तो समझ गई की रूबी के साथ बहुत गलत हुआ है।
चीख पुकार सुन के बदरू भी जाग गया , उसने जब सारी बात सुनी तो रूबी पर ही बहुत गुस्सा हुआ गलियां देने लगा की उसे इतनी रात को पार्क में बोतल बीनने जाने की क्या जरूरत थी?

चाची ने किसी तरह बदरू को चुप करवाया और थाने जा के रिपोर्ट लिखनवाने को राजी किया । तीनो थाने पहुंचे तो सिपाही ने उन्हें  रोक लिया और आने का कारण जनाना चाहा ।
बदरू के बताने पर की रूबी के साथ बलात्कार हुआ है तो सिपाही बिफर गया और डांटते हुए बोला-
" साले ... भो@$# के ..... खुद धंधा करवाता है और पैसे न मिलने पर झूठी रिपोर्ट लिखवाने आ गया! .... भाग यंहा से "
" अरे साब! आप ऐसे कैसे कह रहे हैं ....."हम ऐसे आदमी नहीं है हमारी बच्ची के साथ सच में जबरजस्ती हुई है " बदरू ने गिड़गिड़ाते हुए कहा ।
" जबरजस्ती हुई है ! साले तेरी लड़की वंहा गई क्यों ? .... धंधा ही करने गई थी न !वो उठा के ले तो गए नहीं थे तेरी लड़की को .... सब समझता हूँ तुम जैसे लोगो की चाल.... तेरी झोपडी पट्टी की सब लड़कियां ऐसे ही करती है .... साले बांग्लादेशी है न तू? अभी सुबह सुबह साहब का दिमाग मत खराब कर वर्ना तुझे ही अंदर कर दूंगा" सिपाही ने इस बार कड़ी चेतावनी जारी कर दी।

सिपाही द्वारा बेज्जती करने के बाद तीनों वँहा से निराश हो अपनी झुग्गी में आ गएँ ।

कुछ महीने बाद रूबी गर्भवती हो गई, बदरू और उसकी पत्नी बड़े दुखी हुए। बदरू रोज रूबी को कोसता,उसकी पत्नी भी रूबी से नाराज रहती । एक दिन बदरू की पत्नी यनीं रूबी की चाची ने रूबी का गर्भपात का निश्चय किया और इस की सलाह लेने के लिए वह अपनी एक पड़ोसन के पास पहुंची ।

पड़ोसन ने जब रूबी के बारे में सुना तो उसने खुश होते हुए कुछ समझाया रूबी की चाची को जिससे सुन रूबी की चाची भी खुश हो गई। घर आके  जब उसने पड़ोसन की सलाह बदरू को सुनाई तो वह भी खुश हो गया।

उस दिन के बाद बदरू और उसकी पत्नी ने रूबी से कुछ नहीं कहा बल्कि उसका  गर्भपात न करवाने के लिए भी राजी हो गएँ।

रूबी की चाची ने रूबी को समझाते हुए कहा - देख रूबी अब जो गया सो हो गया .... इसमें बच्चे की क्या गलती? तू बच्चे को जन्म..हम पालेंगे बच्चे को... बच्चे तो ऊपरवाले की देन होते हैं ... यंहा कौन से हमारे रिस्तेदार हैं जो हमारी बदनामी होगी?"

रूबी ने जब यह सुना तो अपने चाचा-चाची की नेकदिली पर उसे ख़ुशी हुई।


थोड़े  महीने बाद रूबी ने एक बच्चे को जन्म दिया , बदरू और उसकी चाची बहुत प्रसन्न हुए ।

कुछ दिनों बाद रूबी को अपने बच्चे के साथ रेडलाइट पर भीख मांगते हुए देखा गया । उसकी चाची की पड़ोसन ने यही समझाया था कि आज कल किसी लड़की की गोद में बच्चा हो तो लोग सहानभूति से अधिक भीख देते हैं।

अब रूबी कूड़ा बीनने से अधिक कमा ले रही थी, बदरू और उसकी पत्नी की 'कमाई' बढ़ गई थी।

बस यंही तक थी कहानी.....

फोटो साभार गूगल-

Tuesday, 4 April 2017

सर्वशक्तिमान ईश्वर और जीव के चार वर्ग-

  " अरे केशव!...... सुनो तो जरा!" किसी ने पीछे से तेज  आवाज दी ।
केशव ने मुड़ के देखा तो ये मुन्ना बाबू थे, मुन्ना बाबू पड़ोस में ही रहते है केशव के । काफी पढ़े लिखे और किसी कंपनी में ऊँचे ओहदे पर थे, पड़ोस में रहने के कारण कभी कभी मिलना हो जाता है उनसे । कभी ज्यादा बात चीत नहीं हुई बस अभिवादन कर हाल चाल पूछने तक ही सीमित रही।

" नमस्ते मुन्ना जी ..... क्या हाल हैं?" केशव ने पूछा।
" नमस्ते....सब ठीक हैं...." मुन्ना बाबू ने जबाब दिया।
" कहिये कैसे याद किया? " केशव ने मुस्कुरा के पूछा।
" कुछ नहीं!सुना है आज कल तुमने ईश्वर /भगवान/ अल्लाह /गॉड सब को मानना छोड़ दिया है...एक दम 'नास्तिका वाले' हो गए हो?" मुन्नाबाबू ने व्यंगात्मक मुस्कुराहट लिए पूछा ।

केशव ने कुछ जबाब नहीं दिया मुन्नाबाबू की बात का केवल मुस्कुरा दिया।

" का.... माने !बिलकुल भी नहीं मानते ईश्वर को?" मुन्नाबाबू ने फिर जोर देके पूछा शायद उन्हें केशव का चुप रहना रास नहीं आया और वो कुछ ठोस जबाब चाहते थे ।

"आप मानते हैं ईश्वर को?"केशव ने उनसे पूछा।

"हाँ हाँ क्यों नहीं? उल्टा हम से ही पूछ रहे हो? हम तो मानते हैं  सर्वशक्तिमान ईश्वर को, उसी ने हमें- तुम्हें ये पेड़ पौधे और पूरा ब्रह्माण्ड बनाया है .... वो सर्वज्ञ और सर्वशक्तिमान है " मुन्नाबाबू के जबाब में गर्व था । कुछ देर रुक वो फिर बोले-
" केशव भाई... तुम्हारी तरह नहीं की जिस सर्वशक्तिमान ने तुम्हे बनाया उसी को नकार दो .... हम प्रबल रूप से मानते हैं कि ईश्वर है "

" तो आपका ईश्वर सर्वशक्तिमान है ? " केशव ने सर्द लहजे में पूछा।
" बिलकुल ... वह सर्वशक्तिमान है ....सब कुछ कर सकता है जो इंसान के बस की नहीं और न ही तुम्हरे विज्ञान के बस की " मुन्नाबाबू का गर्व अब दुगना था।

"तो ठीक है ! क्या आपका सर्वशक्तिमान ईश्वर सामने वाले  10 मंजिला फ्लैट के टॉप से कूद के आत्महत्या कर सकता है ?" केशव ने फ़्लैट की तरफ इशारा करते हूए पूछा।

शायद ऐसे सवाल की आशा न थी मुन्नाबाबू को ,अतः वो आश्चर्य से केशव को देखने लगे ।
"यदि आप कहते हैं कि ईश्वर सर्वशक्तिमान है तो वह बिल्डिंग से कूद भी सकता है ..... है कि नही?" केशव ने आगे कहा।

मुन्नाबाबू अब भी खामोश थे ,वह एक टक देके जा रहे थे । मुन्नाबाबू को खामोश देख केशव वंहा से चलने के लिए पैर उठाया ही था कि जैसे मुन्नाबाबू को होश आया हो ।उन्होंने केशव को रोकते हुए कहा - "अरे इतनी जल्दी क्या है जाने की ? चलो यह तो मानते हो की ग्रन्थो में ऐसी वैज्ञानिक बाते पहले के लोग लिख गएँ है जिनको आज के वैज्ञानिक मानते है"

" जैसे?" केशव ने वापस रुकते हुए कहा।
" जैसे .... ग्रन्थो में बहुत पहले ऋषियों ने लिख दिया था कि जीवन चतुष्टय है.... अंडज, जेरज , स्वदेज और उद्भिज्ज । यह तो वैज्ञानिक थ्योरी है जिनको प्राचीन ऋषि लिख गएँ और आज के वैज्ञानिक भी मानते हैं"  एक बार फिर मुस्कुराहट फैल गई थी मुन्नाबाबू के चेहरे पर लगता था कि अब चित ही समझो केशव को।

"हम्म.... अंडज यानि अंडों से पैदा होने वाला जीव, जेरज अर्थात पेट की झिल्ली में लिपटे हुए जन्मना, स्वेदज अर्थात पसीने से पैदा होने वाले और उदभिज्ज् जो धरती से पैदा हो जैसे पेड़ पौधे....,ठीक? " केशव ने पूछा।
"बिलकुल ठीक!..... अब बताओ वैज्ञानिक मान्यता है कि नहीं यह? " मुन्नाबाबू ने तपाक से पूछा।

" न! यंहा भी गड़बड़ है " केशव ने मुस्कुराते हुए कहा ।
" कैसे गड़बड़ है?" मुन्नाबाबू ने फिर आश्चर्य से पूछा।

" गड़बड़ यह है साहब की जिन जूं आदि प्राणियों को आपके ग्रन्थ स्वेदज यानि पसीने से पैदा बताते हैं वे दरसल गांदगी से पैदा होते हैं और सब अंडज है ... स्वेदज एक तरह का फालतू वर्ग है।ठीक वैसे ही जैसे राहु केतु ग्रह ।
उदभिज्ज वर्ग भी पूरी तरह सही नहीं है, समुन्द्री सेवाल ,काई जैसे पौधे धरती फोड़ के पैदा नहीं होते अतः सभी पेड़ पौधों को एक ही वर्ग में रखना अज्ञानता ही है।
इसके अलावा एक कोशीय जीव न तो अंडज हैं न जेरज और न किसी चतुष्टय वर्ग में ही आते हैं ..... आपके त्रिकाल दर्शी  ग्रंथकार 'वैज्ञानियो' को शायद इसका पता न था " केशव कहता जा रहा था और मुन्नाबाबू बिना कुछ बोले एक टक सुने जा रहे थे ।

" स्पंज नामक प्राणी के बारे में तो सुना होगा आपने? बताइये आपके ग्रन्थकार वैज्ञानिक अपने किस चतुष्टय वर्ग में रख गएँ है इसे ? केशव ने सवाल किया मुन्नाबाबू से ।

मुन्नाबाबू जैसे हड़बड़ा के नींद से जागे हों , वह लगभग अटकते हुए बोले-
"आं.... वो... बो..." इतना कह चुप हो गएँ।


केशव आगे बढ़ गया ..... इस बार मुन्नाबाबू ने आवाज नही लगाई ।


Wednesday, 29 March 2017

तंत्रवाद और सिंधु सभ्यता-

 नवरात्रों का मूल है दुर्गा पूजा ,दुर्गा  पूजा का संबंध तंत्रवाद से रहा  है या यूँ कहें कि दुर्गा पूजा तंत्रवाद का ही हिस्सा है तो गलत नहीं होगा ।बंगाल में दुर्गा पूजा पर तांत्रिक क्रियाएं प्रसिद्ध हैं, शाक्त मत जिसकी आराध्य देवियां है वह मूलरूप से तंत्रवाद ही है।

दुर्गा का ही एक प्रसिद्ध रूप है शाकम्भरी देवी, शाकम्भरी का अर्थ है ' शाक सब्जी अथवा जड़ी बूटी पैदा करने वाली या शाक सब्जियों और जड़ी बूटियों का पोषण करने वाली' ।

स्वयं शाकम्भरी देवी भी मार्कण्डेय पुराण के देवी माहात्म्य ( सर्ग-81 -93) में यह कहती हैं कि ' हे देवतो ,इसके बाद मैं जीवनपोषक साग सब्जियों के साथ सारे विश्व का पालन पोषण करुँगी ।साग सब्जी भारी वर्षा के दिनों में मेरे अपने शरीर से उत्पन्न होंगे तब मैं पृथ्वी पर शाकम्भरी के नाम से प्रसिद्ध होंगी '।

मार्कण्डेय पुराण में शाकम्भरी देवी का कथन कोई नई धारणा नहीं है बल्कि यह मान्यता अति प्राचीन  उस मान्यता को ही दोहराना था जिसमे पृथ्वी को माता कहा गया है । हम जानते हैं कि तंत्रवाद मातृसत्तामक (स्त्री पक्ष) की देन है जिसमे पुरुष लगभग नगण्य रहता है और स्त्री मुख्य केंद्र रहती है ।

वाम का अर्थ स्त्री भी होता है और वाममार्ग बिना तंत्रवाद के पूर्ण नहीं ।

पिछले लेख में मैंने चित्र सहित बताया था की हड़प्पा के उत्खनन से एक आयातकार मुद्रा  प्राप्त हुई है जिसपर एक नग्न स्त्री का चित्र है जो उल्टा बनाया गया है ।उसकी दोनों टांगे खुली हुई है और उसके गर्भ से एक पौधा निकल रहा है ।उस मुद्रा के ऊपर 6अक्षर बने हुए है जिसे अभी पढ़ा नहीं जा सका है किंतु संभवतः शाकम्भरी नाम पर कुछ प्रकाश डालते हैं।

तन धातु में स्त्रन प्रत्यय लगने से तंत्र शब्द बना है ,तन धातु का अर्थ है विस्तार करना या फैलाना ।
मूलतः  वंश का विस्तार या संतानों की वृद्धि   ही तंत्रवाद है।

देवीप्रसाद चट्टोपाध्याय जी ने मोनियर विलियम्स का हवाला देके यह सिद्ध किया है कि हरिवंश पुराण और भागवत पुराण में तंत्र शब्द का प्रयोग ' संतानोत्पत्ति 'के अर्थ में किया गया है । यह बात आप  साधा।रण भाषा के संतान या तनय के अर्थ से भी जान सकते हैं।

तंत्रवाद के कुछ ठोस और भौतिक अवशेष सिंधु सभ्यता से प्राप्त हुए हैं ,जैसे शाकम्भरी की मुद्रा, स्त्री देवियों की मूर्तियां आदि। मार्शल तथा  प्राणनाथ जैसे वैज्ञानिकों ने इस बात की पुष्टि की है कि वास्तव के बहुत से आधार हैं कि सिंधु सभ्यता की अधिकांश कला और चित्रलिपि का तांत्रिक वस्तुओं के साथ गहरा संबंध है। सिंधु घाटी सभ्यता की संपत्ति पृथ्वी के उत्पादनों पर आधारित थी ,इसलिए स्वभाविक है कि कृषि चरण के विश्वास तंत्रवाद के रूप में विद्यमान रहे होंगे और धार्मिक क्रियाएं( जादू टोने द्वारा उत्पादकता में वृद्धि की मान्यता)  स्त्री द्वारा सम्पन्न होते रहे होंगे ।।हम इसका सबूत सिंधु मुद्रा में छपी उस चित्र में देखते हैं जंहा वृक्ष देवी ( शाकम्बरी) को प्रसन्न करने के लिए बकरे की बलि दी जा रही है और इस क्रिया को करवाने के लिए सात पूजारने नियुक्त हैं।

स्त्री का रजस्वला होना उत्पादकता की निशानी है अतः तांत्रिक क्रियाओं में रजस्वला का विशेष महत्व है/ था। हड़प्पा में स्त्री मूर्तियां मिली है जो लाल रंग से पुती हुई थी, लाल रंग रक्त अर्थात रजस्वला या उत्पादकता का प्रतीक । आज भी कई भील जातियां अपने खेतों में बीज बोने से पहले कोने में सिंदूर से रंगा हुआ पत्थर रख देते हैं ताकि उत्पादन अच्छा हो।सिंदूर प्रतीकात्मक होता है स्त्री के मासिक धर्म का अतः स्त्री का मासिक धर्म तंत्रवाद में पवित्र माना गया है।

किन्तु, जब पितृसत्तामक(वैदिक) समाज में स्त्री के हाथ से धार्मिक कार्य का नियंत्रण निकल गया तो उसके प्रति विरोधी पक्ष भी तैयार कर लिया गया । रजस्वला स्त्री अपवित्र घोषित कर दी गई , तंत्रवाद को अपमान की नजर से देखा जाने लगा।



Thursday, 23 March 2017

भगत सिंह और नास्तिकता

  " एक नया सवाल उठ खड़ा हुआ है , लोग कह रहें है कि मैं अपनी 'हैकड़ी' के कारण तथाकथित सर्वशक्तिमान, सर्वव्यापी और सर्वज्ञ ईश्वर के अस्तित्व में विश्वास नहीं करता ।यंहा तक की मेरे साथी श्री बी.के. दत्त कभी कभी मुझे निरंकुश कहा करते थे ,कुछ मित्रो को शिकायत है कि मैं अपने विचार दूसरों पर थोपता हूँ । कुछ लोग कह रहे हैं कि बम्ब काण्ड में लोकप्रिय होने के कारण मैं ' अहंकार' के कारण नास्तिक बन गया हूँ ।

किन्तु मैं समझ नहीं सका की एक आस्तिक को निजी हैकड़ी अथवा लोकप्रियता कैसे आस्तिक बने रहने से रोक सकती है? यदि ऐसा है तो दो ही बाते हो सकती हैं पहली यह की आदमी या तो स्वयं को ईश्वर का प्रतिद्वंदी समझने लगे या स्वयं को ही ईश्वर । लेकिन इन दोनों स्थितियों में वह सच्चा नास्तिक नहीं बन सकता ।

पहली स्थिति में वह अपने प्रतिद्वंदी के अस्तित्व को इंकार नहीं कर सकता ,दूसरी स्थिति में वह ऐसी सत्ता के अस्तित्व को स्वीकार कर लेता है जो अदृश्य रह के प्रकृति के तमाम क्रियाओं को निर्देशित करती है । दोनों ही स्थिति ज्यूँ की त्यों है ,उसका विश्वाश ज्यूँ का त्यों है । अतः न मैं पहली श्रेणी में आता हूँ न दूसरी श्रेणी में , मैं उस तथाकथित सर्वशक्तिमान परमात्मा के अस्तित्व से ही इंकार करता हूँ।

यह सरासर मिथ्या है कि लोकप्रियता के कारण मैंने हैकड़ी अथवा अहंकार से नास्तिक बना हूँ , बल्कि मैंने ईश्वर को तभी मानना बंद कर दिया था जब मैं एक अज्ञात नौजवान था ।

मेरे दादा, जिनके प्रभाव में मेरा लालन पालन हुआ कट्टर धार्मिक थे , अपनी शुरू की शिक्षा पूरी करने के बाद मेरा दाखिला लाहौर के डीएवी स्कूल में हुआ जंहा सुबह शाम की प्रार्थनाओं के अलावा भी मैं घंटो गायत्री मंत्र जपता रहता था ।उन दिनों में पूरा धार्मिक भगत था । मेरे पिता धार्मिक कट्टर तो नहीं है किंतु नास्तिक भी नहीं है ,वे रोज मुझे पूजा पाठ के लिए प्रोत्सहित किया करते थे ।हलाकि की उन्ही की सीखो के कारण मुझे आज़ादी के लिए अपनी जिंदगी बलिदान कर देने की हसरत जागी।


असहयोग आंदोलन के दिनों में मेरा  नेशनल कॉलेज में दाखिला हुआ , वंही जाकर मैंने उदारवादी ढंग से सोचना और सारी धार्मिक समस्याओं के बारे में यंहा तक की ईश्वर के बारे में भी बहस और आलोचना करना शुरू किया ।अब मैं बिना कटे- छँटे दाढ़ी और केश रखने लगा था ,मगर मैं सिख मत या किसी अन्य धर्म के मिथकों और सिद्धांतों में विश्वास कभी नहीं कर पाया था ।

जब क्रन्तिकारी दल की जिम्मेदारी कंधों पर आ गई तो जैसा की होना ही था प्रतिक्रिया इतनी जबरजस्त थी की कुछ समय तक तो दल का अस्तित्व ही असम्भव लगता था ,उत्साही साथी( नेता) हमारा मज़ाक उड़ाने लगे ।कुछ समय तक मुझे ऐसा लगा की मैं अपना कार्यकर्म व्यर्थ मान लूँ  ,मेरे क्रन्तिकारी जीवन में यह एक मोड़ था । मेरे दिमाग के हर कोने से आवाज आई की ' अध्यन करो... स्वयं को विरोधियो के तर्कों का सामना करने के लिए अध्यन करो .... अपनी बात के समर्थन में तर्को से लैस होने के लिए अध्यन करो!

मैंने अध्यन करना शुरू कर दिया , उसके बाद जो पूर्ववर्ती आस्थाओं, हिंसात्मक उपायों पर विश्वास, दूर होते चले गएँ औरउनके स्थान पर गंभीर विचारो ने ले लिया।
मैंने सशस्त्र क्रन्तिकारी नेता बाकुनिन को पढ़ा, मार्क्स को पढ़ा, लेनिन, त्रोत्सकी व् अन्य लोगो को खूब पढ़ा ,ये सब नास्तिक थे ।

1926 के अंत तक मैं इस बात का कायल हो गया कि सारी दुनिया को बनाने ,चलाने और नियंत्रित करने वाली सर्वशक्तिमान परमसत्ता  के अस्तित्व का सिद्धांत निराधार है।

मई 1927 में लाहौर में मेरी गिरफ्तारी हुई, एक दिन सी.आई.डी के तत्कालीन वशिष्ठ अधीक्षक मिस्टर न्यूमैन मेरे पास आये और काफी देर तक सहानभूति जताने के बाद उन्होंने कहा कि जैसा वो लोग मुझ से ब्यान चाहते है यदि मैंने नहीं दिया तो मजबूर होके काकोरी कांड के सिलसिले में हुई हत्याओं और शासन के विरुद्ध षंड्यंत्र ,दशहरा बम्मकाण्ड के सिलसिले में मुकदमा चलाना पड़ेगा,फिर उन्होंने मुझे बताया कि उनके पास मुझे फाँसी के फंदे तक पहुचाने का पर्याप्त सबूत हैं। मैं जानता था की मेरे निर्दोष होने के बाद भी पुलिस ऐसा कर सकती थी।


उसी दिन कुछ पुलिस अफसरों ने मुझे सुबह शाम दोनों समय नियमित प्रार्थना करने के लिए प्रेरित करना शुरू कर दिया । अब मैं ठहरा नास्तिक।मैंने अपने मन में फैसला लिया की क्या केवल सुख के दिनों में अपनी नास्तिका की शेखी बघारता हूँ या ऐसी कठिन परिस्थियों में भी अपने सिद्धांतों पर अटल रह सकता हूँ?
बहुत सोच के मैंने विचार किया कि मैं ईश्वर की प्रार्थना नहीं करूँगा, और मैंने एक बार भी प्रार्थना नहीं की ।यह एक असली परीक्षा थी जिसमे मैं पास हुआ । एक क्षण के लिए भी मेरे मन में ईश्वर के प्रति विचार नहीं आया , मैं पक्का नास्तिका था ।

इस परीक्षा में पास होना कोई आसान काम नहीं था , आस्तिकता मुश्किलों को आसान कर देती है ,आदमी ईश्वर से बड़ी जबरजस्त राहत और दिलासा पा सकता है ।
किन्तु नास्तिकता या यथार्थवाद में इंसान को खुद पर भरोसा करना होता है , आंधी तूफ़ान के बीच अपने पैरों पर खड़ा रहना बच्चो का खेल नहीं ।
परीक्षा की ऐसी घड़ियों में हैकड़ी या अहंकार हो तो  कर्पूर की तरह उड़ जाता है और आदमी प्रचलित विश्वासों को ठुकराने की हिम्मत नहीं कर पाता ।

मैं जानता हूं की मुक़दमे का फैसला क्या होना है , हफ्ते भर में वह सुना दिया जायेगा । इस ख्याल से ज्यादा राहत की उम्मीद क्या हो सकती है कि मैं जिस उद्देश्य के लिए अपने प्राणों का बलिदान करने जा रहा हूँ ?

एक हिन्दू राजा बन के पुनर्जन्म लेने का विश्वास कर सकता है ,मुसलमान या ईसाई जन्नत में सुख भोगने का इनाम अपनी क़ुरबानी और तकलीफों के बदले कर सकता है ।
मगर मैं किस चीज की उम्मीद करूँ?  मैं जानता हूँ की जब मेरे गले में फांसी का फंदा डाल के पैरों के नीचे से तख्ता खींचा जायेगा तो सब कुछ समाप्त हो जायेगा। वही मेरा अंतिम क्षण होगा । मेरा, अथवा मेरी आत्मा का सम्पूर्ण अंत उसी समय हो जायेगा । बाद के लिए कुछ नहीं रहेगा ।

मैंने बिना इहलोक या परलोक में कोई पुरस्कार पाने , बिलकुल अनासक्त भाव से अपना जीवन आज़ादी के उद्देश्य के लिए अर्पित किया है "

   ( भगत सिंह जी की कलम , मैं नास्तिक क्यों हूँ लेख से छोटा सा अंश)



Friday, 17 March 2017

जानिए क्या है 'पुनः जीवित 'होने का रहस्य -


 रात को जब सब बैठे थे तो गाँव से जुडी कई बातें चल निकली , इन्ही बातों के दौरान माँ ने बताया कि उनकी एक दादी थीं जो मर के जिन्दा हो गई थी और जिन्दा होने के बाद उन्होंने बताया कि वो यमराज के दरबार से वायस आ गई क्यों की तब उनका मरने का समय नहीं आया था।

शायद ऐसे किस्से आपने भी कभी न कभी किसी बुजुर्ग से सुने ही होंगे की उनके ज़माने में फला आदमी मर कर जिन्दा हो गया था , क्या वाकई ऐसा होता है कि कोई मर के जिन्दा हो जाए? कोई तथाकथित यमराज के दरबार से वापस आ जाये क्यों की उसका समय नहीं आया था मरने का?

ऐसी कहानियों के आधार पर लोग लोग परलोक, यमलोक या स्वर्ग नर्क को सिद्ध करते थे , दरसल ये कहानियां वह होती थी जो उन्होंने अपने जीवन में कभी सुनी होती थी ।

धार्मिक और मज़हबी रूप से मृत्यु एक रहस्मय घटना है जिसमे आत्मा शरीर से निकल जाती है ,अधिकतर धर्म -मज़हब इसी आत्मा का शरीर से निकल के परमात्मा के समक्ष पेश होने के आधार पर ही केंद्रित हैं ।

आम अर्थों में मृत्यु का अर्थ होता है ,सांस का रुक जाना ,दिल की धड़कन का रुक जाना , किसी भी बाहरी स्पर्श का व्यक्ति पर कोई असर न होना  ऐसी स्थिति में जबड़ा डीला पड़ जाता है और आँखे खुली रह जाती हैं ।तब व्यक्ति को मारा हुआ मान लिया जाता है।

किन्तु,वैज्ञानिक आधार  मृत्यु को एक नहीं बल्कि दो रूपो में समझा जाता है ।
एक तो क्लिनिकल मृत्यु और दूसरा बायोलॉजिकल मृत्यु।

क्लिनिकल मृत्यु का अर्थ होता है दिल की धड़कन और सांस लेने की प्रक्रिया का किसी कारण से रुक जाना। इस परिस्थिति में यदि व्यक्ति को 5 मिनट के भीतर ऑक्सीजन दे दी जाए तो या किसी केस में  छाती पर विशेष प्रकार से चोट की जाए तो फेफड़े व दिल पुनः क्रियाशील हो सकते हैं। विज्ञान के अनुसार यह मृत्यु की स्थिति नहीं है और इसे टाला जा ससकता है ।

जो 'मर के जिन्दा ' हुए लोग यमराज, नर्क स्वर्ग , परलोक आदि की कहानियां सुनाते है दरसल वे सब मामले 'क्लिनिकल मौत'के ही मामले होते हैं। 'मर चुके' लोगों को जैसे ही फिर से पर्याप्त ऑक्सीजन मिलती है वे फिर से जीवित हो उठते हैं और अपने अनुभवों को वैसा ही सुनाते हैं जैसा उन्होंने अपने जीवन में दूसरों से सुन रखा होता है।

एक बात और गौर कीजिए की धार्मिक लोग कहते हैं कि ईश्वर एक है तो जितने ऐसे 'पुर्नजीवित' के मामले मिलते हैं उसमे ऐसा कोई हिन्दू नहीं मिलता जो यह कहता हो की वह अल्लाह के दरबार से वापस आया हो या ऐसा कोई मुस्लिम नहीं मिलता जो यमराज के दरबार से वापस आया हो ।

डाक्टर रेमण्ड मूडी और डाक्टर एलिजाबेथ कुबलर जैसे मनोवैज्ञानिकों ने कई दशकों तक इस तरह के 'पुनः जीवित'लोगो का अध्ययन किया और उन मरणासन्न अनुभवों को लिपिबद्व किया ।
तथाकथित ' पुनः जीवित' लोगो ने अपने अंतिम 4-5 मिन्ट्स के अनुभवों के बारे में जो बताया उसे मनोवैज्ञानियो ने पांच अवस्थाओं में बांटा है।

पहली अवस्था में मर रहा व्यक्ति एक दम शांत हो जाता है ,ऐसा लगता है कज डर और दुःख की भावना उससे दूर जा चुकी है ।उसके अंदर अपनत्व और प्रेम की भावना का संचार तेजी से होता है।

दूसरी अवस्था- इस अवस्था में सुनने की शक्ति बहुत अधिक हो जाती है ,व्यक्ति को लगता है कि वह अपने शरीर से बाहर आ रहा है और अपने मरे हुए शरीर को ऊपर से देख रहा है।

तीसरी अवस्था- इस अवस्था में व्यक्ति बहुत विशाल काले आसमान के भीतर प्रवेश कर रहा  है, वह बहुत तेज गति से जैसे कोई उल्का पिंड हो उस तरह बदलो में प्रवेश कर रहा है।
कई लोगो को ऐसा अनुभव हुआ की वे भयंकर तूफ़ान में घिर गएँ हो और चारो तरफ अँधेरा ही अँधेरा हो ,कुछ को ऐसा लगा की वे किसी अँधेरी सुरंग में घुस गएँ हो ।

चौथी अवस्था- इस अवस्था में बहुत सी चमकदार और सुनहरी सफ़ेद रौशनी दिखाई देती है जिसमे सब कुछ साफ़ साफ़ दिखाई देता है ,मानो चाँदनी से नहाई हुई । इस अवस्था में ऐसा लगता है कि जैसे सब कुछ पीछे छूट गया हो ,मोह माया से व्यक्ति मुक्त हो गया हो।

पांचवी और अंतिम अवस्था- इस अवस्था में व्यक्ति उस स्थान में प्रवेश करता हुआ अनुभव करता है जंहा से रौशनी आती दिखाई देती है ।यंहा उसे अपने प्रियजन अथवा रिस्तेदार दिखाई देते हैं जो उससे पहले मर चुके होते हैं । कई लोगो को यमराज या ईश्वर का दरबार दिखाई देता है कइयों को सुंदर प्रकृतिक दृश्य दिखाई देते हैं ।

इस अवस्था में ऐसी तनाव मुक्त स्थिति होती है जैसा व्यक्ति ने जीवन में कभी अनुभव नहीं किया होता है ।अतः इस स्थिति को व्यक्ति परमान्नद सा अनुभूत करता है । यही कारण है जब व्यक्ति 'पुर्नजीवित ' होता है तो उसे परम् आन्नद की अनुभूति से निकल जाने का दुःख होता है और वह कुछ मिनटों तक मानसिक स्थिर होने में लगते हैं ।

इन अनुभवों का विश्लेषण करने वाले वैज्ञानिकों ने माना है कि दिल की धड़कन बंद हो जाने के कारण मस्तिष्क को ऑक्सीजन मिलनी बंद हो जाती है  इसके कारण आदमी कल्पना के चित्र बनाने लगता है जिसे मतिभ्रम कहा जाता है ।वह जो कुछ भी देखता और समझता है वह छलावा मात्र होता है जो उसके द्वारा सुनी सुनाई बातों पर निर्भर होता है।

क्लिनिकली मृत व्यक्ति को जो कुछ पांच अवस्थाओं में अनुभव होता है उसे ' हैल्युसिनेशन' अर्थात दृष्टि व् श्रवण भ्रम कहा जाता है  जो शरीर के अंदर जैविक व् रासायनिक असंतुलन के कारण होता है  ।इसमें सब कुछ कल्पना के आधार पर होता है न की किसी दैविक ।

वैज्ञानिकों ने कहा है कि अंतिम पांचवी अवस्था जिसमे व्यक्ति ईश्वर आदि से मिलाने या  परम अनान्द दैवीय अनुभूति का दावा करता है उस हैल्युसिनेशन की स्थिति को कई नशीली दवाईओ से भी क्रिएट किया जा सकता है ।
सभ्य समाज के लिए नशा हानिकारक है और किसी भी व्यक्ति को नशा नहीं करना चाहिए  किंतु एल एस डी नामक की नशीली दवाई लेने पर व्यक्ति ऐसे ही परमान्नद कर सकता है।

कई तथाकथित योगी और धर्म के धंधेबाज ऐसे हैल्युसिनेशन( श्रवण / दृष्टि भ्रम)  द्वारा परमानन्द का दावा करते हैं अपने भक्तों के बीच । किन्तु हैल्युसिनेशन चाहे तथाकथित योग से हो या नशीली दवाइयों से है तो वह भ्रम और कल्पना ही ....अतः ऐसी झूठी कल्पनाये निंदनीय और समाज के लिए खतरनाक होती हैं।




Saturday, 11 March 2017

प्रचार तंत्र

   "तदस्य स्वविषये कार्तान्तिक-नैमित्तक -मौहोर्तिक
  पौराणिक इक्षणिक -गूढ़ पुरुषा:...............
.  परस्य विषये......
  दैवतप्रश्न निमित्तवाय.....
  विजयं ब्रुयू:,…...नक्षत्रे  दर्षयेयु:"
       
         -अर्थशास्त्र - 13/171/1

चुकी मेरा काम ही कस्टमर डीलिंग का है तो दिन भर किसी न किसी कस्टमर से राजनैतिक मुद्दे पर थोड़ी बहुत बात हो ही जाती है। मेरी शॉप दिल्ली के उत्तर - पूर्वी जिला में है जो बिलकुल उत्तर प्रदेश से सटा हुआ है ,मैं खुद भी मूल रूप से उत्तर प्रदेश का हूँ तो वंहा की घटनाएं चाहे राजनैतिक जो या सांस्कृतिक कंही न कंही  प्रभावित करती हीं हैं।

कल उत्तर प्रदेश में बीजेपी की अप्रत्यक्षीत जीत के बारे में जो वँहा के लोगो ने बताया  वह यह की जीत का सबसे बड़ा कारण था हिन्दुओ की सपा - बसपा से नाराजगी। नाराजगी का कारण था कि हिंदुओं के मन में यह बात बैठा दी गई है की सपा- बसपा मुस्लिम तुष्टिकरण करने वाली पार्टियां हैं । यदि ये पार्टियां फिर सत्ता में आईं तो उत्तर प्रदेश पाकिस्तान बन जायेगा । कैराना - अखलाख आदि मुद्दे को गर्मा के  बीजेपी ने पहले ही अपनी रणनीति तैयार कर ली थी , उसने रणनीति पर स्पष्ट काम किया  और हिन्दुओ का विश्वास जीतने के लिए उसने एक भी सीट मुस्लिम को नहीं दी ।

यह एक बहुत बड़ा रिस्क था किंतु उसको जो छवि बनानी थी हिन्दुओ में उसने बना ली थी। वह लोकसभा के नतीजों के आकंड़े को मान के चल रही थी की वह जीतना भी नरम रुख अपनाने का दिखावा कर ले मुसलमानों के प्रति मुसलमान उसे वोट नहीं देंगे ,तो बेकार में सीट्स क्यों ख़राब करना किसी मुस्लिम को उम्मीदवार खड़ा कर के?

अब लेख को आगे बढ़ाने से पहले  ऊपर दिए अर्थशास्त्र के श्लोक का अर्थ जानिए,
कौटिल्य धर्म की राजनीती करने वाले राजा के बारे में निर्देश देते हैं -

' राजा को इस तरह आश्चर्यमयी बातों को उस के सहायक तथा दैवज्ञ ( भविष्यवक्ता ) , नैमित्तिक( शुभ अशुभ बताने वाले) , पौराणिक( कथावाचक) , गुप्तचर आदि सर्वत्र राज्य में प्रचारित करें । शत्रु के राज्य  को पराजित करने के लिए राजा को  चमत्कारिक  और कष्टों से मुक्तिदाता , उसके दैवीय सेना व् उसके दिव्यकोष की सनसनी उसके गुप्तचर फैला देंवे।

यह सर्वज्ञात है कि बीजेपी धर्म की राजनीती करती है और मोदी अभी उसे सर्वेसर्वा अर्थात राजा हैं।लोकसभा चुनाव में "हर हर मोदी" जैसे नारों से मोदी जी ने खुद को हिन्दुओ का रहनुमा प्रचारित करना शुरू कर दिया था । इस काम के लिए उन्होंने कौटिल्य के सुझाये सभी निर्देशों का पालन बखूबी किया  प्रचार तंत्र( टीवी) का , शसक्त आईटी फ़ौज खड़ी की जो फोटो एडिट कर ,झूठी खबरों को  सोशल मीडिया को खूब प्रचारित करती रही ।
चुकी इन झूठी खबरों को तात्कालिक रूप से प्रमाणित नहीं किया जा सकता अतः जब तक लोगो को सच बात पता चलती तब तक बहुत देर हो गई होती ।

इन सच्ची- झूठी खबरों का नतीजा यह हुआ की एक अंधी फ़ौज मोदी को अपना भगवान् मानने लगी या यूँ कहिये की कल्कि अवतार जो आते ही मुसलमानों को ख़त्म कर देगा ।
धारा 370 को ख़त्म कर देगा।
बांग्लादेशियों को लात मार के निकाल देगा।
जुमले फेंके गए।
आदि भावनात्मक मुद्दों को खूब उछाला गया , रही सही कसर खुद मुसलमानों ने अपनी कट्टरता से पूरी कर दी ।मोदी और उनकी टीम भी यही चाहती थी की मुस्लिम अधिक से अधिक  कट्टर हों तकी
वो उन्हें विलेन बना खुद को हिन्दुओ का रक्षक घोषित कर सकें।

कैराना जैसे घटनाओं को ऐसा उछाला गया ,जैसे पूरे उत्तर प्रदेश से हिन्दुओ का पलायन होने लगा है । न्यूज वालो को अपना हिस्सा मिल गया था ,अब बस उन्हें स्तुतिगान करना था ।

तीन तलाक का मुद्दा मिडिया ने ऐसे उठाया की हिंदुओ को लगने लगा की जैसे वह मुस्लिम समस्या न होके उनकी समस्या हो ,जबकि मौजूद जातिप्रथा के खिलाफ जूं तक नहीं रेंगती ।
हिन्दुओ को ऐसा प्रतीत हुआ की तीन तलाक मुस्लिम महिलाओं का न होके हिन्दुओ महिलाओं का हो रहा है अतः भारत में ' शरीयत'लागू होने से बचाने के लिए ध्रुवीकरण होने लगा।

विधानसभाओं के ठीक पहले नोटबन्दी कर विपक्षियों की आर्थिक स्वांस नली काट कर उन्हें मृत बना दिया गया , तरीका फिर वही कौटिल्य वाला अपनाया गया प्रचार तंत्र के सहारे जनता को यह समझा दिया गया कि नोटबंदी देश की भलाई यनीं पाकिस्तान ( मुस्लिम) के आतंकवाद के खिलाफ है।
अभी आम भारतीय टीवी की खबरो पर ही भरोसा करता है , पोषित न्यूज वाले दिन रात दिखाने लगे की नोटबंदी से पाकिस्तान को हरा रहे हैं ।जनता में '"देशभक्ति(?) की भावना जगा मुख्य काम यनीं विपक्षियों की आर्थिक स्थिति खराब करने का काम बखूबी पूरा हो चुका था ।

विपक्ष निश्चित ही मोदी के मायावी प्रचार तंत्र से अभी दस साल पीछे चल रहा है ,वह ठीक से कोई भी लूपहोल को जनता के बीच प्रभावी रूप से नहीं रख पाया।
यंहा तक की चुनावी रुख और जनता का रुझान किस तरफ है यह ठीक से आकलन कर ही नहीं पाया या करना ही नहीं चाहा।

मायावती जी जैसी नेत्री की हालत और भी ख़राब हो गई मोदी के इस प्रचार तंत्र में । वो ऐसी नेत्री रही जो बिना किसी मिडीया प्रचार के चुनाव में कूदी जबकि आज लगभग हर घर में टीवी है और लोग न्यूज देखते है । अब यह उनकी नोटबन्दी  से  आर्थिक स्थिति बिगड़ना कहें या स्वयं का मीडिया से दूर रहना जिस कारण वो प्रचार तंत्र और जुमलेबाजी में पिछड़ गईं।

मायावती मान के चल रही थीं की दलित उनके साथ है किन्तु इस बार वो आकलन करने में चूक गईं। उमके वोट बैंक में कब सेंध लग गई यह उन्हें पता भी न चला ।
रही सही कसर मुसलमानों को 100 के करीब और इतनी ही ब्राह्मणों को सीट्स देके पूरी कर ली।

मुसलमान अव्वल तो उनके साथ थे ही नहीं बल्कि सपा के साथ थे और ब्राह्मण कभी उनके हुए ही नहीं ।ऐसी ही हालात लोकसभा में हुई थी उनकी ब्राह्यणों को सीट्स देके , पता नहीं क्यों वे तब भी नहीं चेती।

भाजपा ने पहले ही मुसलमान विरोधी माहौल बना के हिन्दुओ को अपने पक्ष में किया हुआ था ,उस पर उसने " जय भीम-जय मीम"की अफवाह उड़ा के रहे सही  ओबीसी और गैर जाटव वोट भी खिसका दिया । इन्हें लगा की कंही मायावती जी ओवैसी के साथ गठबंधन न कर लें,आखिर मुस्लिम विरोध तो था ही ।मायावती जी भी इस अफ़वाह का खंडन जोर शोर से नहीं कर पाएं .... शायद 100 मुस्लिम कैंडिडेट्स का प्रेम या खोने का डर था ।बाद में यही चुप्पी ले डूबी ।


कुल मिला के जमाना प्रचार तंत्र का है ,प्रचार कीजिये मोदी जी की तरह फिर चाहे केवल 'जुमला' ही क्यों न हो ।विपक्षी दल जितना जल्दी समझ जाएं उनके लिए बेहतर हैं।

Thursday, 9 March 2017

प्यार- कहानी

 " मेरी बात मान ले राकेश !लड़की अच्छी है, आख़िर बहुत लंबी उम्र होती है .…जिंदगी अकेले काटना बहुत मुश्किल होता है" माँ ने  रसोई से दूध का गिलास ला मेज पर रखते हुए कहा।

"माँ! फिर तुम  शुरू हो गईं"राकेश ने गिलास मे रखे दूध को निप्पल में डालते हुए थोड़ा झुंझुला के कहा ।

"तेरे भले के लिए ही कह रही हूँ ....मैं कब तक रहूंगी यंहा? और फिर अभी नमिता सिर्फ दो साल की है ...कैसे सँभालेगा तू अकेला? " अब नाराज़ होने की बारी माँ की थी।

राकेश खामोश रहा और चुपचाप नमिता के मुंह में दूध का निप्पल लगाए उसे देखता रहा ।

कुछ देर चुप रहने के बाद मां राकेश के पास आई और कंधे  पर प्यार से हाथ रखते हुए कहा ।
"देख राकेश! मैं मानती हूँ की बहुत प्यार करता था तू विभा से ...पर मेरे बच्चे! अब विभा को गए डेढ़ साल हो गएँ ,मैं मानती हूँ की उसे भूलना तेरे आसान न होगा पर सिर्फ उसकी यादो के सहारे जिंदगी तो नहीं कटेगी न....बच्ची का मुंह देख और शादी के लिए हाँ कर दे,तू नहीं संभाल पायेगा इस दुधमुंही बच्ची को"

राकेश ने माँ की तरफ देखा और फिर नमिता की तरफ, नमिता अब भी दूध पीने में मग्न थी।

"नहीं माँ, मैं नहीं करूँगा अब शादी । मेरी विभा की आखरी निशानी ही मेरे जीवन का मकसद बनेगी,मैं किसी और से अपने प्यार का बंटवारा नही कर सकता "रमेश ने नमिता को चूमते हुए सर्द लहज़े में जबाब दिया ।

माँ के मुंह से कोई शब्द न निकला ,वह लाचार सी राकेश को देखती रही।
कुछ दिन बाद वो वापस गाँव अपने पति यानी राकेश के पिता के पास लौट गईं। जाती भी क्यों न आखिर गाँव में खेती के अलावा नौकरी भी है पति की अतः राकेश के पास ज्यादा दिन नहीं रुक सकती थी।

बचे सिर्फ राकेस और डेढ़ साल की नमिता ।

जब से विभा की मौत हुई तब  से राकेश ही उसकी मां बन गया था । समय समय पर दूध गर्म कर के पिलाना, डायपर बदलना आदि सभी काम वह स्वयं करता ।

इस काम के लिए उसने पहला ऑफिस जंहा उसे अच्छी सैलरी मिलती थी वह छोड़ दिया और एक ऐसे ऑफिस में लगभग आधी सैलरी में काम करने लगा ताकि उसे नमिता के लिए अधिक समय मिल सके ।

समय निकलता गया, नमिता पहले घुटनो से फिर पैरों से दौड़ने लगी । नमिता को स्कूल फिर कॉलेज तक लाते लाते राकेश ने न जाने कितनी राते और दिन अकेले दर्द से सही पर नमिता को इस बात का कभी अहसास नहीं होने दिया  , काम और फिर नमीता की देखभाल करते करते समय से पहले ही बूढ़ा लगने लगा था वह।

इस बीच माँ बाप का साथ भी छूट गया । गाँव की सब जमीन जायजाद बेच के राकेश ने शहर में ही प्रोपर्टी खरीद ली थी , यह नमीता की ही जिद थी की उसका एक फ्लैट किसी पॉश एरिये में हो ।
पॉश एरिये में फ्लैट महंगा था अतः केवल गाँव की जमीन बेचने से भर काम न चला बल्कि अपनी सारी जमा पूंजी भी लगा देने के साथ पुराना घर भी बेचना पड़ा तब जा के फ्लैट ख़रीदा गया ।


नमीता बहुत खुश थी।

करीब एक साल बाद.....

"पापा अगर मैं शादी करुँगी तो उसी से वर्ना आत्महत्या कर लुंगी "नमीता ने सुबकते हुए कहा ।
"पर नमीता हम तो अभी ठीक से उसे जानते भी नहीं..... मुझे वह लड़का सही नहीं लगता " राकेश ने गुस्से से कहा ।
"आपको तो अच्छा लगेगा ही नहीं ... अरे आप क्या जानो प्यार क्या होता है ? मेरी माँ होती तो ऐसा नहीं होने देती ... आप को तो कोई मतलब ही नहीं मेरी खुशियों से "इतना कह नमीता गुस्से से चिल्लाने लगी और फिर फूट के रो पड़ी।

राकेश स्तब्ध बहुत देर तक खड़ा रहा ,फिर नमीता के पास आ के बोला-" बेटी मैं तेरे भले के लिए कह रहा हूँ .....जब वह लड़का अपने पिता के साथ रिस्ते की बात करने आया था तो दहेज में यह फ्लैट मांग रहा था "
"अरे झूठ मत बोलिये वह आपसे अपने लिए नहीं मांग रहा था बल्कि वह कह रहा था कि आप यह फ्लैट मेरे नाम कर दें .... आखिर आपके बाद तो  मुझे ही मिलने वाला है न ....तो इसमें गलत क्या कहा उसने ? .... मुझे लगता है कि आप मुझे कुछ देना ही नहीं चाहते " नमीता का गुस्सा इस बार और अधिक था ।

राकेश कुछ न बोला बस नमीता की बाते सुने जा रहा था।


कुछ दिन बाद नमीता की शादी हुई , विदाई के वक्त राकेश ने नमीता के हाथ में फ्लैट ट्रांसफर के कागज़ात थमा दिए । कागज़ात देख के नमीता बहुत खुश हुई और बोली-
"पापा आप टेंशन न लें ... आप का ही घर है आप जींतने दिन चाहे यंही रहिये"

राकेश मुस्कुरा दिया , ईधर नमीता की डोली उठी उधर राकेश का बैग ।

बैग में सिर्फ एक जोड़ी कपडे और उसकी पत्नी विभा की तस्वीर के अलावा कुछ न था ।
राकेश चल दिया था एक अनजान सफर में।


बस यही तक थी कहानी....


 picture from Google -