Sunday, 7 August 2016

जानिये नाग और बुद्ध में सम्बन्ध तथा क्या है टोटमवाद

अब तक अपने पढ़ा की किस तरह गणपति को हाथी के सर वाला कह उनकी मूर्ति हस्तिसर लिए बनाया जाता है जबकि वास्तव में हाथी चिन्ह प्राचीन टोटम रहा होगा ।
जिसे दर्शाने के लिए मानव( गणपति) के सर पर हाथी का सर लगा दिया गया , इसी प्रकार मूषक भी कोई दक्षिण की  प्राचीन जाति थी जिसको हाथी वाले ( बौद्ध ) टोटम प्रयोग करने वाले किसी राजा ने हराया था ।

अब आगे -

यदि आप वैदिक धर्म ग्रंथो का अध्यन करेंगे तो आप पाएंगे की वैदिक ग्रन्थो के नाम पशु पक्षीयो के नामो से रखे गए हैं , ऋषि मुनियो के नाम पशुओ पक्षियों पर रखे गएँ हैं ।

आदि शंकराचार्य से सम्बंधित एक घटना बहुत प्रसिद्ध है जिसमें वे एक श्वान अर्थात कुत्ते से ज्ञान  लेते हैं ।
पर क्या वास्तव में कोई कुत्ता इंसानी भाषा में ज्ञान दे सकता है ?
इसका सत्य जानने के लिए हम शंकर भाष्य  छान्दोग्य उपनिषद के प्रथम प्रपाठक का 12 वां खंड का 4 मन्त्र देखेंगे  जिसमे ग्लव वेदों का अध्यन करने निर्जन स्थान पर गया जंहा उसके पास कुत्ते आते हैं और उससे कहते हैं " हे महानुभाव् हम भूखे हैं कृपा हमारे लिए मंत्रोउच्चारण से अन्न लाएं । उसके बाद जैसे दलभ्य ऋषि मंत्रो का उच्चारण करने लगे वैसे ही कुत्ते भी करने लगे " ओम हमें भोजन दो ! ओम् हमें पेय दो ! ओम हमें अन्न दो "

यंहा शंकराचार्य कुत्तो द्वारा वैदिक मंत्रोउच्चारण करवा देते है , तो क्या वास्तव में ये कुत्ते रहे होंगे ?

हरगिज नहीं ।पर बाद के वैदिकों ने उन्हें सच का श्वान मान लिया और वैसा ही चित्रित करने लगे ।

अब हम फिर से देवी प्रसाद चट्टोपाध्याय जी का सन्दर्भ देखते हैं ,वे कहते हैं की प्राचीन काल की प्रस्थितियां ऐसी रही है जिनमे मनुष्य पशु पक्षीयो के नाम आसानी से रख लेता था ।
स्वयं वैदिक संहिताओं की कई शाखाएं जो आज विलुप्त हो गई है उनके नाम भी पशुओ पक्षीयो पर रखे गए थे ।
अधिकतर ये शाखाएं आज विलुप्त हो गई है पर शकल शाखा आज भी विद्यमान है ।शकल शब्द की व्युतपत्ति एक प्रकार के सांप के नाम से हुई है ।
यानि शकल का अर्थ है सांप ।

जो प्राचीन शाखाएं विलुप्त हुई हैं वे माण्डूकायन, आश्वलायन आदि थी । माण्डूक्य का अर्थ हुआ मेंढक और आश्व यानि घोडा ।

कृष्ण यजुर्वेद संहिता में प्रसिद्ध शाखा है तैत्तिरीय जिसका नाम तितर पक्षी से बना है ।उसकी उपशाखाएं है वराह ,छागलेय आदि जिनका अर्थ है सूअर ,बकरा ।

कुछ उपनिषदों के नाम देखिये ,श्वेताश्वर अर्थात सफ़ेद खच्चर , मांडूक्य अर्थात मेंढक , कोशितिक अर्थात उल्लू , आदि ।
इसी प्रकार हम ऐसे ऋषियो के नाम भी देखते हैं जिनके नामो से हिन्दू धर्म में गोत्र निर्माण हुआ - कौशिक ( उल्लू), कश्यप ( कछुआ) , गौतम ( बैल) ।
वैदिक साहित्य में शुनःशेष की कहानी प्रसिद्ध है जिसका अर्थ है कुत्ते की पूँछ।

कौटिल्य के अर्थशास्त्र में (11/1) में श्वान(कुत्ते) कहलाने वाले लोगो का उल्लेख है।

अब प्रश्न है की ये ऐसे पशु पक्षीयो वाले नाम के लोग कौन थे ?
इसका उत्तर देते हुए रसल कहते हैं की जनगणना रिपोर्ट में आज भी ऐसी जनजातियां मिल जाएँगी जिनके नाम पशुओ / पक्षीयो/ पौधों  के नामो पर होंगे ।प्रसिद्ध इतिहासकार अय्यर ने विवरण दिया है की मैसूर की आदिवासी जातियो में 'श्वान' नाम की जनजाति अब भी है ।
कहने का अर्थ यह हुआ की जो वैदिक साहित्य में श्वान , हाथी, खच्चर , मांडूक्य , मत्स्य ,मूषक जैसे नामो वाले या चिन्ह वाले  पात्र है वह दरसल व्यक्ति ही थे ।

इसी प्रकार भारत में नागो के बारे में भी मिथक है , नाग मतलब सर्प या सांप ।

परन्तु नाग भी वास्तव में भारतीय जनजाति के मनुष्य ही थे जिनका टोटम नाग रहा होगा ।नागालैंड,नागपुर आदि नाग सूचक स्थान आज भी भारत में है जिसका अर्थ है की निश्चित ही इन स्थानों पर नाग सत्ता रही होगी ।
बुद्ध जब तपस्या कर रहे थे तो उन्हें खीर खिलाने वाली नाग कन्या का विवरण मिलता है ।
वैदिक ग्रंथो में पांच नागो का वर्णन है , अंनत, वासुकि, तक्षक , ककोर्टक तथा पिंगल ।

आंनदरामायण में पिंगला(सर्प कन्या) नाम की स्त्री का वर्णन है जो राम की शैय्या पर उस समय आती है जब सीता अपने शिविर ने निंद्रा में होती हैं । वह बात अलग है की उसे वैश्या कह के संबोधित किया है जिसे राम अलग जन्म में कुब्जा होने का वरदान दे कृष्ण के रूप में रमण करने का वादा करते हैं ।

बुद्ध की एक ऐसी मूर्ति प्राप्त हुई है जिसमे सात नागो का क्षत्र बना हुआ है संभवत: ये नाग उन नाग टोटम लोगो का प्रतीक है जिन्होंने बुद्ध को समाधी / ध्यान के समय सहायता या रक्षा की होगी ।

जायसवाल जी वसभ खत्तीय नाम की शाक्य कन्या का वर्णन करते हैं जिसका पिता महामान शाक्य होता है और माता नाग वंशीय ।
अर्थात शाक्य जनजाति ( बुद्ध) और नागो में विवाह सम्बन्ध थे ।

बहुत से पाठक यह सोच रहे होंगे की टोटम का अर्थ क्या हुआ ? हलाकि यह बता दिया गया है की टोटम अर्थात प्रतीक चिन्ह , यह प्राचीन जनजातीय समूहों के प्रतीक चिन्ह होते थे जो किसी भी पशु , पक्षी  अथवा पेड़ पौधों पर हो सकता था ।
जैसे रीछ, मत्स्य , हाथी , नाग , मूषक , गरुण , हंस, असोक आदि ।
प्रसिद्ध इतिहासकार मोर्गन के अनुसार टोटम शब्द अमेरिका की आजिबवा जान जाति की बोली के एक शब्द के आधार पर बना जिसका अर्थ है काबिले का प्रतीक चिन्ह ।
संक्षेप में टोटमवाद को इस प्रकार को समझ सकते हैं - जनजाति में सम्मिलित प्रत्येक काबिले का सम्बन्ध किसी पशु या पौधे से होता है जो उसका प्रतीक चिन्ह 'टोटम' कहलाता है ।कबीले के सदस्य स्वयं को अपने टोटम जैसा और उसका वंसज मानते हैं । उदहारण के लिए नाग टोटम के लोग स्वयं को नाग वंशीय , हाथी टोटम के काबिले के लोग स्वयं को हस्तिवंशिय ।

मोरे ने टोटमवाद का सामजिक संगठनात्मक से जुडी बेहद रोचक जानकरी दी है जिसे देवी प्रसाद जी उद्धत करते हैं " एक टोटमवादी समाज में कोई भी राजा या प्रजा नहीं होता ।यह जनतंत्रीय या साम्यवादी होता है , काबिले के सभी लोग एक दूसरे के साथ समता के आधार पर रहते हैं और कबीले के प्रतीक चिन्ह का आदर करते हैं .... प्रतीक चिन्ह के आधीन सब लोग सम्मिलित होते हैं और यही प्रत्येक सदस्य का एक दूसरे के साथ घनिष्टता का मूलतत्व होता है ।"

इस आधार पर यह कहा जा सकता है की अति प्राचीन भारतीय समाज टोटमवाद था जिसका प्रतीक चिन्ह हाथी, नाग , शाक्य( बेल/गोतम) , मूषक आदि रहे होंगे ।

परन्तु आश्चर्य है की हॉपकिन्स वैदिक सभ्यता को टोटमवादि नहीं मानते , उनके अनुसार जब वैदिक लोग भारत आये तो वे टोटम विहीन थे ।

क्रमशः

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