Saturday, 15 September 2018

जानिए गणपति के मूषक का रहस्य-

  आपने मेरे पहले लेख में पढ़ा कि गणपति के हस्ती मुख होने के पीछे क्या कारण हो सकते हैं? कैसे गुप्त काल मे  गणपति अर्थात गणों( संघ) के नायक का परिवर्तन कर उन्हें देवता बनाया गया । जैसा की बताया गया कि गणपति का हस्ती मुख दरसल उन राजसत्ताओं का प्रतीक था जिनका सम्बन्ध हाथी टोटम से रहा होगा। जैसे कि मतंग सत्ता, खरगेवाल सत्ता आदि

गणपति की मूर्ति का दूसरा अभिन्न अंग होता है मूषक, मूषक को उनकी सवारी के रूप में दर्शाया जाता है। क्या एक चूहा किसी व्यक्ति की सवारी हो सकता है? तो, आईए इस भाग में जाने की दरसल  वह मूषक किसका प्रतीक है।

प्रसिद्ध इतिहासकार केपी जायसवाल (1881-1937) अपनी पुस्तक ' इंडियन हिस्ट्री' में कहते हैं कि" हमे प्राचीन इतिहास में चूहों अथवा मूषकों का भी उल्लेख मिलता है। मूषक वही थे जो प्राम्भिक ग्रीक कथाकारों की कथाओं में मूसिकन कहलाते थे।मूषक और मूसिकन दोनों नामो में काफी समानता है। यदि यह बात सत्य है तो यदि हमें ग्रीक कथाकारों की पर विश्वास करना चाहिए तो हमे यह भी मानना पड़ेगा कि सिकंदर के अभियान के समय ये मूषक एक सामुदायिक जनजातीय जीवन बिता रहे थें।"


अतः ये स्पष्ट है कि हाथियों या मतंगो की भांति इन चूहों या मूषकों का भी टोटमवादी अतीत था ।

जनरल आफ दी बिहार एंड ओरिसा रिसर्च सोसायटी का हवाला देते हुए चट्टोपाध्याय बताते हैं  मूषक लोग दक्षिण भारत के निवासी थें, महाभारत में बताया गया है कि वे  वनवासियों  के साथ रहते थे। निश्चय ही इनका प्रदेश कलिंग से ज्यादा दूर नही रहा होगा क्यों कि नाट्यशास्त्र में ( लगभग 200 ईसापूर्व) में तोमल, कोसल , और मोसल( मूशिका) जनों का उल्लेख है। पुराणों में विंध्य देशों में ' स्त्री राज्य' अर्थात मातृसत्तामक सत्ता का उल्लेख है । याद कीजिये कि अशोक के कलिंग विजय की जो कथा कही जाती है उसमे उसकी भिड़ंत स्त्री सैनिको से होती है, ऐसा तभी सम्भव हो सकता है जब सत्ता या तो मातृसत्तामक हो अथवा सत्ता में स्त्री की महत्वपूर्ण भूमिका रहती हो अतः हम यह कह सकते हैं कि विंध्य राज्यों में स्त्री राज्य के साथ मूषक टोटमवादियों का भी अस्तित्व रहा होगा । यह भी हो सकता है कि दरसल विंध्य के स्त्री राज्यों का टोटम मूषक ही रह हो।

हमे सीधा यह तो पता नही मिलता की मूषकों की राजसत्ता कौन सी थी किन्तु इसके ऐतिहासिक प्रमाण जरूर मिलते हैं कि किसी प्राम्भिक सत्ता ने मूषकों को पराजित अवश्य किया था ,मूषकों के पराजित होने की कथा प्रसिद्ध हस्तिगुफ़ा में कलिंग के राजा खारवेल के शिलालेखों में मिलती है । ये शिलालेख 160 ईसा पूर्व बताए जाते हैं।  जायसवाल जिन्होंने इन शिलालेखों को पढ़ने में अपना पूरा जीवन बिता दिया था बताते हैं कि शिलालेख की चौथी पंक्ति में उल्लेख है कि राजा खारवेल ने मूषिकों को पराजित किया ।

दुखद यह है कि सभी ऐतिहासिक और शोधकार्यो के बाद भी हस्तिगुफ़ा के लेख आज भी पूरी तरह से नही पढ़े गए जिससे हमें मूषिकों के बारे में अधिक जानकारी प्राप्त हो सके। यंहा तक कि यह भी नही पता चला कि उस गुफा के नाम हस्तिगुफ़ा क्यों पड़ा? और हस्ती से उनका किस सत्ता से सम्बन्ध है ।

इस गुफा के निर्माण बौद्ध / जैन धर्मावलंबियों ने बनाया था ।इसका मतलब की गुफा में जो शिलालेखों में मूषिकों की पराजय का विवरण है उनका  गणपति के देवता बनने में कोई न कोई संकेत अवश्य है । जो भी हो पर यह ऐतिहासिक प्रमाण है की प्राचीन भारत मे हस्ती कबीले भी थें और मूषक कबीले भी , हमारे पास हस्ती कबीले विजयी होने और मूषक कबीले के पराजित होने के प्रमाण है इसलिए इतिहाकारों कि धारण है की गणपति की मूर्ति के पीछे किसी हस्ती क़बीले( शायद खारवेल) द्वारा अपना साम्राज्य स्थापित करने का इतिहास छिपा है।

मोरे और डेवी ने मिश्र में जनजातियों से साम्राज्य बनने तक के काल का बहुत गहन शोध कार्य किये थे, उन्होंने मुख्यतया टोटमवादी प्रमाणों के आधार पर सिद्ध किया कि राज्य के उदय का इतिहास देवताओं के उदय का भी इतिहास था।

अतः हम यह कह सकते हैं कि गणपति हस्तिमुख उनके हाथी के टोटम( झंडे) का प्रतीक था और उनके पैरों में पड़ा चूहा पराजित मूषक जनजाति का प्रतीक । एक आश्चर्यजनक चीज और देखने को मिलती है , वह है उड़ीसा के बौद्ध विहारों में जो गणेश की प्रतिमाएं मिलती हैं वे स्त्री काया लिए हुए है ,अर्थात 64 योगनियों में सम्लित हैं। ऐसा कैसे हुआ कि गणेश को स्त्री बना दिया गया ? या कंही वास्तव में गणेश योगनी अर्थात मातृसत्तामक सत्ता का प्रतीक तो नही थे?

इन सवालों का जबाब जानिए मेरे अगले लेख में ...

Thursday, 13 September 2018

गणपति

  गणपति सम्बन्धी पौरणिक कथाएं जितना जटिल और गल्प भरी हुई हैं उतना ही उनका नाम सरल है, गणपति का शाब्दिक अर्थ हुआ गणों का पति अर्थात गणों का स्वामी या नायक। आइए जानते हैं कि क्या गणपति का कोई ऐतिहासिक चिंन्ह भी है या सिर्फ वह पौरणिक कथाओं के गल्प तक सीमित हैं?

 वाजसनेयी संहिता के अपने भाष्य में  महिधर ने व्यख्या की है " गणनाम  गणरूपेण पालकम' अर्थात जो गणों या सैन्य दलों की रक्षा करता है। फ्लीट ने गण शब्द का अर्थ करते हुए कहा है 'गण शब्द का प्रमुख अर्थ है जनजातीय समूह और संगठन या परिषद। पाणिनि ने संघ शब्द की व्युत्पत्ति गण शब्द से बताया है।

गणपति के प्रमुख नामो में से कुछ नाम इस प्रकार है -विघ्नकृत, विघ्नेश, विघ्ननेश्वर ,विनायक आदि।  इन सबका विशुद्ध शाब्दिक अर्थ है विघ्न डालने वाला । प्रचीन ब्रह्मणिक ग्रन्थो में गणपति के प्रति तिरस्कार और घृणा के भाव हैं। 'मानव गृह्य सूत्र ' में कहा गया है - शासन करने योग्य राजकुमार को राज्य नही मिलता, सभी गुण सम्पन कुमारियों को पति नही मिलते, संतान उतपन्न करने योग्य स्त्रियां भी बांझ रह जाती हैं, स्त्रियों की संतानों की मृत्यु हो जाती है ।"

देवीप्रसाद चट्टोपाध्याय जी भी याज्ञवल्क्य का उदहारण देते हुए अपनी पुस्तक ' लोकायत' में कहते हैं कि " याज्ञवल्क्य के अनुसार रुद्र और ब्रह्मा ने बाधाएं उत्पन्न करने के लिए विनायक को गणों का मुखिया नियुक्त किया ।उसका आक्रांता स्वप्न में देखता है कि वह डूब रहा है ,लाल कपड़े पहने हुए सिर मुंडे लोग हैं। मांसाहारी पशुओ की सवारी कर रहा है, चांडालों , ऊंटों , कुत्तो, गधों आदि के साथ रह रहा है । "

गौर तलब है कि मनु ने शूद्रों का धन कुत्ते और गधे बताया है , और लाल  वस्त्र पहना तथा सिर मुंडाना बौद्ध परम्परा रही है। तो क्या हम कह सकते हैं की गण वास्तव में शुद्र और बौद्ध रहे होंगे? जैसा कि पाणिनि ने भी कहा है कि गण का अर्थ संघ होता है। संघ बौद्ध परम्परा का हिस्सा था।

ब्रह्म वैवर्त पुराण में एक कथा आई है जिसमे गणपति एक दन्त होने की कथा इस प्रकार है , परशुराम और गणपति के बीच एक युद्ध हुआ था जिसमे परशुराम ने अपना कुल्हाड़ा गणपति पर मारा जिससे उनका एक दांत टूट गया । इस कथा में रोचक बात यह है कि परशुराम से उनका युद्ध, जैसा कि सभी जानते हैं कि परशुराम ब्राह्मणों और पुरोहितों के सर्वोच्च स्थिति के घोर समर्थक थे । क्या इसका तात्पर्य यह हुआ  की गणपति के काल मे उनका सबसे प्रमुख शत्रु पुरोहित और ब्राह्मण वर्ग था? प्राचीन ब्रह्मणिक ग्रन्थों में जिस प्रकार गणपति के प्रति तिरस्कार और घृणा है उससे तो यही जाहिर होता है। बौद्ध और शूद्रों के प्रति जो घृणा और तिरस्कार ब्राह्मणिक ग्रन्थों में हैं उससे इसकी पुष्टि भी होती है की गणपति का सम्बंध जरूर बौद्ध धम्म से रहा होगा।

मनु ( 3/219) में तो ब्राह्मणो को गणो का अन्न तक खाने को निषेध कर देते है ।मनु सीधा शुद्रो और दलितों का अन्न खाने से मना करते है , यानि मनु के अनुसार गण शुद्र -अछूत और बौद्ध  रहे होंगे ।

देवीप्रसाद जी मोनियर विलियम्स जैसे विद्वान का हवाला देते हुए कहते हैं कि"  यद्यपि गणपति बाधाएं उत्पन्न करने वाले हैं  किंतु साथ मे इसे दूर भी करते हैं इसलिए सभी कार्यो के आरम्भ में ' नमो गणेशाय विघ्नेश्वराय ' के साथ उनका स्मरण किया जाता है।जिसका अर्थ है कि मैं विघ्नों के देवता गणेश के सम्मुख नमन करता हूँ। यह बात तो सही है किंतु यह बात बदली हुई  परिस्थितियों की है ,यानी ऐसा बाद में विकसति हुई गणपति संबंधी परिवर्तित भावनाओ के कारण हुआ। देवीप्रसाद जी कहते है कि गणपति की आरंभिक प्रतिमाओं में कुछ में उन्हें भयावह दानव के रूप में दिखाया गया है जो नग्नता के साथ साथ
आभूषण रहित दिखाया गया है जो संकेत हैं कि आरम्भ में गणपति के प्रति कैसी धारणाएं थीं।

कोडिंगटन ने अपने 'एशेन्ट इंडिया ' में गणपति की ऐसी प्रतिमा का उल्लेख किया है जो पूर्ण साज सज्जा के साथ है और इसका काल गुप्त काल के निकट है । कुमारस्वामी जैसे विद्वानों ने माना है कि गुप्त शासन से पहले इस प्रकार की गणेश की कोई प्रतिमा नही थी , गुप्त काल मे ही गणेश की प्रतिमाएं अचानक बनने लगी। गौर तलब है कि गुप्त राजाओं के शासन में ब्रह्मणिक ग्रँथ नए सिरे से लिखे जाने लगे थे तो यह संभवना रही है कि गणपति का बदला हुआ नया रूप गुप्त काल मे ही प्रकट हुआ हो।गणपति का ब्राह्मणीकरण इसी काल मे हुआ होगा।


आगे देवी प्रसाद जी फिर कहते है की मध्य काल के ग्रन्थो में गणेश ( गणपति) के हस्ती मुख , मूषक वाहन आदि कई तरह जिक्र है जबकि प्राचीन ग्रंथो में ऐसा नहीं है ।इसका उत्तर देते हुए वे कहते हैं की हस्ती सर टोटम (प्रतीक चिन्ह ) दर्शाता है । जैसा की हैम जानते है दुनिया भर में प्रत्येक काबिले का एक टोटम होता है जो पशु , पक्षी अथवा पेड़ पौधों पर हो सकता था ।जैसे जब यूनानी भारत आये तो उनका टोटम पंख फैलाये बाज था ।

भारत में भी टोटमवाद रहा है , मतंग( हाथी)  राजवंश की स्थापना कोसल के बाद के काल की है ।मतंग राजवंश  ने सिक्के चलवाए और एक विस्तृत राजसत्ता कायम की ।
मतंग राजसत्ता ललित विस्तार के अनुसार मौर्य राजाओ से पहले की है पंरतु हम यह नहीं कह सकते की मतंग राजसत्ता स्थापित होने से  गणपति के देवत्य का स्थान प्राप्त हुआ होगा ।
परन्तु इससे यह सिद्ध होता है की हाथियो (टोटम) की राजसत्ता कभी रही होगी ।

अब केवल मतंग सत्ता  ही नहीं हस्ती सत्ता नहीं रही होगी बल्कि शिलालेखो से पता चलता है की बहुत से हस्तिसत्ता भारत में रही जैसे खारवेल की रानी ने स्वयं को हस्ती की पुत्री बताया ।

एक और गौर करने लायक उदहारण देना चाहूँगा मैं आपको , की बौद्धों का और हाथियों का सम्बन्ध जग उजागर है । किद्वंतीयो के अनुसार गोतम के जन्म से पूर्व उनकी माता के सपने में हाथी आता है ।

अतः बाद के कई बौद्ध राजो जैसे मतंग आदि ने हाथी को अपना टोटम बनाया ।तो यह सिद्ध है की गणपति का जो हस्ती सर है वह दरसल बौद्ध राजाओ का टोटम रहा था, तो क्या माने की गणपति वास्तव में बौद्ध धम्म से सम्बंधित थें? । जो गण शब्द है जिसका अर्थ पाणिनि ने भी संघ किया है उसका सीधा संबंध बौद्ध अनुयायिओं से है? हम सांची स्तूप द्वार  में बुद्ध की माता लुम्बनी को कमल आसन पर बैठे देखते है जिनके बगल में दो हाथी उनपर जल वर्षा कर रहे हैं, बिल्कुल इसी चित्र की कल्पना लक्ष्मी देवी के लिए की गई है।

तो क्या ब्राह्मणिक व्यवस्था में विघ्न डालने वाले ' विघ्नेश्वर' वास्तव में कभी बौद्ध संघ के नायक थें ?




Tuesday, 11 September 2018

आत्मा और मृत्यु -

पृथ्वी पर जब से जीवन की शुरुआत एक कोशीय जीव के रूप में हुई तब से जीवन को बचाये रखने की जद्दोजहद शुरू हो गई थी। जीवन को सुरक्षित रखने की प्रक्रिया में खुद को बचाने की प्रवृति उत्पन्न हुई।  मृत्यु से जीवन को बचाने और खुद को सुरक्षित रखने को प्रवृति जो करोड़ो साल पहले एक कोशीय जीव से आरम्भ वह विकास के विभिन्न चरणों से गुजरती हुई एक भय के रूप में मनुष्यों में स्थापित हुई । जिन जीवो में खुद को सुरक्षित रखने या जीवन को बचाये रखने की प्रवृति नही थी वे विलुप्त होते चले गए।

मृत्यु सिर्फ शरीर की समाप्ति भर नही बल्कि जीवन की समाप्ति है ,अतः जीवन को बचाने की प्रवृति का अधिकतम रूप हमे मौत के भय के रूप में प्रदर्शित होता है। मृत्यु द्वारा पूरी तरह से ख़त्म हो जाने का विचार हमारे मन में भयानक उथल पुथल मचा देता है। जीवन को बचा पाने की ललक, जीवन को जीते रहने का परिणाम हुआ की  मनुष्य ने ‘आत्मा’ की परिकल्पना की,जो मृत्यु से परे हो। मरने के बाद भी जीवित रहने की धारणा ही आत्मा की परिकल्पना है।

आत्मा की स्थापना के लिए मनुष्य में मौजूद ' चेतना' तत्व का सहारा लिया गया । चेतना ज्ञानेन्द्रियो का समूह है ,जिनसे विचार या बोध की भावना जैसे गुण प्रकट होते है । चेतना को आत्मा का रूप दिया गया जो मनुष्य के शरीर मे कंही रहता है और शरीर से अलग हौ। जो मरता नही और न ही नष्ट होता है चाहे शरीर नष्ट हो जाये तब भी। आत्मा के सहारे धर्मो को स्थापित किया गया या यूं कहें कि आत्मा को धर्मो की धुरी बनाया गया। यहूदी , ईसाई, इस्लाम धर्म के अनुसार  मृत्यु के बाद आत्मा क़यामत के दिन तक इंतज़ार करती है और उस दिन पाप और पुण्य के आधार पर स्वर्ग या नर्क में जाती है। किन्तु हिन्दू धर्म मे आत्मा परमात्मा का रूप है और वह कर्मो के अनुसार पुनर्जन्म लेके  योनियों में भटकती रहती है अंत मे मोक्ष प्राप्त कर परमात्मा में विलीन  हो जाती है।

आधुनिक जीव विज्ञान के अनुसार आत्मा नाम की कोई चीज नही है, इसी प्रकार आत्मा से संबंधित सभी धारणाएं जैसे पुनर्जन्म, स्वर्ग- नर्क, परमात्मा आदि को खारिज करती है। मॉडर्न बायलॉजी द्वारा विख्यात वैज्ञानिक फ्रांसिस क्रिक ने यह साबित करने का दावा किया आत्मा का अस्तिव नही होता , उन्होंने अपनी किताब 'विज्ञान द्वारा आत्मा की खोज' जो 1962 में लिखी थी उस पर उन्हें नोबल पुरस्कार भी मिला था  उसमे सिद्ध किया कि आत्मा मात्र कल्पना भर है। उनके अनुसार जीवन कोई वस्तु,शक्ति  या ऊर्जा नही बल्कि कुछ गुणों का संयोग भर है जैसे Metabolism, Reproduction, Responsiveness, Growth, Adaptation आदि।

उनके अनुसार ये गुण जटिल कार्बन यौगिकों के मिश्रण द्वारा प्रदर्शित होते हैं जिन्हे कोशिका के नाम से जाना जाता है और सबसे सरल कोशिका जिसे हम जानते हैं वह है वायरस ।अपनी सहज प्रवृति  की वजह से यदि ये कोशिकाएं एक दुसरे के साथ सहयोग में आती है और किसी वातावरण में साथ में रहती है तो वे एक संगठन बनाती है जिसे हम जीव कहते है। यदि कोशिकाएं एक दूसरे से असहयोग करती है तो वह कैंसर कहलाती हैं।जब ज़्यादा से ज़्यादा कोशिकाएं एक दुसरे के सहयोग में आती हैं और जटिल संगठन का निर्माण करती हैं तो हमें और दुसरे जीव प्राप्त होते हैं जैसे की कीड़े, सरीसृप, बंदर, मनुष्य आदि।

मनुष्य के शरीर मे लगभग 38 लाख कोशिकाएं हैं जो रोज मरती और रोज नई बनती हैं, मनुष्य इन्ही कोशिकाओं का समूह है ।हर कोशिका में जीवन होता है। तो इस प्रकार हम यह कह सकते हैं कि हमारे अंदर 38 लाख आत्माएं रहती हैं!!मनुष्य के मरने के 24 घण्टे बाद उसके त्वचा की कोशिकाएं मरनी शुरू हो जाती हैं  दो दिन बाद हड्डियों की और तीन दिन बाद रक्त धमनियों की यही कारण है कि मरने के तुरंत बाद भी अंगदान सम्भव होता है।

 मानव शरीर कि कोशिकाएं अधिकतम 50  गुना विभाजित हो सकती हैं जिसे हेफलिक सीमा(Hayflick Limit) कहते हैं। जब हम बच्चे होते हैं तो कोशिका विभाजन कि दर काफी ऊँची होती है, फिर समय के साथ यह दर काफी धीमी हो जाती है और अंत मे कोशिका विभाजन बिल्कुल ही रुक जाता है जिससे मृत्यु होने की प्रक्रिया होती है। पर ऐसा नही है कि संसार मे सभी जीव मरते ही है, कई जीव जैसे जैली फिश अपनी कोशिकाओं  को विभाजित कर अमर रहती है जब तक कि कोई बाहरी कारण उसकी मृत्यु का कारण बने।

उपनिषदों ( देंखे छान्दोग्य उपनिषद 8-3-3) में आत्मा का केंद्र ह्रदय को माना गया है ,आत्मा हृदय में रहती है ' स वा आत्मा ह्रदय ' । किन्तु , 1964 में जेम्स हार्डी ने मनुष्य के ह्रदय की जगह चिंपांजी के ह्रदय का प्रत्यारोपण कर यह सिद्ध किया कि आत्मा हृदय में नही रहती।

दरसल मृत्यु के स्वभाविक प्रक्रिया है किंतु धर्म के धंधेबाजों ने इसे भय के रूप में परिभाषित कर इसे भयानक तो बना ही  दिया है बल्कि इससे स्वर्ग नरक जोड़ के अपनी धूर्तता भी सिद्ध की ।  अपने स्वजनों के मरने पर इंसान फूट फूट के रोता है जबकि धर्म / मजहब के अनुसार आत्मा की मृत्यु ही नही होती ,तो रोने का औचित्य क्या? दरसल इंसान धर्म/ मज़हब के झूठ को जानता है इसलिए उसे अपने स्वजनों के दुबारा जन्नत/ स्वर्ग में मिलने का विश्वास नही रहता ।

सोचिए की अगर इस्लामिक आतंकवादियों जो जन्नत के लालच में खुद को बम्ब से उड़ा लेते हैं या दूसरों को मार देते हैं यदि उन्हें यह हकीकत पता होती कि मरने के बाद कोई रूह नही होती तो शायद लाखो बेगुनाहों की जान बच गई होती। अगर आत्मा नाम की कल्पना नही की गई होती तो ऐसा होता कि हम मानते की हर व्यक्ति धीरे धीरे खत्म हो रहा है तो आपस मे प्रेम की संभवना बहुत अधिक होती।


Saturday, 11 August 2018

तंत्रवाद और ताओवाद


प्रचीन तंत्रवाद में प्रजनन और उर्वरता के कारण प्रकृति को स्त्री देह का स्वरूप माना गया है । तंत्रवाद में पुरुष (जल)गौड़ रहा है इसलिए इसका प्रमुख चिंतन स्त्री के आस- पास घूमता रहा है। स्त्री प्रमुखता होने कारण इसे मातृसत्तात्मक पक्ष कहा गया। सिन्धु सभ्यता में तंत्रवाद के बहुत अवशेष देखने को मिलते हैं अतः विद्वानों के अनुसार निश्चय ही सिन्धु सभ्यता मातृसत्तामक रही होगीं।

बाद के पितृसत्तामक सिद्धान्तों में स्त्री यानी प्रकृति गौड़ हो गई और पुरुष  चिंतन का केंद्र बन गया।

 शिव- शक्ति की धारणा तंत्रवाद के प्रकृति और पुरुष के सिद्धांत की ही उपज है ।

भारत के तंत्रवाद और चीन के ताओवाद में बहुत सी समानता है,जिस प्रकार तंत्रवाद में सृष्टि की उत्पत्ति मैथुन क्रियाओं से बताई गई है वैसे ही ताओवाद में अलग अलग सिद्धान्तों में मैथुन से ही सृष्टि की उत्पत्ति बताई गई है।

ब्रिटिश प्रख्यात विद्वान जोसेफ निधम ने अपनी पुस्तक ' साइंस एंड सिविलाइजेशन इन चीन' में बताया है की चीन के ताओवाद और भारतीय तंत्रवाद में गहरा संबंध रहा है। उनके अनुसार ताओवाद का प्रकृतिक चिंतन ही चीन के सभी विज्ञानों का आधार है। चीन में ताओवाद का उदय लगभग ईसा दूसरी सदी पूर्व माना गया है।

जिज़ प्रकार भारतीय तंत्रवाद में प्रकृति और पुरुष(जल)"  माने गए हैं जो बाद के चिन्तनों में शिव-शक्ति के रूप में अपनाए गए वैसे ही ताओवाद में भी पुरुष और प्रकृति का सिद्धांत रहा था । स्त्री( प्रकृति)  को 'यीन' और पुरुष को 'यांग' माना गया है। इस प्रकार सभी नरम, शीतल, अंधकारमय, निष्क्रिय वस्तु स्त्री जातीय अर्थात 'यीन' है और सभी कठोर, उष्ण, आलोकमय और सक्रिय वस्तु पुरुष जातीय है।

ताओवाद के सिद्धांत के अनुसार शारीरक देह ही सभी कुछ है, शारीरिक अमरत्व की प्राप्ति किसी अलौकिक क्रियाओं द्वारा नही बल्कि भौतिक क्रियाओं पर निर्भर करता है जैसे-
1-श्वशन तकनीक
2-सूर्य की  किरणों से चिकित्सा
3-व्यायाम क्रियाएं
4-यौन क्रियाये
5- रासायनिक और औषधीय तकनीक
6-आहार सम्बन्धी क्रियाएं

हम देखते हैं कि ये सभी सिद्धान्त भारतीय तंत्रवाद के सिद्धांतों से हूबहू मेल खाते हैं , तंत्रवाद में 'देहतत्व'ही सभी कुछ है, योग साधना , व्यायाम की क्रियाओं को जिन्हें प्राणायाम तथा आसान कहा जाता था। यौन साधना तंत्रवाद में प्रमुख रही । नीधम ने कहा है कि जिस प्रकार तंत्रवाद में पूजरिनो( योगनी, भैरवी),  का महत्व था उसी प्रकार ताओवाद में भी पुजारिन अर्थात 'वू' का महत्व था । वे आगे कहते हैं कि जिज़ प्रकार मातृसत्तामक पक्ष में आदर्शवादी समाज का निर्माण होता है वैसे ही ताओवादियों का भी सिंद्धात था।

ताओवाद को नष्ट करने वाला कंफ्यूशियस सिद्धात था , कंफ्यूसियस को 'यांग' प्रधान चिंतन कहा गया है अर्थात पुरुष प्रधान या पितृसत्तामक पक्ष ।जैसा की भारत मे भी मातृसत्तामक पक्ष वाले सिन्धु सभ्यता को नष्ट करने वाला पितृसत्तामक पक्ष । पुरुष चिंतन सिद्धान्त से ही 'ईश्वर' की कल्पना का प्रादुर्भाव हुआ।


Sunday, 15 July 2018

मुस्लिम शासक, अंग्रेज और कुप्रथाएं-

अक़बर ने दीन-ऐ-इलाही के जरिये उच्च हिन्दुओ और उच्च मुसलमानो को पास लाने का भरकस प्रयास किया ,इस प्रयास में उसने हिन्दुओ के लिए  पवित्र समझी जाने वाली गाय की हत्या को निषेध करवा दिया था। नए मंदिरो को बनाने की छूट दे दी थी । मंदिरो और तीर्थ यात्राओं को कर मुक्त कर दिया था।

उसका प्रयास था कि वह अधिक से अधिक उच्च हिन्दुओ को अपने नव धर्म की तरफ आकर्षित करे, ऐसा हुआ भी दीन-ऐ-इलाही को सबसे पहले अपनाने वाला महेशदास अर्थात बीरबल ही हुआ ।

अक़बर हिन्दुओ के धार्मिक और जातीय स
मसलो में हस्तक्षेप नही करता था यही कारण रहा कि उसने निम्न जातियों के उद्धार के लिए कोई कार्य नही किया था। 'महान' कहलाये जाने के बाद भी  शासन काल में अछूतों का   जातीय शोषण / अत्याचार तो बना ही रहा,   कई कुप्रथाएं भी ज्यूँ की त्युं उसके राज में  चलती रही जिनको अंग्रजो ने आके खत्म किया , उनमे से कुछ कुप्रथाएं इस प्रकार की थीं-

1- काशी - करवट-  काशी धाम में  आदि विशेश्वर के मंदिर के पास कुंए मे कूद कर  भक्त अपनी जान दे देते थे , भक्तो की धारणा थी कि उस कुंए में मरने के बाद सीधा स्वर्ग में जाना होगा।

2- गंगा प्रभाव- अधिक समय बीत जाने के बाद जब किसी वैवाहिक जोड़े को संतान पैदा नही होती थी तो वह ऐसी मनौती मांगता था कि उसका पहला बच्चा होगा तो उसे गंगा में प्रभावित कर देगा। मनौती को पूरी करने के लिए अपने बच्चे को गंगा में छोड़ देते थे। अंग्रजो में 1835 में कानून द्वारा इसे बंद करवाया।

3- सतीदाह- विधवा स्त्रियों को उनके पति के साथ जिंदा जलाये जाने की प्रथा को अंग्रेजो 1863 में कानून द्वारा बंद किया।

4- कन्या वध- कन्या भूर्ण हत्या  को 1870 में कानून बना के रोका गया

5- नर मेध-  ऋग्वेद के शुनःशेप की कहानी के आधार पर निर्धन या अनाथ व्यक्ति को दीक्षित कर उसकी यज्ञ में बलि दी जाती थी जिसको अंग्रजो ने  1845 में ऐक्ट 21 बना के रोका ।

6- हरिबोल- इस प्रथा के अनुसार रोगी को गंगा में ले जाकर उसे गोते दे देकर हरि बुलवाते और उसे मार देते। जो मर जाता उसे बहुत भागयशाली समझते और जो नही मरता उसे वंही घाट पर तड़प तड़प के मरने के लिए छोड़ देते। अंग्रेजो ने 1831 में इस अमानवीय प्रथा पर रोक लगाई।

7- धरना- साधु संत विष या शस्त्र हाथ मे लेके किसी  गृहस्थ के द्वार पर बैठ जाते और उन पर दवाब डालते की उनकी अमुक इच्छा पूरी करे ।कभी कभी गृहस्थ की पत्नी या बेटी से संबंध बनाने पर भी जबरजस्ती करते। अंग्रजो ने सन 1920 में कानून बना इसे बंद करवाया।

इसके अलावा जगन्नाथ धाम में रथ यात्रा के दौरान भक्त लोग रथ के पहिये के नीचे मोक्ष प्राप्ति की आशा में आत्महत्या कर लेते थे । यह जघन्य आत्महत्याएं हर  तीसरे वर्ष रथ यात्रा के दौरान होतीं। अंग्रजो ने इस प्रथा को कानून बना के बंद करवाया। ऐसी अनेक कुप्रथाएं जिन्हें मुस्लिम शासक नही खत्म कर पाए थे उन्हें अंग्रेजो ने खत्म किया।

समझिये की क्यों मात्र दो सालों के राज में अंग्रेजों का विरोध शुरू हो गया था जबकि अक़बर आदि मुस्लिम शासकों का सैकड़ो सालों के बाद भी नही।


Wednesday, 11 July 2018

सूफ़ीवाद

  भारत मे इस्लाम के फैलने का प्रमुख कारण इसका ' तसव्वुफ़ अर्थात सूफ़ी मत रहा है। सूफ़ी मत तलवार से भी अधिक मारक था जिसने बिना खून बहाये अधिक से अधिक हिन्दुओ को अपनी ओर आकर्षित किया।

अरब के लोगो ने दर्शन के लिए ' फ़लसफ़ा' शब्द का इस्तेमाल किया ,'सूफ़ी' शब्द ' फ़लसफ़ा' के 'सफा' से बना है जिसका अर्थ है दार्शनिक। हम कह सकते हैं कि सूफ़ीवाद इस्लाम का निचोड़/ केंद्र था जो लोगो को जबरजस्ती तलवारों के बल से मुसलमान बनाने के पक्ष में नही था । जो लोग यह मानते थे कि कुरआन ईश्वर और समाधि ,ईश्वर और चिंतन में सम्बन्ध है और यही उस तक पहुचने का मार्ग है वह इस्लाम की कट्टरता के घेरे से निकल के सूफी हो गए। हालांकि की हम यह कह सकते हैं कि अरब के लोगो ने यह धारणा यूनान से ली है किंतु यह भी सच था कि अरब और यूनान का भारत से प्राचीन रिश्ता रहा है। इसलिए इतिहासकार मानते हैं कि दर्शन पहले भारत से यूनान पहुँचा और फिर वंहा से अरब।

फिर यह भी सच है कि अरब में  इस्लाम के आने से पहले बौद्ध धर्म का भी प्रभाव रहा  था , बलख का नौ बिहार दरसल नौ विहार या बौद्ध मठ था और इसका पुजारी बरामका कहलाता था यँहा बुद्धदेव की पूजा होती थी ।

अरब के नगरो में यहूदी मत, ईसाइयत, बौद्ध, हिंदुत्व, और इस्लाम का का मिलन हुआ ।

अतः अरब वालों को सूफिज्म का ज्ञान पहले से था हाँ , यह जरुर हुआ कि इस्लाम मे आने के बाद उस दर्शन का स्वरूप थोड़ा बदल गया , भारत आ के उसने और भी विस्तार किया ।

सूफी मत के अनुसार-
1- सूफी का प्रमुख कर्तव्य ध्यान और समाधि है, प्रार्थना और नाम स्मरण है । इन्ही तरीको से वह परमात्मा मिलन की राह पर अग्रसर होता है।

2- अस्तित्व केवल परमात्मा का है , वह प्रत्येक वस्तु में है और प्रत्येक वस्तु परमात्मा में है।

3- सारी वास्तविकता एक ही है ।

4- सभी धर्मिकता और नैतिकता का आधार प्रेम ही है।प्रेम के बिना धर्म और नीति दोनो निर्जीव हैं।


किन्तु यंहा गौर करने लायक वात यह थी कि जैसा कि ऊपर भी बताया गया है को मौलिक इस्लाम और सूफिज्म में अंतर होने के कारण इसे पसंद नही किया गया । जैसे कि संगीत इस्लाम मे हराम करार दिया गया किन्तु सूफ़ी मत वाले संगीत को अपनी साधना का जरिया मानने लगे। कब्र पूजना इस्लाम मे हराम करार दिया गया किन्तु सूफ़ीवाद कब्र पूजता रहा।

इसलिए सूफ़ीओं को  मुल्लाओं और इस्लाम के ठेकेदारों की नजरों में काफ़िर करार कर दिए गया , उन्हें प्राण दंड दिया जाने लगा । मनसूर- अल- हज्जाज , सरमद आदि ऐसे ही सूफ़ी थें जिनको इस्लामिक ठेकेदारों ने कत्ल कर दिया  ।

आज भी मजारों पर जो हिन्दू श्रद्धा से सर झुकाता है वह  सूफियों के कारण ही सम्भव हुआ था। मज़ार में हिन्दुओ को अपने देवी देवता नजर आते हैं। जो चमत्कार करते हैं, आशीर्वाद देते हैं। सूफिज्म रहस्यवाद की पूर्ति करता है।

देखिये, मज़ार ने  हिन्दू देवी -देवताओं की मूर्तियों को कैसे अंगीकार कर लिया है। क्या यह किसी मस्जिद में संभव है?


Wednesday, 4 July 2018

शेयर्ड सायकोटिक डिसऑर्डर -


कई सालों पहले मैं दोस्तों के साथ राजस्थान के मेंहदीपुर बाला जी के मंदिर में गया था , उसकी मान्यता यह बताई  जाती है कि उस मंदिर में ' ऊपरी हवाओं' जैसे भूत प्रेत आदि का इलाज होता है।

जिज्ञासावश मैं भी चला गया था कि देखूं आखिर भूत प्रेत होते कैसे हैं?

मंदिर में बहुत दूर दूर के लोग आये हुए थे, भूत प्रेत से बाधित मरीज़ो का परिसर अलग था । जंहा कई भूत प्रेत से पीड़ित मरीजों को बांध के भी रखा गया था , ख़ास बात यह थी की वंहा महिला मरीज़ो की संख्या बहुत अधिक थी। एक महिला जोर जोर से चिल्लाने लगी तो एक सेवादार आया और महिला को उसके बालों से पकड़ के बुरी तरह पीटने लगा था । कोई उस सेवादार को नहीं रोक रहा था , न मंदिर में दर्शन के लिए आये लोग और ना ही कोई अन्य मंदिर का कर्मचारी। महिला को  बुरी तरह पीटने के बाद सेवादार चला गया ,महिला कभी रोती तो कभी और जोर से चीखने लगती। साफ़ जाहिर था कि वह किसी मनोरोग से पीड़ित थी न की किसी भूत प्रेत से।

वंहा मरीज़ो की संख्या बहुत अधिक थी, इतनी की कई मनोरोगी मंदिर के पास वाली पहाड़ी पर भी थे जो अजीब अजीब हरकते कर रहे थे ,जैसे पेट पर बड़ा सा पत्थर रख के  लेटना, कूदना , आसमान की तरफ देख कर जोर जोर से चीखना आदि। 99% यंहा आने वाले भूत प्रेत से पीड़ित परिवार या तो गरीब परिवार से थे या मध्यवर्गीय परिवार से जो या तो पैसे के आभाव में मरीज का साइकैट्रिस्ट से नहीं करवा पाएं या अत्याधिक धार्मिकता और अंधविश्वास के चलते यंहा छोड़ के चले गएँ।

यंहा आने वाले मरीजों में मनोरोगी होने का  प्रत्यक्ष आभास और प्रमाण मिल जाता है , किन्तु कई मरीज ऐसे होते हैं जिनका आभास आस पास के लोगो को नहीं हो पाता।ये मनोरोगी प्रत्यक्ष रूप से सामान्य नजर आते हैं , अत्याधिक धार्मिक या सन्वेदनशील हो सकते हैं जिसे लोग नजरन्दाज कर देते है।

आपने कई ऐसे लोग देखें होंगे जो भगवान् या अन्य किसी आत्मा आदि से बाते करने का दावा करते हैं, अपनी चमत्कारिक शक्तियों से लोगो के कष्ट दूर करने का दावा करते हैं ।

 बुराड़ी में हुई 11 सदस्यों की  सामूहिक आत्महत्या वाले केस में भी ऐसा ही हुआ, पुलिस का दावा है कि ललित जो अत्याधिक धार्मिक प्रवृत्ति का था उसे सपने में उसके मृत पिता जी आते थे और निर्देश देते थे।उन निर्देशों को वह रजिस्टर पर उतार लेता था। ठीक ऐसे ही संजय दत्त की एक फिल्म भी आई थी जिसमे वह गाँधी जी को देखने की बात करता है और उनसे बाते करने का दावा भी।

ललित अपने पिता की आत्मा से जो बातें करता उन्हें पूरे परिवार के एक जगह बैठा के सुनाता।  परिवारवाले ललित को चमत्कारिक शक्तियों वाला समझते थे और वही सभी फैंसले लेता था। पिता की आत्मा जो निर्देश देती थी उसे वह रजिस्टर में उतार लेता था। भागवान से मिलने और मोक्ष् प्राप्त करने की बात भी उससे पिता की आत्मा ने ही निर्देश दिया था ,जिसके कारण पूरा परिवार फंदे पर लटक गया।

विशेषज्ञ कह रहे हैं कि ललित शेयर्ड सायकोटिक डिसऑर्डर का शिकार था , इस बीमारी में मरीज को लगता है कि वह किसी मृत व्यक्ति से बात कर रहा है। जैसा संजय दत्त उस मूवी में गांधी जी आत्मा से बात करता है, ऐसे ही ललित अपने पिता की आत्मा से बात करता है। इस बीमारी में मरीज के शरीर में अचानक बदलाव आते हैं और  उसकी आवाज़ वा आवभाव बदल जाते हैं ।देखने में ऐसा लगता है जैसे उस पर कोई आत्मा या भूत प्रेत आ गया हो। इस बीमारी का इलाज संभव है किंतु लोग इसे आत्मा आदि का किया मान के इलाज नहीं करवाते और अंधविश्वास के जाल में फँसते रहते हैं।

आप शेयर्ड सायकोटिक डिसऑर्डर के बारे में यंहा पढ़ सकते हैं-

https://www.webmd.com/schizophrenia/guide/shared-psychotic-disorder

वेदो के रचनाकारों को 'दृष्टा' कहा गया है , जिन्होंने दावा किया था कि उन्होंने  ईश्वर की को देखा और उसकी वाणी सुन वेदों की रचना की ।

 मुहम्मद साहब को भी जीब्रील नाम का फरिश्ता दिखाई देता है और वे उसकी बातों को वैसे ही कुरआन के रूप में दर्ज करते हैं जैसे की ललित अपने पिता की आत्मा के निर्देश पर रजिस्टर.... तो आप समझ ही गए होंगे धर्म- मज़हब की कहानी...

मुक्त होइये ऐसे शेयर्ड सायकोटिक डिसऑर्डर द्वारा लिखे गए रिस्टर्स से

फोटो साभार गूगल-