Sunday, 15 July 2018

मुस्लिम शासक, अंग्रेज और कुप्रथाएं-

अक़बर ने दीन-ऐ-इलाही के जरिये उच्च हिन्दुओ और उच्च मुसलमानो को पास लाने का भरकस प्रयास किया ,इस प्रयास में उसने हिन्दुओ के लिए  पवित्र समझी जाने वाली गाय की हत्या को निषेध करवा दिया था। नए मंदिरो को बनाने की छूट दे दी थी । मंदिरो और तीर्थ यात्राओं को कर मुक्त कर दिया था।

उसका प्रयास था कि वह अधिक से अधिक उच्च हिन्दुओ को अपने नव धर्म की तरफ आकर्षित करे, ऐसा हुआ भी दीन-ऐ-इलाही को सबसे पहले अपनाने वाला महेशदास अर्थात बीरबल ही हुआ ।

अक़बर हिन्दुओ के धार्मिक और जातीय स
मसलो में हस्तक्षेप नही करता था यही कारण रहा कि उसने निम्न जातियों के उद्धार के लिए कोई कार्य नही किया था। 'महान' कहलाये जाने के बाद भी  शासन काल में अछूतों का   जातीय शोषण / अत्याचार तो बना ही रहा,   कई कुप्रथाएं भी ज्यूँ की त्युं उसके राज में  चलती रही जिनको अंग्रजो ने आके खत्म किया , उनमे से कुछ कुप्रथाएं इस प्रकार की थीं-

1- काशी - करवट-  काशी धाम में  आदि विशेश्वर के मंदिर के पास कुंए मे कूद कर  भक्त अपनी जान दे देते थे , भक्तो की धारणा थी कि उस कुंए में मरने के बाद सीधा स्वर्ग में जाना होगा।

2- गंगा प्रभाव- अधिक समय बीत जाने के बाद जब किसी वैवाहिक जोड़े को संतान पैदा नही होती थी तो वह ऐसी मनौती मांगता था कि उसका पहला बच्चा होगा तो उसे गंगा में प्रभावित कर देगा। मनौती को पूरी करने के लिए अपने बच्चे को गंगा में छोड़ देते थे। अंग्रजो में 1835 में कानून द्वारा इसे बंद करवाया।

3- सतीदाह- विधवा स्त्रियों को उनके पति के साथ जिंदा जलाये जाने की प्रथा को अंग्रेजो 1863 में कानून द्वारा बंद किया।

4- कन्या वध- कन्या भूर्ण हत्या  को 1870 में कानून बना के रोका गया

5- नर मेध-  ऋग्वेद के शुनःशेप की कहानी के आधार पर निर्धन या अनाथ व्यक्ति को दीक्षित कर उसकी यज्ञ में बलि दी जाती थी जिसको अंग्रजो ने  1845 में ऐक्ट 21 बना के रोका ।

6- हरिबोल- इस प्रथा के अनुसार रोगी को गंगा में ले जाकर उसे गोते दे देकर हरि बुलवाते और उसे मार देते। जो मर जाता उसे बहुत भागयशाली समझते और जो नही मरता उसे वंही घाट पर तड़प तड़प के मरने के लिए छोड़ देते। अंग्रेजो ने 1831 में इस अमानवीय प्रथा पर रोक लगाई।

7- धरना- साधु संत विष या शस्त्र हाथ मे लेके किसी  गृहस्थ के द्वार पर बैठ जाते और उन पर दवाब डालते की उनकी अमुक इच्छा पूरी करे ।कभी कभी गृहस्थ की पत्नी या बेटी से संबंध बनाने पर भी जबरजस्ती करते। अंग्रजो ने सन 1920 में कानून बना इसे बंद करवाया।

इसके अलावा जगन्नाथ धाम में रथ यात्रा के दौरान भक्त लोग रथ के पहिये के नीचे मोक्ष प्राप्ति की आशा में आत्महत्या कर लेते थे । यह जघन्य आत्महत्याएं हर  तीसरे वर्ष रथ यात्रा के दौरान होतीं। अंग्रजो ने इस प्रथा को कानून बना के बंद करवाया। ऐसी अनेक कुप्रथाएं जिन्हें मुस्लिम शासक नही खत्म कर पाए थे उन्हें अंग्रेजो ने खत्म किया।

समझिये की क्यों मात्र दो सालों के राज में अंग्रेजों का विरोध शुरू हो गया था जबकि अक़बर आदि मुस्लिम शासकों का सैकड़ो सालों के बाद भी नही।


Wednesday, 11 July 2018

सूफ़ीवाद

  भारत मे इस्लाम के फैलने का प्रमुख कारण इसका ' तसव्वुफ़ अर्थात सूफ़ी मत रहा है। सूफ़ी मत तलवार से भी अधिक मारक था जिसने बिना खून बहाये अधिक से अधिक हिन्दुओ को अपनी ओर आकर्षित किया।

अरब के लोगो ने दर्शन के लिए ' फ़लसफ़ा' शब्द का इस्तेमाल किया ,'सूफ़ी' शब्द ' फ़लसफ़ा' के 'सफा' से बना है जिसका अर्थ है दार्शनिक। हम कह सकते हैं कि सूफ़ीवाद इस्लाम का निचोड़/ केंद्र था जो लोगो को जबरजस्ती तलवारों के बल से मुसलमान बनाने के पक्ष में नही था । जो लोग यह मानते थे कि कुरआन ईश्वर और समाधि ,ईश्वर और चिंतन में सम्बन्ध है और यही उस तक पहुचने का मार्ग है वह इस्लाम की कट्टरता के घेरे से निकल के सूफी हो गए। हालांकि की हम यह कह सकते हैं कि अरब के लोगो ने यह धारणा यूनान से ली है किंतु यह भी सच था कि अरब और यूनान का भारत से प्राचीन रिश्ता रहा है। इसलिए इतिहासकार मानते हैं कि दर्शन पहले भारत से यूनान पहुँचा और फिर वंहा से अरब।

फिर यह भी सच है कि अरब में  इस्लाम के आने से पहले बौद्ध धर्म का भी प्रभाव रहा  था , बलख का नौ बिहार दरसल नौ विहार या बौद्ध मठ था और इसका पुजारी बरामका कहलाता था यँहा बुद्धदेव की पूजा होती थी ।

अरब के नगरो में यहूदी मत, ईसाइयत, बौद्ध, हिंदुत्व, और इस्लाम का का मिलन हुआ ।

अतः अरब वालों को सूफिज्म का ज्ञान पहले से था हाँ , यह जरुर हुआ कि इस्लाम मे आने के बाद उस दर्शन का स्वरूप थोड़ा बदल गया , भारत आ के उसने और भी विस्तार किया ।

सूफी मत के अनुसार-
1- सूफी का प्रमुख कर्तव्य ध्यान और समाधि है, प्रार्थना और नाम स्मरण है । इन्ही तरीको से वह परमात्मा मिलन की राह पर अग्रसर होता है।

2- अस्तित्व केवल परमात्मा का है , वह प्रत्येक वस्तु में है और प्रत्येक वस्तु परमात्मा में है।

3- सारी वास्तविकता एक ही है ।

4- सभी धर्मिकता और नैतिकता का आधार प्रेम ही है।प्रेम के बिना धर्म और नीति दोनो निर्जीव हैं।


किन्तु यंहा गौर करने लायक वात यह थी कि जैसा कि ऊपर भी बताया गया है को मौलिक इस्लाम और सूफिज्म में अंतर होने के कारण इसे पसंद नही किया गया । जैसे कि संगीत इस्लाम मे हराम करार दिया गया किन्तु सूफ़ी मत वाले संगीत को अपनी साधना का जरिया मानने लगे। कब्र पूजना इस्लाम मे हराम करार दिया गया किन्तु सूफ़ीवाद कब्र पूजता रहा।

इसलिए सूफ़ीओं को  मुल्लाओं और इस्लाम के ठेकेदारों की नजरों में काफ़िर करार कर दिए गया , उन्हें प्राण दंड दिया जाने लगा । मनसूर- अल- हज्जाज , सरमद आदि ऐसे ही सूफ़ी थें जिनको इस्लामिक ठेकेदारों ने कत्ल कर दिया  ।

आज भी मजारों पर जो हिन्दू श्रद्धा से सर झुकाता है वह  सूफियों के कारण ही सम्भव हुआ था। मज़ार में हिन्दुओ को अपने देवी देवता नजर आते हैं। जो चमत्कार करते हैं, आशीर्वाद देते हैं। सूफिज्म रहस्यवाद की पूर्ति करता है।

देखिये, मज़ार ने  हिन्दू देवी -देवताओं की मूर्तियों को कैसे अंगीकार कर लिया है। क्या यह किसी मस्जिद में संभव है?


Wednesday, 4 July 2018

शेयर्ड सायकोटिक डिसऑर्डर -


कई सालों पहले मैं दोस्तों के साथ राजस्थान के मेंहदीपुर बाला जी के मंदिर में गया था , उसकी मान्यता यह बताई  जाती है कि उस मंदिर में ' ऊपरी हवाओं' जैसे भूत प्रेत आदि का इलाज होता है।

जिज्ञासावश मैं भी चला गया था कि देखूं आखिर भूत प्रेत होते कैसे हैं?

मंदिर में बहुत दूर दूर के लोग आये हुए थे, भूत प्रेत से बाधित मरीज़ो का परिसर अलग था । जंहा कई भूत प्रेत से पीड़ित मरीजों को बांध के भी रखा गया था , ख़ास बात यह थी की वंहा महिला मरीज़ो की संख्या बहुत अधिक थी। एक महिला जोर जोर से चिल्लाने लगी तो एक सेवादार आया और महिला को उसके बालों से पकड़ के बुरी तरह पीटने लगा था । कोई उस सेवादार को नहीं रोक रहा था , न मंदिर में दर्शन के लिए आये लोग और ना ही कोई अन्य मंदिर का कर्मचारी। महिला को  बुरी तरह पीटने के बाद सेवादार चला गया ,महिला कभी रोती तो कभी और जोर से चीखने लगती। साफ़ जाहिर था कि वह किसी मनोरोग से पीड़ित थी न की किसी भूत प्रेत से।

वंहा मरीज़ो की संख्या बहुत अधिक थी, इतनी की कई मनोरोगी मंदिर के पास वाली पहाड़ी पर भी थे जो अजीब अजीब हरकते कर रहे थे ,जैसे पेट पर बड़ा सा पत्थर रख के  लेटना, कूदना , आसमान की तरफ देख कर जोर जोर से चीखना आदि। 99% यंहा आने वाले भूत प्रेत से पीड़ित परिवार या तो गरीब परिवार से थे या मध्यवर्गीय परिवार से जो या तो पैसे के आभाव में मरीज का साइकैट्रिस्ट से नहीं करवा पाएं या अत्याधिक धार्मिकता और अंधविश्वास के चलते यंहा छोड़ के चले गएँ।

यंहा आने वाले मरीजों में मनोरोगी होने का  प्रत्यक्ष आभास और प्रमाण मिल जाता है , किन्तु कई मरीज ऐसे होते हैं जिनका आभास आस पास के लोगो को नहीं हो पाता।ये मनोरोगी प्रत्यक्ष रूप से सामान्य नजर आते हैं , अत्याधिक धार्मिक या सन्वेदनशील हो सकते हैं जिसे लोग नजरन्दाज कर देते है।

आपने कई ऐसे लोग देखें होंगे जो भगवान् या अन्य किसी आत्मा आदि से बाते करने का दावा करते हैं, अपनी चमत्कारिक शक्तियों से लोगो के कष्ट दूर करने का दावा करते हैं ।

 बुराड़ी में हुई 11 सदस्यों की  सामूहिक आत्महत्या वाले केस में भी ऐसा ही हुआ, पुलिस का दावा है कि ललित जो अत्याधिक धार्मिक प्रवृत्ति का था उसे सपने में उसके मृत पिता जी आते थे और निर्देश देते थे।उन निर्देशों को वह रजिस्टर पर उतार लेता था। ठीक ऐसे ही संजय दत्त की एक फिल्म भी आई थी जिसमे वह गाँधी जी को देखने की बात करता है और उनसे बाते करने का दावा भी।

ललित अपने पिता की आत्मा से जो बातें करता उन्हें पूरे परिवार के एक जगह बैठा के सुनाता।  परिवारवाले ललित को चमत्कारिक शक्तियों वाला समझते थे और वही सभी फैंसले लेता था। पिता की आत्मा जो निर्देश देती थी उसे वह रजिस्टर में उतार लेता था। भागवान से मिलने और मोक्ष् प्राप्त करने की बात भी उससे पिता की आत्मा ने ही निर्देश दिया था ,जिसके कारण पूरा परिवार फंदे पर लटक गया।

विशेषज्ञ कह रहे हैं कि ललित शेयर्ड सायकोटिक डिसऑर्डर का शिकार था , इस बीमारी में मरीज को लगता है कि वह किसी मृत व्यक्ति से बात कर रहा है। जैसा संजय दत्त उस मूवी में गांधी जी आत्मा से बात करता है, ऐसे ही ललित अपने पिता की आत्मा से बात करता है। इस बीमारी में मरीज के शरीर में अचानक बदलाव आते हैं और  उसकी आवाज़ वा आवभाव बदल जाते हैं ।देखने में ऐसा लगता है जैसे उस पर कोई आत्मा या भूत प्रेत आ गया हो। इस बीमारी का इलाज संभव है किंतु लोग इसे आत्मा आदि का किया मान के इलाज नहीं करवाते और अंधविश्वास के जाल में फँसते रहते हैं।

आप शेयर्ड सायकोटिक डिसऑर्डर के बारे में यंहा पढ़ सकते हैं-

https://www.webmd.com/schizophrenia/guide/shared-psychotic-disorder

वेदो के रचनाकारों को 'दृष्टा' कहा गया है , जिन्होंने दावा किया था कि उन्होंने  ईश्वर की को देखा और उसकी वाणी सुन वेदों की रचना की ।

 मुहम्मद साहब को भी जीब्रील नाम का फरिश्ता दिखाई देता है और वे उसकी बातों को वैसे ही कुरआन के रूप में दर्ज करते हैं जैसे की ललित अपने पिता की आत्मा के निर्देश पर रजिस्टर.... तो आप समझ ही गए होंगे धर्म- मज़हब की कहानी...

मुक्त होइये ऐसे शेयर्ड सायकोटिक डिसऑर्डर द्वारा लिखे गए रिस्टर्स से

फोटो साभार गूगल-


Saturday, 5 May 2018

आदि शंकराचार्य - भारत के पतन का कारण?


 सिंधु सभ्यता में  मुद्रा, तौलने के बाट, सील, बर्तन, औजार,धातु  आदि बहुत से ऐसे अवशेष मिले हैं जिससे यह निर्धारित होता है कि आज से 3- 5 हजार पहले संधु सभ्यतावासी विदेशो जैसे सुमेर ,सुसा( ईरान) , बेबिलोनिया, मिस्र आदि देशों में बड़े पैमाने पर व्यापर करते थे। कृषि, मछली पालन, मिट्टी और धातु के बर्तन तथा औजार बनाना, जेवरात बनाना ,नक्कासी करना आदि अन्य मुख्य धंधे थे जिनका वे व्यापार करते थे।

इतिहासकार कहते हैं कि सुमेर राज्य सिंधु व्यपारियो का उपनिवेश था जंहा से वे इजिप्ट से लेके क्रीट द्वीपो तक व्यापार करते थे । इजिप्ट के सबसे पुराने पिरामिड में जौ और गेंहू की वही प्रजाति पाई गई है जो सिन्धु नगरों की खुदाई में मिली थी।

सिन्धु सभ्यता में व्यापार और विज्ञान उस काल में उन्नत माना जाता था।विज्ञान और व्यापार की वह उन्नति बौद्ध शासको ,चन्र्दगुप्त , बिंदुसार, अशोक,हर्ष आदि  के समय चरम पर पहुंची।

चंद्रगुप्त के समय हैलेनवादियो से वैवाहिक रिश्ते कायम किया ,आर्थिक और व्यापारिक लाभ के संबंध भी बनाये गएँ।

बिंदुसार ने अपने राजकाल में यूनानियों से व्यापारिक सम्बन्ध ।

अशोक के समय बौद्ध धम्म के साथ साथ विज्ञान-व्यापार भी देश विदेश पहुंचा।

प्रसिद्ध चीनी यात्री ह्वेनसांग हर्ष के काल में ही आया ,  उस समय विज्ञान,कला , साहित्य, व्यापार  बहुत उन्नत था । जेवरातों से लेके रेशम और सूत का व्यापार होता था ।

बौद्ध राज्यओ के समय ही नालंदा, तक्षशिला( तक्कसिला) जैसे बौद्ध  विश्वविद्यालयों का निर्माण किया जिसमे ज्ञान लेने दुनिया भर के विद्यार्थी आते थे। शून्यवाद और विज्ञानवादी परम्परा खूब फल फूल रही थी।

आदि शंकराचार्य का काल 7-8 सदी माना गया है, यह वह काल था जब हर्ष के बाद बौद्ध धर्म के संरक्षक कमजोर हो रहे थें। ऐसे में शंकराचार्य बौद्ध परम्परा अपना के बौद्ध धर्म को समाप्त करने निकल पड़े । बौद्ध परम्परा के शून्यवाद और विज्ञानवाद की नक़ल कर वे ब्रह्मात्मैक्य -अद्वैतवाद का गठन करते हैं । इसलिए रामानुज और अन्य आधुनिक विद्वानों ने उन्हें ' प्रच्छन्न बौद्ध' कहते हैं।

शंकराचार्य 'जगत मिथ्या - ब्रह्म सत्य' की अवधारणा ला के संसार को माया कह देते हैं। बौद्ध परम्परा का कारण- कार्य श्रंखला  की तार्किकता निष्पत्ति है,  जिसके  आभाव में किसी वस्तु की विद्यमानता की कल्पना नहीं की जा सकती । शंकराचार्य इसी कारण- कार्य श्रंखला के वास्तविक स्वरूप को ही विकृत करने का प्रयत्न हुए कारणता निषेध के परिणाम स्वरूप जगत मिथ्या का प्रतिपादन करते है ।

शंकर का वेदांत कहता है जो दिखता है वह सब मिथ्या है ,जगत के रूप में जो हम परिवर्तन देख रहे हैं वह वस्तुतः मिथ्या है ,माया है ...झूठ है ,केवल मानसिक आरोप है जिसे वेदांत की भाषा में 'अध्यास 'कहा गया । जगत केवल नामरूपात्मक है,उसका कोई वास्तविक अस्तित्व नहीं। यह बौद्धो के प्रतीत्यसमुत्पाद की तार्किकता का विकृत निषेध था। वेदांत ने बौद्ध  कारणवाद का खंडन करते हुए कहा सृष्टि विकास में कारणता नही है ,वस्तुतः यह विकास है ही नहीं जंहा अस्तित्व ही न हो वँहा विकास कैसा और किसका? बल्कि यह माया है।शंकराचार्य ने मनु को आधिकारिक रूप से अपनीं दार्शनिक रचनाओं में बार बार स्थापित किया है, अगर हम कहें कि मनु को जिंदा करने वाले शंकराचार्य ही थे तो अतिश्योक्ति न होगी।

शंकराचार्य अपनी बात की स्थापना के लिए तर्कबुद्धि और दैनिक जीवन के अनुभवों का ही तिरस्कार करने से नहीं चूकते।

इस प्रकार आदि शंकराचार्य भारतिय समाज को ऐसे अँधेरे कुएं में धकेल देते हैं जंहा चारो मठो की तीर्थ यात्रा करना , वर्ण धर्म का पालन करना, ब्राह्मण श्रेष्ठता, आत्मवाद  आदि ही प्रमुख क्रियाये और अंग रह जाते हैं। तर्कवाद, विज्ञानवाद का मार्ग पूरी तरह से अवरोध कर उसे काल्पनिक ब्रह्म के चरणों में समर्पित कर देते हैं।

आप देखेंगे कि शंकराचार्य के बाद ही देश गुलामी और अंधकार की तरफ अग्रसर हो जाता है।समाज विदेशियो के हाथों पराजय स्वीकार करता रहता है, विज्ञान और व्यापार कोई प्रगति नहीं करते बल्कि ब्रह्म आदि काल्पनिक अवधारणाओं में उलझ अपनी रौशनी गंवा बैठते हैं। समाज का पतन शुरू हो जाता है कि मुट्ठी भर विदेशी आसानी से भारत पर कब्ज़ा कर लेते हैं। शिक्षा ,व्यापार और विज्ञान की प्रगति उलटी दिशा में हो जाती है ।

यदि कहें कि देश का और समाज का जो पतन हुआ उसके लिए आदि शंकराचार्य मुख्य रूप से जिम्मेदार रहे हैं तो गलत न होगा। आठवी सदी के शंकर के बाद ही भारत मुख्य रूप से गुलामी की तरफ बढ़ा, जातिया व्यवस्था मजबूत हुई।


Tuesday, 3 April 2018

आरक्षण क्यों और कैसे-

आरक्षण क्या, क्यों, किसके लिए और कैसे? साथ मे पढ़े अन्य संवैधानिक उपाय, जिनका उद्देश्य है देश -समाज मे शोषितों और वंचितों के लिए समानता के स्तर को प्राप्त करना….

अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के सामाजिक स्तर मे सुधार के लिए संविधान में त्रि-आयामी (त्रि-स्तरीय) रण नीति बनाई गयी, जो इस प्रकार हैं।

1. सामाजिक सुरक्षा प्रदान करके:

न्यायिक/नियमन साधनों द्वारा समानता के सिद्धांतको लागू करके और सामाजिक बाधाओं को दूर करके,दलितों पर होने वाली शारीरिक हिंसा के अपराधियों को कठोर दंड का प्रावधान करके,
ऐसे परंपरागत नियमों, प्रबंधों को बंद करके, जो दलितों की डिग्निटी ( गरिमा )और आत्म सम्मान को ठेस पहुँचाते हैं।

उनके परिश्रम की उचित कीमत और फल की प्राप्ति सुनिश्चित करके,-प्राकृतिक संसाधनों पर किसी खास वर्ग का ही अधिपत्य कम करके,
दलितों को उपलब्ध कराई गयी सुविधा, अधिकार, लाभ आदि की देखभाल के लिए स्वतंत्र आयोगो का गठन करके।

2. कमपेनसेटरी डिस्क्रिमिनेशन (प्रति पूरक भेदभाव ): सार्वजनिक सेवाओं, प्रतिनिधि संगठनों/ निकायों, शैक्षिक संस्थानों मे आरक्षण लागू करके व अन्य सहायता प्रदान करके।

3. विकास:- अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति और अन्य समुदायों के बीच पैदा हुई खाई को पाटने के लिए लाभ और संसाधनों का पुनरवितरण करके.
ये नीति राज्य (भारत) द्वारा कार्यान्वित की गयी और तब से इस नीति के प्रति प्रतिबद्धता, भारत राज्य की विशेषता रही है. समय समय पर ये नीति ज़रूरत पड़ने पर और ज़्यादा मजबूत बनाई गयी और साथ ही ज़रूरत के मुताबिक इसका दायरा भी बढ़ाया गया है.  जहाँ तक सुरक्षा संबंधी प्रायोजनों की बात है, तो खुद संविधान मे काफ़ी विस्तृत रूप से उन परंपराओं, नियम क़ानूनों, सामाजिक संस्थागत प्रबंधों और दलितों पर थोपी गयी किसी भी अन्य प्रकार की अमानवीय  और भेदभावी स्थिति को ख़तम करने की ढाँचागत रूपरेखा दी गयी है जो अस्पृश्यता को समाज मे लागू करते हैं, उसका अनुमोदन करते हैं या इस हीन परंपरा के पालन को प्रोत्साहित करते हैं।

इन संवैधानिक प्रबंधों को लागू करने के लिए क़ानून बनाए गये. उदाहरण के लिए:-

The Untouchability Practices Act,  1955 संविधान के आर्टिकल 17 को लागू करने के लिए बनाया गया.  इस क़ानून को फिर से सख़्त बनाया गया और 1976 मे सन्सोधित करके इसे Protection of Civil Rights Actके नाम से ज़्यादा प्रभावी रूप मे लागू किया गया. बाद मे अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के सदस्यों पर लगातार बढ़ते गये जघन्य अत्याचारों और हिंसा, जैसे सामूहिक नर संहार, बलात्कार, आगज़नी, गंभीर हमलो द्वारा शारीरिक क्षति आदि के फलस्वरूप राज्य को एक बार फिर गंभीर फ़ैसले लेने पड़े और दलितों को सुरक्षा के लिए विशेष क़ानून बनाना पड़ा जिसे

 “Scheduled Caste and Scheduled Tribe (Prevention of Atrocities) Act, 1989

के नाम से जाना गया और इसमे पहले से अधिक  कठोर सजाओं का प्रावधान किया गया ताकि ये क़ानून दलित के लिए प्रतिरक्षक ढाल का कार्य कर सके. इसी क़ानून का शोषक समाज ने जमकर विरोध किया. यही क़ानून वर्ग विशेष द्वारा “हरिजन एक्ट” के नाम से प्रचारित किया गया.  समाज मे स्थापित परंपराओं और क़ायदे क़ानूनों द्वारा दलितों को परंपरागत कार्यों में धकेलने के विरुद्ध और उनके अपने सामाजिक स्तर मे सकारात्मक बदलाव लाने के प्रयासों में सहयोग के लिए समय समय पर अतिरिक्त क़ानूनों को भी प्रभाव मे लाया गया।

The Employment of Manual scavengers and Construction of Dry Latrines (Prohibition) Act, 1993  नामक क़ानून, जो दलितों द्वारा हाथ से अन्य नागरिकों के मानव मल को साफ करने की अतिहीन कुप्रथा को ख़तम करने के लिए बना था, इन नियमों मे सबसे महत्वपूर्ण है.  जो एक अन्य कुप्रथा रोकी जानी थी, वो थी दलित लड़कियों का मंदिरों मे देवदासी के नाम पर यौन शोषण. आंध्रा प्रदेश और कर्नाटक ने देवदासी नाम की इस प्रथा को तत्काल प्रभाव से ख़त्म करने के लिए क़ानून पास किए. इस प्रथा के द्वारा जवान दलित लड़कियाँ स्थानीय देवता को देवदासी के नाम पर भेंट चढ़ा दी जाती थीं, जिनका मंदिर के पुजारियों द्वारा यौन शोषण होता था।

 देवता के नाम पर मंदिर के पुजारी/पुरोहित, दलित लड़कियों का शोषण करते रहे थे.  महाराष्ट्र मे 1934 मे ही इस घटिया परंपरा को बंद करने का क़ानून बन चुका था. कुछ क़ानून जो, इस उच्च वर्ग द्वारा शुरू की गयी दलित बालिकाओं के शारीरिक शोषण इस नीच धार्मिक परंपरा को गैर क़ानूनी घोषित करके इसके उन्मूलन और प्रतिबंध के लिए पास किए गये, वो इस प्रकार हैं:-

Andhra Pradesh Devdasi (Prohibition of Dedication) Act, 1988
Karnataka Devdasi (Prohibition of Dedication) Act, 1992
Hindu Religious and Charitable Endowment Act, 1927 of Mysore.
The Bombay Devdasi Protection Act, 1934
(उपरोक्त क़ानूनों का बनाया जाना इस परंपरा के वजूद, उसके प्रचलन और पुरोहित वर्ग के दलित वर्ग के प्रति घृणित और अमानवीय नज़रिए का सेल्फ़ एक्सप्लनेटरी और लीगल प्रूफ है)

रोज़गार प्रदाता/नियोक्ता द्वारा अपने यहाँ नियुक्त काम गारों/श्रमिकों के शोषण को रोकने के लिए भी क़ानून बनाया गया. इस क़ानून का मकसद मालिक द्वारा मजदूरों की सही मज़दूरी का भुगतान पक्का करना, कार्य के चुनाव की स्वतंत्रता दिलाना, ताकि नियोक्ता दावरा श्रमिकों पर अमानवीय और श्रमिकों की इच्छा के विपरीत कार्य करने की बाध्यता लादना बंद करना सुनिश्चित किया जा सके, अपने शोषण के खिलाफ आवाज़ उठाने की स्वतंत्रता आदि आदि का ध्यान रखा गया. हालाँकि ये क़ानून अनुसूचित जाति और अनुसूचित/जन जाति के लिए ही विशेष रूप से न होकर, हर वर्ग के श्रमिक पर लागू होता है, पर इसका सबसे बड़ा प्रभावित वर्ग दलित वर्ग ही था क्योंकि सबसे ज़्यादा मजदूर और श्रमिक इसी वर्ग से आते थे और आते हैं।


इस उद्देश्य के लिए बने क़ानून इस प्रकार हैं:

Bonded Labour System (Abolition) Act, 1976, बंधुआ मज़दूरी प्रणाली(निषेध) एक्ट, 1976
Minimum Wages Act, 1948, मिनिमम वेजस आक्ट,
Equal Renumiration Act, 1976, 1948, ईक्वल रीम्यूनरेशन आक्ट, 1976
Child Labour (Prohibition and Regulation) Act, 1986, चाइल्ड लेबर (प्रोहिबिशन आंड रेग्युलेशन) आक्ट, 1986
Inter-State Migrant Workmen (Regulation of Employment and Conditions of Services) Act, 1979, इंटर-स्टेट माइग्रेंट वर्कमेन (रेग्युलेशन ऑफ एंप्लाय्मेंट आंड कंडीशन्स ऑफ सर्वीसज़) आक्ट, 1979

दलित समुदाय को समाज की मुख्य धारा से निकल दिए जाने और समाज से बहिष्कृत रखे जाने के फलस्वरूप सभी प्रकार के लाभकारी और उत्पादन के साधनों पर उच्च वर्ग का ही अधिकार रहा, जिसके  कारण आज़ादी के समय भी लबभग सभी प्राकृतिक और बौद्धिक संसाधन इस उच्च वर्ग के ही पास अत्यधिक घनत्व के साथ केंद्रित थे, और दलित समुदाय इनसे सभ्याता के समय से ही वंचित रखा गया. आर्थिक संसाधनों और लाभकारी संपदा के कथित सवर्ण समाज के पास ही भारी मात्रा मे एकत्रित पाए जाने पर भी चोट की गयी. इस विषय के अंतर्गत “लैंड रिफॉर्म लॉ” (भूमि शुधार क़ानून), जिसका उद्देश्य अनुसूचित जाति व जनजाति के साथ साथ गाँव मे अन्य ग़रीब तबके के लोगों को भूमि का पुनरवितरण शामिल था, लागू किया गया।

डेट रिलीफ लेजिस्लेशन्स (ऋण राहत कानून) साहूकारों और सूद खोरों के हाथों ग़रीब लोगों के शोषण को रोकने और पैसे के लेन देन को नियमित करने के उद्देश्य से लागू किए गये.
सामाजिक सुधार की इस  रणनीति का दूसरा भाग कमपेनसेटरी डिस्क्रिमिनेशन (प्रति पूरक भेदभाव / क्षतिपूर्ति भेदभाव या सकारात्मक कार्यवाही) से संबंधित है जो निम्न लिखित प्रायोजन लागू करता है:

सार्वजनिक सेवा की नियुक्ति और प्रमोशन मे आरक्षण लागू करके,विधायिका की सीटों मे आरक्षण लागू करके (केंद्रीय, राज्य, पंचायत राज, मुनिसिपल बॉडीस आदि),शैक्षिक और प्रोफेशनल कॉलेजस की सीट मे आरक्षण लागू करके,निर्धारित योग्यता मापदंडो मे छूट प्रदान करके,फीस मे छूट या माफी प्रदान करके, आदि आदि।

ये सब उपाय यह सुनिश्चित करने के उद्देश्य के साथ किए गये की दलित समुदाय के लोग भी देश के सार्वजनिक तंत्र की शक्ति और निर्णयों मे अपना हिस्सा ले सके, साथ ही उनको उच्च शिक्षा प्राप्त करने के भी अवसर उपलब्ध हो सकें. ये महसूस किया गया था की यह वर्ग जन्म जन्मान्तर और सदियों की अर्जित की गयी कमज़ोरी, व्यापक रूप में प्रचलित सामाजिक शोषण और सामाजिक अपंगता के कारण खुली प्रतियोगिता मे अपना ज़रूरी हिस्सा नहीं ले पाएगा।

इन प्रायोजनों का उद्देश्य दलितों और उस क्षेत्र मे रह रहे अन्य वर्गों के बीच पैदा हुई सामाजिक अंतर की गहरी खाई को पाटना था।
सामाजिक सुधार की इस रण नीति का तीसरा पहलू दलितों के व्यापक और बहुदिशीय विकास पर फोकस करता है. इस विषय के अंतर्गत लाभो का सीमांकन करके व तरह तरह की योजनाओं के अंतर्गत धनराशि जारी करके दलितों की आर्थिक स्थिति को सुधारने का प्रयास किया गया है ताकि समाज मे दलितों का उन्नयन (उपर की और गमन) हो सके. इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए प्रायोजन था की योजना के अंतर्गत जारी राशि का एक निश्चित प्रतिशत अनिवार्य रूप से दलितों के लाभ वाली योजनाओं पर ही खर्च किया जाए।

 अनुसूचित जाति के केस मे इस प्रकार के प्रबंध को “स्पेशल कॉंपोनेंट प्लान” के नाम से जाना जाता है और इसके अंतर्गत ज़िम्मेदार एजेंसी दलितों के हित के लिए योजना बनाकर धन राशि पास करती है जो कम से कम उस राज्य मे दलितों की जनसंख्या के प्रतिशत के बराबर होती है और केंद्रीय योजनाओं मे देश की कुल आबादी मे दलितों के प्रतिशत के बराबर होती है. (उत्तर प्रदेश की राज्य योजना मे  = 21%, केंद्रीय योजना मे= 15%). ये संसाधन दलित समुदाय के लिए ऐसे प्रोग्राम और गतिविधियों मे खर्च किए जाते हैं जो सीधे तौर  पर दलितों की आर्थिक स्थिति को बेहतर बनाने मे मददगार साबित होते हों।


इसी नियम के समानांतर, स्टेट पॉलिसी द्वारा प्रावधान किए गये की विभिन्न विकास कार्यक्रमों, जिनसे आम आबादी के लाभ जुड़े हों, उनमें लाभ प्राप्त करने वाले लोगों की संख्या या की एक निश्चित प्रतिशत अनुसूचित जाति व जन जाति से होना सुनिश्चित किया जाएगा और किसी भी स्थिति मे उनकी उस राज्य मे जनसंख्या मे हिस्से के प्रतिशत से कम नहीं होगा. ऐसा इसलिए करना पड़ा ताकि संस्थाएँ लाभों का एक तरफ़ा वितरण करके दलितों को उनके हिस्से से वंचित न कर दें, जैसा की परंपरागत तौर पर समाज मे होता आया।


कुछ विशेष कार्यक्रमों के अंतर्गत, जहाँ दलितों और शेष समाज के बीच अत्यधिक विशाल अंतर पाए गये, वहाँ विशेष संस्थागत कार्यक्रमों द्वारा इस खाई को पाटने के लिए अतिरिक्त संसाधन जारी किए गये, जिसके अंतर्गत साक्षरता का विस्तार, ग़रीबी-उन्मूलन कार्यक्रम, घर और खेती के लिए ज़मीन का आवंटन आदि शामिल हैं.

दलित समुदाय की बहुदिशीय सुरक्षा के उपाय करने के साथ साथ इस बात की निगरानी रखनी भी बहुत आवश्यक थी कि दलितों के लिए किए गये उपाय सही मे ज़मीनी हक़ीकत बन भी रहे हैं या नहीं और इस समुदाय के हिस्से के लिए जारी की गयी सुविधा उन तक पहुँच भी रही है या नहीं. इस उद्देश्य के साथ चार निगरानी संस्थाएँ / आयोग बनाए गये.

राष्ट्रीय अनुसूचित जाति व जनजाति आयोग की स्थापना स्वयं संविधान के अंतर्गत की गयी,
राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की स्थापना Proctection of Human Rights Act, 1993 के अंतर्गत हुई,
राष्ट्रीय महिला आयोग की स्थापना National Commission for Women Act, 1990 के अंतर्गत हुई,
राष्ट्रीय सफाई कर्मचारी आयोग की स्थापना National Commission for Safai Karmacharis Act, 1993 के अंतर्गत हुई है.
मानवाधिकार आयोग और महिला आयोग, किसी विशेष जाति के लिए ना होकर देश के हर एक नागरिक के लिए स्थापित हुए हैं, लेकिन इनके कार्यक्षेत्र हमेशा ही दलित समुदायसे सबसे ज़्यादा जुड़े रहे, जिनका अधिकार हनन सबसे ज़्यादा होता आया।

उपरोक्त संवैधानिक प्रबंधों से स्पष्ट है की राज्य, दलितों के प्रति होने वाली हिंसा और इसके कारणों की जड़ को सामाजिक व्यवस्था और परंपरागत पदानुक्रमित संबंधों मे पाता है और इन तथ्यों को क़ानूनी रूप से स्वीकार करता है, जो दलितों को सामाजिक आधीनता और इनडिग्निटी से भरी जिंदगी मे झोंक कर अवसाद भरा जीवन जीने को मजबूर करते हैं।

यहाँ बताई गयी त्रि-स्तरीय पॉलिसी धीरे धीरे उन कारकों को ख़त्म करने मे सहायता करेगी जो दलितों के प्रति हिंसा के रूप में परिणत हो जाते हैं या कारण बनते हैं और इस तरह समय के साथ साथ समाज मे समानता का आगमन और प्रसार होगा, जो समय लेगा. बड़े सोच विचार के बाद सामाजिक समानता लाने के लिए बनाया गया ये मॉडेल, समय के साथ साथ अनुभवों के आधार पर और सुदृढ़ किया गया और सोशियल इंजिनियरिंग के द्वारा सुधार के लिए देशभर मे प्रयासरत है।

यह बात भी स्पष्ट रूप से उभर कर सामने आती है की सामाजिक संबंधों को बंद करने की इस प्रक्रिया मे राज्य की भूमिका न केवल बेहद महत्वपूर्ण बल्कि निर्णायक रूप मे रही है. इसमे कोई शंका नहीं की राज्य को ये भूमिका, जागरूकता के साथ साथ एक सकारात्मक झुकाव से इन हाशिए पर रखे गये और वंचित (सुविधा विहीन और अधिकारहीन) समुदायों के पक्ष मे प्रयोग करनी थी, जब भी दुर्जेय और अभेद्य उच्च वर्ग इस वंचित समुदाय के सामने रुकावट बना खड़ा हो. राज्य के सामने स्पष्ट था की ये वंचित और शक्तिहीन समुदाय उच्च और शक्तिशाली (सुविधा संपन्न और अधिकार संपन्न) वर्ग के सामने लंबी समयावधि तक भी अपने दम पर अपने हक की लड़ाई लड़ने मे सक्षम नहीं हो पाएगा. इसलिए ऐसी उम्मीद की गयी थी की राज्य कार्यकारिणी, विधायिका और न्यायपालिका के संस्थान न्यायिक  और संवैधानिक भावना का सम्मान करते हुए, राज्य की इस नीति का पालन करेंगे और उचित और आवश्यक प्रतिक्रिया देंगे।

कहीं ऐसा ना हो कि सरकारी तंत्र एक उदासीन या पक्षपात पूर्ण तरीके से कार्य करने लगें, इस पर निगरानी रखने के लिए विशेष निगरानी तंत्रों की स्थापना की गयी ताकि नीतिगत प्रतिबद्धता और इसके पालन के उद्देश्य से बनाई गयी व्यवस्था अपने नियत रास्ते से भटके नहीं।

इस रण नीति में ये भी आशा और आदर्शवादी दृष्टिकोण संजोया हुआ थी की बहुसंख्यक हिंदू समाज भी स्वयं अपनी ज़िम्मेदारी समझ कर एक उदार और मानवीय नीति और लोकतांत्रिक प्रक्रिया अपनाते हुए ज़रूरी सहयोग देगा और स्वयं को इन आधारों पर खुद को बदलकर एक संपूर्ण और सकारात्मक सामाजिक बदलाव मे अपना सहयोग प्रदान करेगा. इस प्रकार ये उम्मीद की गयी थी की सोशियल इंजिनियरिंग के इस प्रयास द्वारा अन्य समुदायों के दलित, उत्पीड़ित और शोषित समुदायों के प्रति चले आ रहे रवैये और व्यावहारिक प्रतिक्रिया मे व्यापक और सकारात्मक परिवर्तन देखने को मिलेंगे।


मानवाधिकार आयोग की इस रिपोर्ट के आगे के भागों मे विस्तार से इस बात की जाँच की गयी है और कारण बताए हैं कि इस त्रि-आयामी रणनीति के  अभीष्ट उद्देश्य संपादित/कार्यान्वित हुए, ज़मीनी हक़ीकत बने भी कि नहीं या फिर अनुसूचित जातियों के खिलाफ परंपरागत जारी हिंसा, जो कि धीरे धीरे और चुपचाप अस्पृश्यता के पालन द्वारा, तरह तरह की बाधाएँ लादकर और निर्योग्यताएँ थोप कर, भेदभाव करके, पक्षपातो और छुवा छूत आधारित परंपराएँ जारी रखकर तथा प्रत्यक्ष रूप से शारीरिक हिंसा करके और उनके प्रति जघन्य अपराध जैसे हत्या, नरसंहार, बलात्कार, आगज़नी आदि द्वारा सतत रूप से अन्य समुदायों द्वारा जारी रहती है। ताकि जाति आधारित सामाजिक व्यवस्था को लागू रखा जा सके और इसमे होने वाले परिवर्तनों के खिलाफ बहुत ही सख़्त प्रतिरक्षा दलितों के मन मे भय बैठाकर स्थापित रखी जा सके, वो वैसे ही जारी रही या कम हुईं.

अगर इस पॉलिसी का पालन नहीं हुआ है तो कभी आगे ये भी बताया जाएगा की राज्य की इस त्रि-आयामी पॉलिसी के कार्यान्वयन और इसे समाज मे लागू करने के रास्ते मे कौन सी बाधाएँ आई और इनके पालन मे क्या कुछ सही नहीं रहा. समय मिला तो इस विषय पर भी बात की जाएगी की संविधान और राज्य की पॉलिसी मे निहित इस प्रकार की आशा को बहुसंख्यक हिंदू समाज ने अपनी इन घ्रिणित परंपराओं को छोड़कर उदारवादी और मानवतावादी और जनतांत्रिक सामाजिकता को अपनाने मे कितनी उत्सुकता दिखाई ताकि भारतीय सभ्यता भी दुनिया की विकसित सभ्यताओं के स्तर को प्राप्त कर सके और यह भी चर्चा की जाएगी कि क्या “राज्य -नागरिक समाज इंटरफेस” ने इस मुद्दे पर सकारात्मक सामाजिक बदलाव के लिए ज़रूरी सदभाव दर्शाया या नहीं!!

धन्यवाद!

Source: Human Right Commission Report by K. B. Saxena (For Govt. of India)

Sunday, 25 March 2018

स्त्री ,तंत्रवाद और ईश्वर

इतिहासकार जोसेफ नीधम ने यह सिद्ध किया है कि विश्व के प्राचीनतम इतिहास में धार्मिक कार्यो और पूजा अर्चना या जादू टोना का कार्य पुरुषो की वजाय स्त्रियों की थी और बाद में यह काम पुरुष पुजारिओं ने हथिया लिया।

इस ऐसे कार्य के लिए जोसेफ, डुइड लोगो का उदहारण देते हैं, इस बात का ताजा प्रमाण की डुइड लोगो ने जादू- टोने के काम से स्त्रियों को हटा दिया और स्वयं यह कार्य करने लगे ।

चुकी कृषि की खोज स्त्रियों ने की थी और कृषि से ही जादू टोने का आरम्भ हुआ था इसलिए जैसे जैसे कृषि पर पुरुषो का आधिकर होता गया वैसे वैसे अनुष्ठानों पर भी पुरुषो का आधिकर होता गया।
देवियों की तुलना में देवता हावी होने लगे और पुरुष भी महान ओझा या जादूगर बन गएँ।

कुछ उदहारण देते हुए जोसेफ कहते हैं, पातागोनिया में पुरोहिताई के कार्य करने वाले लोगो को एक प्रकार से अपना लिंग त्याग देना पड़ता है और स्त्रियों जैसे कपडे पहनने होते हैं।

बोर्निया की डायाक जनजाति के पुरुष जो जादू टोने या धार्मिक अनुष्ठान करते थे स्त्रियों के कपडे पहनने के लिए बाध्य होते थे।

जुलू सरदार वर्षा लाने के लिए धार्मिक अनुष्ठान करते है तो वे स्त्रियों के पेटीकोट पहनते हैं।

मेडागास्कर में पुजारी स्त्रियों के कपडे पहनते हैं।

अमेरिका में यह नियम रेड इंडियंस और मैस्को की जनजातियों में पाया जाता है।

भारत के तेलगुभाषी प्रदेश में ग्विचिवाड़ में जब कोई पुजारी धार्मिक क्रिया करने लगता है तो वह स्त्रियों के कपडे पहनता है।

बंगाल में जादू- टोने / धार्मिक अनुष्ठान  क्रियाये महिलाओं द्वारा सम्पन्न होते हैं।

पुष्टि के लिए यह खबर पढ़िए-

http://m.indiatoday.in/story/in-a-unique-tradition-men-dressed-up-as-women-in-kerala-for-a-religious-celebration/1/306710.html

कृषि के आरम्भ में इसे करने वाली स्त्रियों को यह पता नहीं था कि धरती से पौधे वास्तव में कैसे उगते हैं, उनके लिए बुआई से लेके कटाई तक की सारी प्रक्रिया बहुत रहस्यपूर्ण थी । इसके अलावा उनके पास कृषि तकनीक बिलकुल नहीं थी जिससे अच्छी फसल होने की सम्भवना अनिश्चित थी , इसलिए कृषि कार्य के लिए बहुत धैर्य, दूरदर्शिता और विश्वास की जरूरत होती थी और यही सब कारक थे जादू टोने और धार्मिक अनुष्ठानों की उत्पत्ति के ।

जादू टोना या धार्मिक अनुष्ठान उनकी मनोवैज्ञानिक आवश्यकताएं पूरी करता था ,यह विश्वास उत्पत्न करता था बेशक वह विश्वास काल्पनिक और भ्रमपूर्ण था ।

वे अपने मनोरथ की काल्पनिक सृष्टि करते थे किंतु वास्तव में इसका प्रभाव वास्तविक परिस्थियों पर नहीं पड़ता था परंतु काल्पनिक सृष्टि करने वालो को यह काफी प्रभावित कर सकता था और आज भी करता है।

जादू टोना, धार्मिक अनुष्ठान एक तरह से अज्ञान ही थे ,किन्तु इतना अवश्य था कि ये सब कार्ता को मनोवैज्ञानिक काल्पनिक सबलता देते थे । अच्छी फसल का विश्वास बढ़ाते थें , इच्छापूर्ति का काल्पनिक विश्वाश दिलाते थें।

और आज भी दिला रहे हैं....ईश्वर के अस्तित्व का कारण भी वही काल्पनिक मनोवैज्ञानिक विश्वास थे....है...




Friday, 23 March 2018

सम्राट अशोक और बौद्ध धम्म-

अधिकतर भारतीय इतिहासकारो (?) का यह मानना है की सम्राट अशोक ने कलिंग युद्ध की विभीषिका से दुखी होके बौद्ध धर्म ग्रहण किया था, इस घटना पर कई फ़िल्म और सीरियल
भी बन चुके हैं जिस कारण आम धारणा भी यही बन गई ।
पर क्या यह घटना सत्य है? क्या वास्तव में अशोक ने युद्ध की विभीषिका से दुखी होके बौद्ध धर्म अपनाया था ? क्या वास्तव में वह बौद्ध बना था ?
जी नहीं , ये कहानी झूठ है की सम्राट अशोक ने बौद्ध धर्म अपनाया था क्यों की वह तो शुरू से ही बौद्ध था । उसका पिता बिन्दुसार और उसके पूर्वज पहले से ही बौद्ध थे अत: अशोक का बाद में बौद्ध धर्म अपनाने की कहानी झूठी साबित होती है , देखें कैसे –
हम अधिक पीछे न जाके अपनी बात बिन्दुसार से शुरू करते हैं , सम्राट बिन्दुसार का जन्म 299 ईसा पूर्व हुआ और मृत्यु 269 ईसा पूर्व । ग्रीक लेखको ने इन्हें ‘ अमित्रघातक’ कहा जिसका अर्थ होता है शत्रुओ का नाश करने वाला । इन्होंने मगध का साम्राज्य दक्षिण भारत के कोंकण, मदुरई, कर्णाटक तक को जीत कर विस्तार किया । बिन्दुसार ने बौद्ध धर्म को दक्षिण तक फैलाया और कई शीला लेख लिखवाएं , उनके राज्य में बौद्ध धर्म राज धर्म बना रहा ।
कहा जाता है की बिन्दुसार के कई ( लगभग 16) रानियां थीं और 101 पुत्र थे और 99 को मार के अशोक राजगद्दी पर बैठा , परन्तु यह सत्य प्रतीत नहीं होता । लामा तारनाथ ने अपने ग्रन्थ ‘ बौद्ध धर्म का इतिहास’ के पेज नम्बर 18 पर लिखा है बिन्दुसार की केवल तीन रानियां थी और 6 सौतले भाई और 4 बहने थी ।
अशोक का युद्ध केवल सुसीम से हुआ था जो की बिन्दुसार की पहली पत्नी से हुआ था और अशोक से बड़ा था । सुसीम बिन्दुसार की मृत्यु के उपरांत मगध का राजा बनाना चाहता था परन्तु दरबारी और जनता उसे नहीं चाहते थे अत: जब अशोक का राज्याभिषेक होना था तब सुसीम और अशोक का युद्ध हुआ जिसमें सुसीम मारा गया ।
शिलालेख 5 जो की अशोक ने अपने राज्यभिषेक के 13 साल बाद लिखवाया था उसमें उसने अपने भाई बहनो का जिक्र किया है जो अलग अलग प्रान्तों की राजधानियों में रह रहें थे और अशोक ने उन्हें धम्म महापात्र नियुक्त किया हुआ था । अत: अशोक का 99 भाइयो का मार के गद्दी प्राप्त करने की बात झूठ है ।
वह कहानी जो अशोक के बारे में प्रचलित है की उसने बौद्ध धर्म अपनाया था वह कपोल कल्पित है , जब अशोक के पिता और पूर्वज पहले से ही बौद्ध थे तो अशोक तो स्वयं ही बौद्ध था , उसे बौद्ध धर्म अपनाने की क्या जरूरत थी?
अशोक की मृत्यु के बाद उसके उत्तराधकारी मौर्य राजा लगभग 52 साल तक मगध में शासक रहें ।
बिम्बिसार से लेके अशोक के पुत्र कुणाल और उसके वंसज ब्रहद्रथ ( जिसे शुंग ने छल से मारा था ) सभी बौद्ध राजा रहें ।
सम्राट अशोक कलिंग विजय से पूर्व एक साम्राज्यवादी थे , लेकिन विजय के पश्चात वे एक आदर्श मानव बने , इनके वयक्तित्व में विशेष गुणों का विकास हो गया था । सत्य, दया, उदारता आदि विशेष गुण उन्होंने अपना लिए थे । कलिंग युद्ध के बाद उन्होंने दिग्विजय की नीति त्याग दी और अपने पूर्वजो की तरह बौद्ध धर्म के प्रचार प्रसार में मन लगाया । उन्होंने प्रचारको और उपदेशकों का विशाल दल तैयार किया जिसने विश्व के लगभग आधे भाग को अपने धम्म से जीत लिया । उन्होंने पशु बलि , मदिरा आदि व्यसनों पर रोक लगाई ।
दरसल उस समय बहुसंख्यक समाज जो की बौद्ध रहा था उसमे में शांति, नैतिकता आदि की भावना और आचरण प्रबल रही होगी जिससे समाज के बड़े वर्ग ने अशोक के अनावश्यक युध्द का विरोध किया होगा ।चुकी कोई भी सत्ताधारी बहुसंख्यक समाज की भावनाओ को कुचल कर ज्यादा दिन राज नहीं कर पाता है तो यही डर की भावना अशोक में भी होगी क्यों की अशोक प्रजा के खिलाफ नहीं जा सकता था ।
उस समय के समाज में बौद्ध धर्म भली भांति प्रचलित और स्वीकार था अत: जब सम्राट अशोक ने बौद्ध धर्म को राज धर्म बनाया तो समाज में उसका स्वागत हुआ और इसी के चलते वह चीन, जापान, कोरिया आदि दूर देशो तक बौद्ध धर्म का विस्तार कर पाया ।
सम्राट अशोक ने 14 शीला लेख ( पेशवर, जूनागढ़, देहरादून, मानसेहरा, पुरी, जैगढ़, करनाल, आदि ) लिखवाये जिसमें धम्मोपदेश लिखवाये। सात स्तम्भ लेख लिखवाये ( दिल्ली, मेरठ, इलाहाबाद , रामपुरवा, सारनाथ, लौरिया, साँची). कई गुहा लेख लिखवाये जिसमें की गया के निकट की पहाड़ी के गुहा लेख प्रसिद्ध हैं ।